जलता हुआ पाकिस्तान
नवभारत टाइम्स | Sep 2, 2014,
पाकिस्तान गहरे संकट में फंस गया है। सरकार विरोधी मुट्ठी भर ताकतों ने पूरी व्यवस्था को ही बंधक बना लिया है। उनकी कवायदों से सिस्टम की कुछ बुनियादी खामियां उजागर हो रही हैं। समय रहते उन्हें दूर नहीं किया गया तो हिंसा और अराजकता की लपटें ऐसे ही उठती रहेंगी और सैनिक शासन की वापसी के नए तर्क सामने आने लगेंगे। इमरान खान और मौलाना कादरी ने चुनावी गड़बड़ियों और सरकार के भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो अभियान चलाया है, उस पर कई तरह के सवाल उठते हैं। क्या इनको जनतांत्रिक संस्थाओं और डेमोक्रेटिक तौर-तरीकों में कोई यकीन नहीं है? अगर चुनावों में धांधली हुई है तो उस पर निर्वाचन आयोग जैसी संस्था विचार कर सकती थी। संतुष्ट न होने पर मामले को कोर्ट में ले जाया जा सकता था। इमरान खुद को जनतांत्रिक नेता कहते हैं लेकिन संवैधानिक तरीकों की अनदेखी कर वे जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं? अगर जोर-जबर्दस्ती से वे वर्तमान सरकार को बेदखल भी कर दें, तो वे खुद कौन सी व्यवस्था लाना चाहेंगे? नवाज शरीफ को सत्ता से हटाने के लिए वे अपनी राजनीतिक व्यवस्था का बेड़ा गर्क क्यों करना चाहते हैं? क्या उन्हें इसका अहसास है कि आम आदमी से कहीं ज्यादा कट्टरपंथी ताकतें उनकी कामयाबी की दुआ कर रही हैं। कहीं इमरान और मौलवी कादरी उनके मोहरे तो नहीं बन रहे? पाकिस्तान की जनतांत्रिक व्यवस्था में कई चीजें अभी अनसुलझी हैं। मसलन प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद है। सेना की भूमिका को लेकर भी अस्पष्टता है। दुनिया के किसी भी डेमोक्रेटिक सिस्टम में सेना कार्यपालिका के निर्देशों पर ही काम करती है। वह सुझाव दे सकती है, पर स्वत: कोई निर्णय नहीं ले सकती। लेकिन वर्तमान संकट में पाकिस्तानी सेना के रुख से संदेह होता है कि वह अपनी अलग राजनीति चलाना चाहती है। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के आदेश के बावजूद उसने प्रदर्शनकारियों को कोई ठोस चेतावनी तक नहीं दी, यह कहकर कि वह इसकी जरूरत महसूस नहीं करती। अगर फौज सिविल प्रशासन से अलग सारे फैसले अपने विवेक से करने लगी तो जनतंत्र की विदाई निश्चित है। इन उलझनों को सुलझाए बगैर पाकिस्तान जनतंत्र के रास्ते पर ज्यादा दूर नहीं जा पाएगा। और उलझनें तभी सुलझेंगी, जब तमाम जनतांत्रिक ताकतें एकजुट होकर, जनता को विश्वास में लेकर देश के संविधान में जरूरी बदलाव करें। लेकिन इमरान खान और मौलवी कादरी जैसे शख्स विरोध की रौ में बहकर पाकिस्तानी जनतंत्र के लिए खतरे पैदा कर रहे हैं। गनीमत है कि देश की बहुसंख्य जनता ने इस बात को समझ लिया है, इसलिए कोई बड़ा जन समर्थन इन्हें मिलता नहीं दिख रहा। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने या तो शरीफ का समर्थन किया है, या उनका विरोध करने से परहेज किया है। लोग शरीफ से बहुत खुश भले न हों, लेकिन उन्हें अभी किसी तरह की अस्थिरता नहीं चाहिए। अवाम किसी भी कीमत पर सैन्य शासन की वापसी नहीं चाहता। हिंसा और अराजकता से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। हल तो संवाद की प्रक्रिया से ही निकलेगा।
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पाकिस्तान फिर संकट में
01-09-14
पाकिस्तान फिर से एक गंभीर राजनीतिक संकट में फंस गया है। जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा किया था, तो वह पाकिस्तान के इतिहास में एक मील का पत्थर माना गया था। इसके पहले कोई चुनी हुई सरकार पाकिस्तान में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी। उसके बाद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) ने चुनाव जीता और सरकार बनाई, तो ऐसा लगने लगा कि पाकिस्तान में आखिरकार लोकतंत्र की जड़ें जमने लगी हैं। लेकिन नवाज शरीफ की सरकार को बने हुए चंद महीने ही हुए हैं और वह संकट में घिर गई है। इमरान की पाकिस्तान तहरीक-ए- इंसाफ पार्टी और ताहिर उल कादरी के संगठन पाकिस्तानी अवामी तहरीक ने इस्लामाबाद में धावा बोल दिया है और एक मायने में सरकार को प्रभावहीन बना दिया है। इन संगठनों के लोग संसद में, प्रधानमंत्री के घर और सरकारी पाकिस्तान टीवी के दफ्तर में घुस गए। संकट का अंत जो भी हो, इससे पाकिस्तान में लोकतंत्र की कमजोर नींव पूरी तरह उखड़ जाएगी, क्योंकि फैसले की चाबी समूचे नाटक के सूत्रधार पाकिस्तानी सेना के पास है। यह मानने की कई वजहें हैं कि यह संकट सेना का पैदा किया हुआ है और इसे सेना की शह मिली है। सेना ने सरकार से कहा है कि वह प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग न करे, और बातचीत से राजनीतिक समाधान निकाला जाए। ऐसे प्रदर्शनकारियों से कैसे निपटा जाए, यह फैसला चुनी हुई सरकार को करना चाहिए, लेकिन सेना ने चुनी हुई सरकार के हाथ बांध दिए हैं। ऐसे संकेत भी हैं कि इमरान खान और कादरी, दोनों सेना के नेतृत्व के लगातार संपर्क में हैं और उनकी सलाह से अपनी रणनीति बना रहे हैं। इमरान खान की जिद यह है कि नवाज शरीफ ने चुनावों में धांधली की, इसलिए उनका चुनाव अवैध है। वह चाहते हैं कि नवाज शरीफ पद छोड़ दें और फिर से चुनाव हों। जाहिर है, अगर शरीफ की सरकार जाती है, तो चुनाव सेना की देखरेख में होंगे और यह इमरान के लिए सुविधाजनक स्थिति होगी। पाकिस्तान के आतंकवादी समूह पहले से ही इमरान के समर्थन में हैं। ताहिर उल कादरी चाहते हैं कि पाकिस्तान में क्रांति हो जाए, अलबत्ता यह लगता है कि सेना जो कुछ भी प्रस्ताव रखेगी, उसे वह मान लेंगे। दोनों की मुख्य मांग यह है कि नवाज शरीफ सत्ता छोड़ें, भले ही संसद में उन्हें बहुमत प्राप्त हो और मुख्य विपक्षी पार्टी भी उनके समर्थन में हो। नवाज शरीफ ने संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र बुलाकर अपनी शक्ति दिखाने का फैसला किया है। नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल करना इसलिए भी आसान नहीं होगा, क्योंकि आज भी पाकिस्तान में सबसे ज्यादा जनाधार उनका ही है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट भी इस विवाद में उतर आया है। सुप्रीम कोर्ट ने उसी वक्त के आसपास अपनी शक्ति भी हासिल की थी, जब पाकिस्तान में छह साल पहले चुनाव हुए थे। सुप्रीम कोर्ट सेना से झगड़ा नहीं मोल लेना चाहेगा, लेकिन यह न्यायपालिका भी जानती है कि सेना का वर्चस्व बढ़ा, तो उसकी शक्ति नाममात्र की रह जाएगी। सेना अब पाकिस्तान में सीधे सत्ता नहीं संभालना चाहती, लेकिन वह लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत भी नहीं होने देना चाहती। पाकिस्तान के तमाम लोकतांत्रिक नेताओं ने कभी न कभी सेना की कठपुतली बनकर चुनी हुई सरकार को गिराने का काम किया है। अब नवाज शरीफ और पीपीपी के नेताओं ने तो सबक सीख लिया है, लेकिन सेना को इमरान और कादरी वही खेल खेलने को मिल गए हैं। इससे पाकिस्तान में स्थायी लोकतंत्र की उम्मीद फिर दूर हो गई है।
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पाकिस्तान का संकट
जनसत्ता 3 सितंबर, 2014: आज पाकिस्तान जिस राजनीतिक संकट में फंसा दिखता है उससे कई सवाल उठे हैं। पाकिस्तान की सियासत पर इस घटनाक्रम का क्या असर पड़ेगा। क्या नवाज शरीफ की सरकार बनी रहेगी। क्या इस मौके का फायदा उठा कर फौज एक बार फिर सत्ता संचालन अपने हाथ में ले लेगी। पाकिस्तान को अपने इतिहास के आधे से ज्यादा समय सेना के अधीन रहना पड़ा है। जब सेना का सीधा नियंत्रण नहीं होता तब भी उसका हस्तक्षेप या उसकी दखलंदाजी का अंदेशा बना रहता है। जनतंत्र की कमजोर बुनियाद पर खड़े पाकिस्तान के हालात इस वक्त बड़े नाजुक हैं। इमरान खान और ताहिर उल-कादरी अपने-अपने हजारों समर्थकों के साथ कई दिनों से राजधानी इस्लामाबाद में डेरा डाले हुए हैं और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके विरोध-प्रदर्शनों से कैसे निपटें। इमरान खान का आरोप है कि पिछले साल हुए चुनावों में नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुसलिम लीग (नवाज) ने जमकर धांधली की थी, इसलिए उनका चुनाव अवैध है। लिहाजा, शरीफ इस्तीफा दें और फिर से चुनाव कराए जाएं।
पाकिस्तानी अवामी तहरीक के नेता कादरी भी चाहते हैं कि शरीफ पद छोड़ें। दूसरी तरफ नवाज शरीफ की पार्टी को संसद में बहुमत तो हासिल है ही, इस समय मुख्य विपक्षी पार्टी भी उनके समर्थन में है। इस्तीफे की मांग के आगे न झुकने के अपने रुख पर नवाज शरीफ अडिग हैं, पर विरोध-प्रदर्शनों से निपटना उनके लिए काफी मुश्किल साबित हो रहा है। खबर है कि सेनाध्यक्ष उनसे मिल कर यह सलाह दे चुके हैं कि प्रदर्शनकारियों से निपटने में वे संयम बरतें और संकट का समाधान बातचीत से निकालने की कोशिश करें। पर जहां प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कम पर इमरान खान राजी नहीं हैं, वहां बातचीत से कोई रास्ता खुले भी तो कैसे। कादरी तो इंकलाब लाने की भी बात करते हैं। अगर शरीफ पद छोड़ भी दें, तो पाकिस्तान के आम लोगों की जिंदगी कैसे फौरन संवर जाएगी यह कादरी ही जानते होंगे। इमरान खान ने क्रिकेट के नायक के तौर पर मिली लोकप्रियता के बल पर अपनी सियासी पारी शुरू की थी। उनकी छवि साफ-सुथरी रही है, जिसने भ्रष्टाचार के आरोपों से दागदार पाकिस्तान की राजनीति में उन्हें अलग पहचान दिलाई है। लेकिन तालिबान के प्रति उनके नरम रुख ने बहुत-से लोगों को निराश किया है। फिर नीतिगत मसलों पर उनका नजरिया साफ नहीं रहा है। इमरान खान सामाजिक असंतोष को भुनाना और लोकलुभावन भाषा बोलना भले जानते हों, पर कई बार वे परिपक्व राजनेता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। प्रधानमंत्री के आवास की घेराबंदी का उनका आह्वान खुद उनकी पार्टी के अध्यक्ष को रास नहीं आया। रविवार को इमरान के समर्थक प्रधानमंत्री के आवास में घुस गए। फिर पुलिस की कार्रवाई में तीन लोग मारे गए और दो सौ से ज्यादा घायल हो गए। अगले रोज प्रदर्शनकारियों ने सरकारी टीवी चैनल के दफ्तर पर धावा बोल दिया, जिसके कारण प्रसारण कुछ देर के लिए बंद रहा। क्या इमरान यही चाहते हैं कि पुलिस अधिकारी अधिक से अधिक सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर हों और फिर ऐसी स्थितियां बनें कि नवाज शरीफ और लाचार हो जाएं। लेकिन वैसे हालात में सेना के दखल की गुंजाइश बढ़ जाएगी। यह विडंबना ही है कि जो लोग चुनाव में धांधली का मसला उठा रहे हैं, वे अपने देश में लोकतंत्र के भविष्य को लेकर संवेदनशील नजर नहीं आते।
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Sun, 07 Sep 2014
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जिन मौजूदा चुनौतियों और अराजकता से जूझना पड़ रहा है, उससे पाकिस्तान के समक्ष महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या पूर्ववर्ती की तरह लगातार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई नवाज शरीफ सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी? अथवा देश में 'राजनीतिक अस्थिरता' का माहौल बढ़ेगा जैसा कि इसके अतीत-सातवें दशक में जनरल अयूब खान, नवें दशक में जियाउल हक और 2008 में परवेज मुशर्रफ के दौर को देखने पर पता चलता है। शरीफ सरकार इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास कर रही है लेकिन पाकिस्तान के कमजोर लोकतांत्रिक ढांचे के कारण विद्वानों और विश्लेषकों के मन में इसको लेकर शंका है। मई, 2013 में लोकतांत्रिक रूप से सत्ता के हस्तांतरण के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की प्रधानमंत्री के रूप में वापसी दर्शाता है कि वहां लोकतंत्र और राजनीति धीरे-धीरे क्रमिक रूप से परिपक्व हो रही है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के 67 वर्षो के इतिहास में आधे से अधिक समय तक सैन्य शासन काबिज रहा है।
यह पाकिस्तान की कड़वी सच्चाई है कि सैन्य हस्तक्षेप ने राजनीतिक दलों और संस्थाओं को लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत करने का अवसर नहीं दिया है। लोकतंत्र को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है इस वजह से लोकतांत्रिक सिद्धांत, संस्थाएं और प्रक्रियाएं राजनीति में जड़ें जमाकर विकसित नहीं हो सकीं। 1958 में पहले सैन्य तख्तापलट से काफी पहले ही प्रभुत्व तबका पाकिस्तान में उदार लोकतंत्र के अव्यवहारिक होने की बात करता था। इस वजह से पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान के संबंध में बहस लोकतांत्रिक या किसी अन्य रूप में अभी तक पूरी नहीं हो सकी। अभी तक ऐसा स्थिर राजनीतिक तंत्र भी विकसित नहीं किया जा सका है जो सेना पर सिविल शासन की सर्वोच्चता स्थापित करता हो जिसकी कल्पना मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी। देश में समग्र रूप से सहयोग के मजबूत आधार के बिना सिविल सरकार उच्च प्रशिक्षित और अनुशासित पाकिस्तानी सेना का मुकाबला नहीं कर सकती जोकि हमेशा राजनेताओं के डगमगाने की स्थिति में हस्तक्षेप करने को तैयार रहती है। कई पाकिस्तानी विश्लेषकों ने इसे कारपोरेट संस्था के रूप में परिभाषित किया है जो देश की सबसे प्रभावी राजनीतिक पार्टी की तरह कार्य करती है। भारत की तरह पाकिस्तान ने भी भारत सरकार एक्ट, 1935 को कुछ फेरबदल के साथ स्वतंत्र देश के अंतरिम संविधान के रूप में 1947 में अंगीकार कर लिया। इससे शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया गया। हालांकि गवर्नर-जनरल के पास विशेष शक्तियां थीं और संघीय सरकार प्रांतीय सरकारों पर प्रभावी हस्तक्षेप करने संबंधी कुछ शक्तियों से लैस थी। शुरुआती शासकों ने राजनीतिक तंत्र में लोकतंत्र विकसित करने पर बहुत जोर नहीं दिया क्योंकि उनकी मुख्य चिंता यह रही कि किस तरह देश को अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों से बचाकर सुरक्षित रखा जाये। देश को ढहने से बचाने के भय के क्रम में अधिकारवादी शासन और राजनीतिक प्रबंधन को लागू किया गया। पाकिस्तान जब अपनी शुरुआती प्रशासकीय और प्रबंधकीय समस्याओं को निपटाने की कोशिशों में लगा था तभी उसके अस्तित्व में आने के 13 महीनों के बाद सितंबर, 1948 में जिन्ना की मृत्यु हो गई। इसके चलते पहले से ही कमजोर राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का कालान्तर में क्षरण होता गया। जिन्ना के बाद के दौर के नेताओं की राष्ट्रीय अपील नहीं थी और उनका क्षेत्रीय या स्थानीय कद था। इसके चलते राजनीति में क्षेत्रवाद और स्थानीयता को बढ़ावा मिला। नतीजतन राजनीतिक दलों और नेताओं को देश के शुरुआती वर्षो की समस्याओं को निपटाने में एक सुसंगत दृष्टिकोण को विकसित करने में कठिनाई पैदा हो गई। लिहाजा राजनीतिक व्यवस्था के क्रियात्मक स्वरूप को विकसित करने के लिए गहरे स्तर पर सर्वसम्मति बनाने में नाकाम रहे और संविधान के ढांचे को बनाने में उनको साढ़े आठ साल लग गए। इसमें भी सभी बड़े दलों का व्यापक समर्थन भी उनको नहीं मिल सका। 23 मार्च, 1956 को संविधान के अस्तित्व में आने तक संसदीय नियमों के उल्लंघन की मजबूत परंपरा विकसित हो चुकी थी। राजनीतिक दल विभाजित थे और असेंबली खुद की सर्वोच्चता स्थापित करने में नाकाम रही। लिहाजा प्रभावी शक्तियां गवर्नर जनरल/राष्ट्रपति की तरफ हस्तांतरित हो गई।
पाकिस्तानी राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र में गंभीर खामियों को दर्शाती है। ऐसे भी मौके आए हैं जब लोकतंत्र और सहभागी शासन या पूर्ण रूप से अस्तित्व में ही नहीं रहा है या इसकी गुणवत्ता बहुत कमजोर रही है। इसके विपरीत राच्य की मशीनरी मसलन नौकरशाही, सेना और खुफिया एजेंसियां राजनीतिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की तुलना में अधिक संगठित और विकसित हुई। जनरल जियाउल हक के सैन्य शासन के दौरान सिविल और मिलिट्री खुफिया एजेंसियों ने राजनीतिक क्षेत्र में अपना विस्तार किया। उन्होंने राजनीतिक ताकत को विभाजित और कमजोर कर दिया। उनमें से कुछ एजेंसियां 1988 से ही सक्रिय राजनीतिक रोल निभा रही हैं और सेना के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए कुछ राजनीतिक दलों और समूहों को सहयोग कर रही हैं। वे चुनावों में हस्तक्षेप करती हैं जिससे चुनावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाता है। खुफिया एजेंसियों के सक्रिय भूमिका निभाने के कारण सिविल राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का स्वत: विकास बाधित हो गया है।
पाकिस्तान में प्रभावी बहुमत इस बात पर सहमत है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था का संबंध निश्चित रूप से इस्लाम होना चाहिए। इस्लामिक स्टेट के अंतर्गत संस्थाओं और प्रक्रियाओं के गठन के मसले पर सहमति नहीं है। दूसरी बहस जिन्ना के राजनीतिक झुकाव से सरोकार रखती है - क्या उन्होंने एक आदर्श इस्लामिक स्टेट अथवा इस्लाम से कोई भी संबंध नहीं रखने वाले धर्मनिरपेक्ष तंत्र अथवा इस्लाम को स्त्रोत मानने वाले कानून और आचार वाले आधुनिक लोकतांत्रिक देश की वकालत की? इस्लाम के पाकिस्तानी राष्ट्र और राजनीतिक तंत्र के साथ संबंधों की अनसुलझी बहस के चलते लोकतंत्र की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ा है। जब तक संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक तंत्र में इस बहस पर कोई सहमति नहीं बन पाएगी तब तक टिकाऊ लोकतांत्रिक संस्थाएं और प्रक्रियाएं पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाएंगी।
- प्रो उमा सिंह [स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू, नई दिल्ली]
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Sun, 07 Sep 2014
जिन आतंकी संगठनों के बूते कभी वह अपने मकसद को पाने का विचार किया करता था, आज उसके लिए नासूर बन चुके हैं। आए दिन बम धमाकों ने पूरे देश को दहला रखा है। इस साल अगस्त तक देशभर में 277 आतंकी हमलों में 511 लोग मारे गए जबकि 1400 से अधिक लोग घायल हुए हैं। पूरे देश में पांच प्रकार के आतंकी संगठन सक्रिय हैं। मजहबी: इनमें सुन्नियों का संगठन सिपह-ए-साहबा और लश्करे झांगवी और शियाओं का तहरीक-ए-जाफ्रिया हिंसा फैलाने में मशगूल हैं। भारत विरोधी: सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ की शह पर काम करते हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद और हरकत-उल-मुजाहिदीन प्रमुख हैं। अफगान तालिबान: मूल तालिबान आंदोलन और मुल्ला मुहम्मद उमर के इर्द-गिर्द केंद्रित कांधारी नेतृत्व के बारे में माना जाता है कि आजकल क्वेटा में जमे हुए हैं। अलकायदा और इसके सहयोगी: ओसामा के मारे जाने के बाद आयमन अल जवाहिरी के नेतृत्व में यह संगठन सक्रिय है। पाकिस्तानी तालिबान: मुल्ला फजलुल्लाह के नेतृत्व में जनजातीय इलाकों में कई अतिवादी समूहों का गठबंधन काम कर रहा है।
साक्षरता दर
खस्ताहाल साक्षरता को बढ़ाने के लिए कई प्रयास हुए लेकिन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रुकावटों ने सपने को साकार नहीं होने दिया। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार कुल साक्षरता दर 46 फीसद है जिसमें लड़कियों की हिस्सेदारी महज 26 फीसद है। स्वतंत्र स्नोतों की मानें तो कुल साक्षरता दर महज 26 फीसद है जिसमें लड़कियों की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत है। पाकिस्तान में कुल 1.63 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं जिनमें 40 हजार में ही लड़कियों को शिक्षा दी जाती है। विफल राष्ट्र: फॉरेन पॉलिसी द्वारा तैयार विफल राष्ट्रों की सूची के अनुसार पाकिस्तान 13वां सबसे विफल राष्ट्र है। जनसंख्या, असमान विकास, आर्थिक हालात, सार्वजनिक सेवा, सुरक्षा तंत्र समेत 12 मानकों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। देश कई भागों में रोज औसतन 20 घंटे बिजली नहीं रहती। कई इलाकों में शिक्षा का पूर्ण अभाव है। अफगानिस्तान से सटे कबायली इलाके एक तरह से स्वतंत्र हैं और वहां के पुरुष संगठित अपराध में शामिल हैं।
लैंगिक असमानता
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2013 के अनुसार लैंगिक समानता और महिलाओं व पुरुषों में मौकों और संसाधनों के बराबर बंटवारे के मामले में पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन वाला देश है। लैंगिक असमानता में सबसे ऊपर यमन है।
सामाजिक आर्थिक चुनौतियां
आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान में सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं है। गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी खामियों के मकड़जाल में यह तेजी से घिरता जा रहा है।
मानवाधिकारों का हनन
2014 ह्युमन राइट रिस्क एटलस के मुताबिक इस मोर्चे पर भी देश का प्रदर्शन लचर है।
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राष्ट्र की जड़ों में घुला है
सेना का जहर
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जिन मौजूदा चुनौतियों और अराजकता से जूझना पड़ रहा है, उससे पाकिस्तान के समक्ष महत्वपूर्ण सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या पूर्ववर्ती की तरह लगातार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई नवाज शरीफ सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर पाएगी? अथवा देश में 'राजनीतिक अस्थिरता' का माहौल बढ़ेगा जैसा कि इसके अतीत-सातवें दशक में जनरल अयूब खान, नवें दशक में जियाउल हक और 2008 में परवेज मुशर्रफ के दौर को देखने पर पता चलता है। शरीफ सरकार इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास कर रही है लेकिन पाकिस्तान के कमजोर लोकतांत्रिक ढांचे के कारण विद्वानों और विश्लेषकों के मन में इसको लेकर शंका है। मई, 2013 में लोकतांत्रिक रूप से सत्ता के हस्तांतरण के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की प्रधानमंत्री के रूप में वापसी दर्शाता है कि वहां लोकतंत्र और राजनीति धीरे-धीरे क्रमिक रूप से परिपक्व हो रही है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के 67 वर्षो के इतिहास में आधे से अधिक समय तक सैन्य शासन काबिज रहा है।
यह पाकिस्तान की कड़वी सच्चाई है कि सैन्य हस्तक्षेप ने राजनीतिक दलों और संस्थाओं को लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत करने का अवसर नहीं दिया है। लोकतंत्र को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है इस वजह से लोकतांत्रिक सिद्धांत, संस्थाएं और प्रक्रियाएं राजनीति में जड़ें जमाकर विकसित नहीं हो सकीं। 1958 में पहले सैन्य तख्तापलट से काफी पहले ही प्रभुत्व तबका पाकिस्तान में उदार लोकतंत्र के अव्यवहारिक होने की बात करता था। इस वजह से पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान के संबंध में बहस लोकतांत्रिक या किसी अन्य रूप में अभी तक पूरी नहीं हो सकी। अभी तक ऐसा स्थिर राजनीतिक तंत्र भी विकसित नहीं किया जा सका है जो सेना पर सिविल शासन की सर्वोच्चता स्थापित करता हो जिसकी कल्पना मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी। देश में समग्र रूप से सहयोग के मजबूत आधार के बिना सिविल सरकार उच्च प्रशिक्षित और अनुशासित पाकिस्तानी सेना का मुकाबला नहीं कर सकती जोकि हमेशा राजनेताओं के डगमगाने की स्थिति में हस्तक्षेप करने को तैयार रहती है। कई पाकिस्तानी विश्लेषकों ने इसे कारपोरेट संस्था के रूप में परिभाषित किया है जो देश की सबसे प्रभावी राजनीतिक पार्टी की तरह कार्य करती है। भारत की तरह पाकिस्तान ने भी भारत सरकार एक्ट, 1935 को कुछ फेरबदल के साथ स्वतंत्र देश के अंतरिम संविधान के रूप में 1947 में अंगीकार कर लिया। इससे शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया गया। हालांकि गवर्नर-जनरल के पास विशेष शक्तियां थीं और संघीय सरकार प्रांतीय सरकारों पर प्रभावी हस्तक्षेप करने संबंधी कुछ शक्तियों से लैस थी। शुरुआती शासकों ने राजनीतिक तंत्र में लोकतंत्र विकसित करने पर बहुत जोर नहीं दिया क्योंकि उनकी मुख्य चिंता यह रही कि किस तरह देश को अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों से बचाकर सुरक्षित रखा जाये। देश को ढहने से बचाने के भय के क्रम में अधिकारवादी शासन और राजनीतिक प्रबंधन को लागू किया गया। पाकिस्तान जब अपनी शुरुआती प्रशासकीय और प्रबंधकीय समस्याओं को निपटाने की कोशिशों में लगा था तभी उसके अस्तित्व में आने के 13 महीनों के बाद सितंबर, 1948 में जिन्ना की मृत्यु हो गई। इसके चलते पहले से ही कमजोर राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का कालान्तर में क्षरण होता गया। जिन्ना के बाद के दौर के नेताओं की राष्ट्रीय अपील नहीं थी और उनका क्षेत्रीय या स्थानीय कद था। इसके चलते राजनीति में क्षेत्रवाद और स्थानीयता को बढ़ावा मिला। नतीजतन राजनीतिक दलों और नेताओं को देश के शुरुआती वर्षो की समस्याओं को निपटाने में एक सुसंगत दृष्टिकोण को विकसित करने में कठिनाई पैदा हो गई। लिहाजा राजनीतिक व्यवस्था के क्रियात्मक स्वरूप को विकसित करने के लिए गहरे स्तर पर सर्वसम्मति बनाने में नाकाम रहे और संविधान के ढांचे को बनाने में उनको साढ़े आठ साल लग गए। इसमें भी सभी बड़े दलों का व्यापक समर्थन भी उनको नहीं मिल सका। 23 मार्च, 1956 को संविधान के अस्तित्व में आने तक संसदीय नियमों के उल्लंघन की मजबूत परंपरा विकसित हो चुकी थी। राजनीतिक दल विभाजित थे और असेंबली खुद की सर्वोच्चता स्थापित करने में नाकाम रही। लिहाजा प्रभावी शक्तियां गवर्नर जनरल/राष्ट्रपति की तरफ हस्तांतरित हो गई।
पाकिस्तानी राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र में गंभीर खामियों को दर्शाती है। ऐसे भी मौके आए हैं जब लोकतंत्र और सहभागी शासन या पूर्ण रूप से अस्तित्व में ही नहीं रहा है या इसकी गुणवत्ता बहुत कमजोर रही है। इसके विपरीत राच्य की मशीनरी मसलन नौकरशाही, सेना और खुफिया एजेंसियां राजनीतिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं की तुलना में अधिक संगठित और विकसित हुई। जनरल जियाउल हक के सैन्य शासन के दौरान सिविल और मिलिट्री खुफिया एजेंसियों ने राजनीतिक क्षेत्र में अपना विस्तार किया। उन्होंने राजनीतिक ताकत को विभाजित और कमजोर कर दिया। उनमें से कुछ एजेंसियां 1988 से ही सक्रिय राजनीतिक रोल निभा रही हैं और सेना के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए कुछ राजनीतिक दलों और समूहों को सहयोग कर रही हैं। वे चुनावों में हस्तक्षेप करती हैं जिससे चुनावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाता है। खुफिया एजेंसियों के सक्रिय भूमिका निभाने के कारण सिविल राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का स्वत: विकास बाधित हो गया है।
पाकिस्तान में प्रभावी बहुमत इस बात पर सहमत है कि देश की राजनीतिक व्यवस्था का संबंध निश्चित रूप से इस्लाम होना चाहिए। इस्लामिक स्टेट के अंतर्गत संस्थाओं और प्रक्रियाओं के गठन के मसले पर सहमति नहीं है। दूसरी बहस जिन्ना के राजनीतिक झुकाव से सरोकार रखती है - क्या उन्होंने एक आदर्श इस्लामिक स्टेट अथवा इस्लाम से कोई भी संबंध नहीं रखने वाले धर्मनिरपेक्ष तंत्र अथवा इस्लाम को स्त्रोत मानने वाले कानून और आचार वाले आधुनिक लोकतांत्रिक देश की वकालत की? इस्लाम के पाकिस्तानी राष्ट्र और राजनीतिक तंत्र के साथ संबंधों की अनसुलझी बहस के चलते लोकतंत्र की संभावनाओं पर बुरा असर पड़ा है। जब तक संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक तंत्र में इस बहस पर कोई सहमति नहीं बन पाएगी तब तक टिकाऊ लोकतांत्रिक संस्थाएं और प्रक्रियाएं पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाएंगी।
- प्रो उमा सिंह [स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू, नई दिल्ली]
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पाकिस्तान की परेशानी
Sun, 07 Sep 2014
जिन आतंकी संगठनों के बूते कभी वह अपने मकसद को पाने का विचार किया करता था, आज उसके लिए नासूर बन चुके हैं। आए दिन बम धमाकों ने पूरे देश को दहला रखा है। इस साल अगस्त तक देशभर में 277 आतंकी हमलों में 511 लोग मारे गए जबकि 1400 से अधिक लोग घायल हुए हैं। पूरे देश में पांच प्रकार के आतंकी संगठन सक्रिय हैं। मजहबी: इनमें सुन्नियों का संगठन सिपह-ए-साहबा और लश्करे झांगवी और शियाओं का तहरीक-ए-जाफ्रिया हिंसा फैलाने में मशगूल हैं। भारत विरोधी: सेना और खुफिया एजेंसी आइएसआइ की शह पर काम करते हैं। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद और हरकत-उल-मुजाहिदीन प्रमुख हैं। अफगान तालिबान: मूल तालिबान आंदोलन और मुल्ला मुहम्मद उमर के इर्द-गिर्द केंद्रित कांधारी नेतृत्व के बारे में माना जाता है कि आजकल क्वेटा में जमे हुए हैं। अलकायदा और इसके सहयोगी: ओसामा के मारे जाने के बाद आयमन अल जवाहिरी के नेतृत्व में यह संगठन सक्रिय है। पाकिस्तानी तालिबान: मुल्ला फजलुल्लाह के नेतृत्व में जनजातीय इलाकों में कई अतिवादी समूहों का गठबंधन काम कर रहा है।
साक्षरता दर
खस्ताहाल साक्षरता को बढ़ाने के लिए कई प्रयास हुए लेकिन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रुकावटों ने सपने को साकार नहीं होने दिया। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार कुल साक्षरता दर 46 फीसद है जिसमें लड़कियों की हिस्सेदारी महज 26 फीसद है। स्वतंत्र स्नोतों की मानें तो कुल साक्षरता दर महज 26 फीसद है जिसमें लड़कियों की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत है। पाकिस्तान में कुल 1.63 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं जिनमें 40 हजार में ही लड़कियों को शिक्षा दी जाती है। विफल राष्ट्र: फॉरेन पॉलिसी द्वारा तैयार विफल राष्ट्रों की सूची के अनुसार पाकिस्तान 13वां सबसे विफल राष्ट्र है। जनसंख्या, असमान विकास, आर्थिक हालात, सार्वजनिक सेवा, सुरक्षा तंत्र समेत 12 मानकों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। देश कई भागों में रोज औसतन 20 घंटे बिजली नहीं रहती। कई इलाकों में शिक्षा का पूर्ण अभाव है। अफगानिस्तान से सटे कबायली इलाके एक तरह से स्वतंत्र हैं और वहां के पुरुष संगठित अपराध में शामिल हैं।
लैंगिक असमानता
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2013 के अनुसार लैंगिक समानता और महिलाओं व पुरुषों में मौकों और संसाधनों के बराबर बंटवारे के मामले में पाकिस्तान दुनिया का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन वाला देश है। लैंगिक असमानता में सबसे ऊपर यमन है।
सामाजिक आर्थिक चुनौतियां
आर्थिक रूप से बदहाल पाकिस्तान में सामाजिक चुनौतियां भी कम नहीं है। गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी खामियों के मकड़जाल में यह तेजी से घिरता जा रहा है।
मानवाधिकारों का हनन
2014 ह्युमन राइट रिस्क एटलस के मुताबिक इस मोर्चे पर भी देश का प्रदर्शन लचर है।
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