मुश्किल पड़ोसी
17-07-14
जब भारत अपने पड़ोसियों से रिश्ते सुधारने के लिए नए सिरे से कोशिशें कर रहा है, तभी सीमा पर कुछ ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जिनसे विवाद पैदा हो सकता है। चीन की सेना ने पिछले दिनों दो बार भारतीय सीमा में घुसपैठ की। दोनों बार 30 मिनट की बैनर ड्रिल के बाद वह लौट गई। बैनर ड्रिल दोनों देशों के बीच सहमति से तय हुई कार्रवाई है, जिसमें दूसरे देश को बिना कुछ बोले बैनर के जरिये घुसपैठ न करने की चेतावनी दी जाती है। चीन की सेना ने यह घुसपैठ उस वक्त की, जब हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स सम्मेलन में एक साथ थे। इससे ज्यादा गंभीर घटना पाकिस्तान सीमा पर हुई है, जिसमें पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी से बीएसएफ का एक जवान शहीद हो गया और कुछ अन्य घायल हुए हैं। चीन और पाकिस्तान से रिश्ते सुधारना हर भारतीय प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं में रहता है। नई सरकार के बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क नेताओं को बुलाया था, उसमें भी यह संदेश निहित था कि पड़ोसियों से रिश्ते सुधारना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। थोड़ी-बहुत दिक्कतें बांग्लादेश के साथ भी हैं, लेकिन बांग्लादेश से हमारे संबंध ऐसे हैं कि वे दिक्कतें गंभीर रूप नहीं लेतीं। चीन व पाकिस्तान की सीमाओं पर कुछ गड़बड़ी होती रहती है। चीन से हमारे रिश्ते आम तौर पर शांतिपूर्ण हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी फल-फूल रहे हैं। इसके बावजूद चीन यह याद दिलाना नहीं भूलता कि सीमा को लेकर दोनों देशों में विवाद है। ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान घुसपैठ करना भी इसी चीनी रवैये का नतीजा था। चीन शायद यह संदेश देना चाहता था कि साझा बैंक बनाना हो या अन्य क्षेत्रों में सहयोग, इन बातों से सीमा विवाद पर उसका रुख जरा भी नहीं बदलेगा। अच्छी बात यह है कि दोनों देशों ने सीमा पर एक तंत्र बना दिया है, जिससे विवाद ज्यादा गंभीर नहीं होगा। चीन भारत के खिलाफ दबाव बनाए रखने के लिए सीमा के सवाल को लगातार सक्रिय बनाए रखता है। पाकिस्तान के साथ मामला ज्यादा गंभीर इसलिए है कि पाकिस्तानी सेना यह मानती है या यह मानना उसे सुविधाजनक लगता है कि भारत से उसे खतरा है। कश्मीर का मसला भी दोनों देशों के बीच संबंधों को नाजुक बनाए रखता है। पाकिस्तान में तमाम आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं, जो भारत को अपना दुश्मन मानते हैं और आईएसआई की मदद से भारत के खिलाफ हिंसक वारदात करते रहते हैं। पाकिस्तान में मौजूद भारत विरोधियों का यह मानना है कि भारत को लगातार अस्थिर बनाए रखना उनके हित में है और चीन को भी उनकी इन हरकतों में कुछ हद तक अपना फायदा दिखता है। भारत, चीन और पाकिस्तान, तीनों में सिर्फ भारत ही एक बाकायदा लोकतंत्र है। चीन में एकाधिकारवादी सत्ता है और पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार तमाम अन्य ताकतों के मुकाबले बहुत कमजोर है। लोकतांत्रिक समाज और सरकार का नजरिया और तौर-तरीके गैर- लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से बहुत अलग होते हैं। गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हथियारों पर कुछ ज्यादा भरोसा करती हैं, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बातचीत और शांतिपूर्ण तरीकों को तरजीह देती हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की कमजोरी नहीं, ताकत है क्योंकि वही लंबे दौर में टिकाऊ साबित होती हैं और अपनी समस्याएं भी बेहतर ढंग से हल करती हैं। इसलिए भारत सरकार और जनता को अपने तरीकों में भरोसा बनाए रखना चाहिए। अपना पड़ोस मुश्किलें पैदा करने वाला है, लेकिन देश अपने पड़ोसी बदल भी नहीं सकते।
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ठीक नहीं चीन की नकल
Tuesday,Jul 22,2014
संप्रग सरकार द्वारा लागू किए गए भूमि अधिग्रहण कानून में राजग सरकार संशोधन करने के मूड में है। वर्तमान कानून में 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की मंजूरी के बाद ही अधिग्रहण किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह है कि बागी किसानों को छोड़कर अन्य सब सहमत हों तभी जबरन अधिग्रहण करना चाहिए। इस प्रावधान को नरम बनाकर अब केवल 51 प्रतिशत की सहमति बनाने पर विचार किया जा रहा है। जन सुनवाई तथा सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन रपट को भी समाप्त करने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान कानून में 'प्रभावितों' में खेत मजदूर तथा बटाईदार सम्मलित हैं, लेकिन अब केवल किसान को प्रभावित मानने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान में कृषि भूमि के अधिग्रहण के लिए सरकार को सर्टिफिकेट देना होता है कि बंजर भूमि उपलब्ध नहीं है। इसे हटाने पर विचार किया जा रहा है। इन संशोधनों से भूमि अधिग्रहण तेजी से हो सकेगा और बड़े प्रोजेक्टों को शीघ्र क्रियान्वित किया जा सकेगा। संभवत: राजग सरकार को चीन का मॉडल दिखता है। भूमि अधिग्रहण आसान होने से वहां बड़े प्रोजेक्टों को लागू करना आसान है। चीन में कृषि भूमि पर किसानों का मालिकाना हक होता है। इस भूमि को पहले स्थानीय सरकार अधिग्रहित करती है फिर किसानों के साथ वार्ता करके भूमि का मूल्य तय किया जाता है। कम से कम बाजार भाव के बराबर मूल्य दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर बाजार भाव से 40 प्रतिशत अधिक भी दिया जाता है। इसके बाद सरकार द्वारा भूमि की नीलामी की जाती है। भूमि को दस गुना मूल्य तक बेचा जाता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय सरकारें भारी लाभ कमाती हैं। इन सरकारों पर कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों का वर्चस्व होता है। अधिग्रहण के विरोध में किसानों के पास कानूनी संरक्षण शून्यप्राय हैं। असंतुष्ट होने पर किसान अदालत नहीं जा सकते। यह प्रक्रिया किसान विरोधी है, जिससे उनमें भारी रोष व्याप्त है। वर्ष 2010 में चीन के 10 बड़े जनआंदोलनों में पांच भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध थे। सुजाऊ शहर में किसानों ने टाउनहॉल पर जबरन कब्जा कर लिया। दो सप्ताह तक किसानों और पुलिस के बीच संघर्ष चला। इसके बाद पुलिस ने इन्हें जबरन निकाल दिया। शीजियांग शहर में अधिग्रहण के विरोध में किसान बीजिंग जाने को उतारू हुए, लेकिन पुलिस ने नाकेबंदी करके उन्हें रोक दिया। बस ड्राइवरों को धमकाया गया। तब किसान 50 किलोमीटर पैदल चलकर दूसरे रास्ते से बीजिंग जाने को निकले। पुलिस ने 30 गाड़ियां भेजकर पुन: इन्हें रोका और इन्हें टाउनहॉल ले आए। यहां किसानों ने उत्पात किया और टाउनहॉल और 18 पुलिस कारों की तोड़फोड़ की। शियांग यी शहर की सरकार ने 60 गाड़ियों को ताओबू गांव में भूमि पर खड़े मकानों को गिराने के लिए भेजा। किसानों ने मशाल जलाकर एक-दूसरे को सूचना दी और इनका विरोध करने सब एकजुट हो गए। इससे इन्हें वापस जाना पड़ा। किसानों ने 22 सरकारी गाड़ियों पर कब्जा कर लिया। जाओटांग शहर के प्रमुख ने किसानों की भूमि का अधिग्रहण करके डेवलपर को भूमि बेच दी। इस सौदे में प्रमुख ने भारी लाभ कमाया। किसानों ने कंस्ट्रक्शन साइट पर बवाल किया तो शहर के प्रमुख ने 1000 पुलिसकर्मियों तथा गुंडों को भेजा। इस घटना में दो व्यक्तियों की मौत हो गई। इस प्रकार के हजारों विरोध चीन में आए-दिन हो रहे हैं। चीनी व्यवस्था के कुछ सार्थक पहलू भी हैं। कृषि भूमि के अधिग्रहण के लिए राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक है। अधिग्रहित भूमि के बराबर बंजर भूमि पर कृषि करना अनिवार्य है। उद्देश्य है कि कृषि भूमि का अनावश्यक अधिग्रहण न हो। ऐसा ही प्रावधान हमारे कानून में भी डाला गया है। सरकार को प्रमाणपत्र देना होता है कि बंजर भूमि उपलब्ध नहीं है। चीन में क्रेता द्वारा प्रोजेक्ट की संभावना रपट प्रस्तुत की जाती है। यह हमारे कानून में सामाजिक प्रभाव आकलन के समकक्ष है। इससे प्रोजेक्ट के विस्तृत प्रभाव स्पष्ट होते हैं। तीसरा पहलू नीलामी का है। चीन में अधिग्रहीत भूमि की सरकार द्वारा नीलामी की जाती है। इससे लाभ सरकार को जाता है, न कि डेवलपर को। हमारे कानून में ऐसी व्यवस्था नहीं है। हमारे कानून में किसान को ऊंचा मूल्य मिलता है। राजग सरकार को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र है, न कि कम्युनिस्ट शासन। इस प्रकार के जनविरोधी कृत्यों का विरोध करने का चीन की निरीह जनता के पास कोई रास्ता नहीं है, परंतु भारत में विपक्षी नेता ऐसे कृत्यों पर बवाल करेंगे। चीन की जनविरोधी व्यवस्था यहां लागू करना राजग के लिए घातक होगा। ऐसा लगता है कि राजग-2 सरकार ने राजग-1 सरकार के अनुभव से सबक नहीं लिया है। इंडिया के शाइन करने के बावजूद राजग-1 सत्ता से बाहर हो गई थी। उसी दिशा में राजग-2 सरकार भी चलती दिख रही है। डेवलपरों के अनुसार हमारे कानून में भूमि अधिग्रहण करने में लगभग पांच वर्ष लग जाते हैं। सीआइआइ के पूर्व प्रमुख बी. मुथुरामन के अनुसार यह मुख्य परेशानी है। सरकार को चाहिए कि वर्तमान कानून को नरम बनाने के स्थान पर सरल बनाए जिससे प्रक्रिया शीघ्र पूरी हो सके। हालांकि समय इसलिए ज्यादा लगता है कि क्रेता ऊंचे मूल्य नहीं देना चाहते हैं। जैसे 25 लाख रुपये एकड़ का मूल्य दें तो 80 प्रतिशत किसान शीघ्र सहमत हो सकते हैं। इसी सहमति को 10 लाख रुपये के मूल्य पर हासिल करने में समय लगता है। एक जलविद्युत डेवलपर ने मुझे बताया कि उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून का सहारा लिया ही नहीं, क्योंकि वह प्रोजेक्ट को शीघ्र पूरा करना चाहते थे इसलिए उन्होंने किसानों को मुंह मांगा दाम देकर सीधे भूमि को खरीद लिया। यदि उचित मूल्य दिया जाए तो अधिग्रहण शीघ्र हो सकता है। ऊंचा मूल्य देने में अड़चन डब्लूटीओ की दिखती है। भूमि का ऊंचा मूल्य देंगे तो भारत में उत्पादित माल की लागत ज्यादा आएगी और हम आयातों का सामना नहीं कर पाएंगे। अत: राजग सरकार को डब्लूटीओ के ढांचे में जितना हो सके आयात करों को बढ़ाना चाहिए। भूमि अधिग्रहण कानून को नरम नहीं बनाना चाहिए। वास्तव में इसे और सख्त बनाने की जरूरत है। संसद की स्थायी समिति ने सुझाव दिया था कि जंगल संरक्षण कानून की तरह कृषि संरक्षण कानून बनाना चाहिए। केंद्र सरकार की अनुमति के बिना कृषि भूमि का अधिग्रहण नहीं करना चाहिए। मध्यम वर्गीय उपभोक्ता को सस्ता माल उपलब्ध कराने के लिए देश की खाद्य सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाना चाहिए।
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अर्थव्यवस्था की गति
Sun, 21 Sep 2014
उदारीकरण के बाद दोनों देशों की विकास दर तेज हुई, लेकिन चीन ने यह काम 1978 में कर दिया था जबकि भारत 1991 में यह कमाल कर सका। चीन की 13 साल की यह बढ़त आज भले ही बड़े अंतर में तब्दील हो गई हो, लेकिन उदारीकरण के बाद दोनों देशों के शुरुआती वर्षो में विकास और अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतक एक सी कहानी कहते हैं। यानी दोनों देशों ने विकास के मोर्चे पर समान रफ्तार पकड़ी थी। उदारीकरण के बाद निर्यात, विदेशी निवेश, जैसे विकास के जरूरी तत्व दोनों देशों में समान दर से बढ़े। मुद्रास्फीति के समायोजन के बाद पिछले साल भारत में प्रति व्यक्ति आउटपुट चीन के साल 2000 जैसा था। हालांकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था के विकास की प्रवृत्ति में समानताओं के साथ असमानताएं भी कम नहीं हैं। 2001 में चीन की अर्थव्यवस्था जितना अधिक मैन्युफैक्चरिंग उन्मुख थी, भारत की आज भी नहीं है। भारतीय विकास के गति को ईधन उसका सेवा क्षेत्र जैसे साफ्टवेयर और बीपीओ देते हैं। चीन के विकास के रास्ते पर अगर भारत को आगे बढ़ना है तो कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग पर दांव खेलना होगा।
निवेश का सूखा
चीनी सामानों से भले ही भारतीय बाजार पटे पड़े हों, लेकिन निवेश के मामले में चीनी कंपनियों का रुख बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। शी चिनफिंग की यात्रा के दौरान चीन द्वारा पांच सालों में 20 अरब डॉलर भारत में निवेश का समझौता हुआ है। वर्तमान में भारत में चीनी निवेश की हालत बहुत खस्ता है। यहां तक की चीन से अधिक निवेश तो पोलैंड, मलेशिया और कनाडा जैसे देश करते हैं। ऐसा भी नहीं कि वह विदेश में निवेश नहीं करता है। युनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस आन ट्रेड एंड डेवलपमेंट के आंकड़ों पर गौर करें तो वैश्विक मंच पर पिछले साल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में चीन तीसरा सबसे बड़ा निवेशक रहा है। 100 अरब डॉलर से अधिक का निवेश इसने विभिन्न देशों में कर रखा है।
सामाजिक कल्याण
सामाजिक कल्याण के कई मोचरें पर चीन उदारीकरण करने से पहले से ही भारत से आगे था।
जन्म के समय जीवन प्रत्याशा
2012 में भारत की जो जीवन प्रत्याशा थी वह चीन के 1977 के बराबर थी। यह भारत को 35 साल पीछे धकेलती है। 1991 में जब भारत ने उदारीकरण का दरवाजा खोला तो दोनों देशों की बीच इस मसले का अंतर केवल 23 साल था। उस साल पैदा हुए किसी भारतीय की अनुमानित जीवन प्रत्याशा 59 साल थी जो 1968 में पैदा हुए किसी चीनी नागरिक जैसी थी।
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कितने दूर
Sun, 21 Sep 2014 12:02
कई मसलों पर एशिया के दोनों देशों के बीच मतभेद हैं।
सीमा विवाद
दोनों देशों की बीच 3488 किमी लंबी सीमारेखा है। ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1914 में शिमला समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मैकमहोन रेखा निर्धारित की। चीन इस रेखा को अवैध मानता है लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति भी कमोबेश यही है।
नत्थी वीजा
अरुणाचल प्रदेश व लद्दाख के कुछ विवादित क्षेत्रों के लिए चीन नत्थी वीजा जारी करता है।
ब्रह्मापुत्र पर बांध
चीन के ब्रह्मापुत्र पर डैम बना लेने से इस नदी में 200 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का बहाव कम हो जाएगा।
दक्षिण चीन सागर
चीन को दक्षिण चीन सागर के हिस्से में वियतनाम के साथ मिलकर भारत के प्राकृतिक गैस की खोज का काम करने पर एतराज है। ओएनजीसी की विदेशी शाखा ओएनजीसी विदेश लिमिटेड व वियतनाम की कंपनी पेट्रो वियतनाम मिलकर काम कर रहे हैं। 22 जुलाई 2011 को जब भारतीय नौ सेना का आइएनएस एरावत यहां से होते हुए वियतनाम की मैत्री यात्रा पर गया था, तब भी चीन ने आपत्ति जतायी थी।
तिब्बती शरणार्थी
तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा के भारत में शरण लिए जाने पर चीन आंखें तरेरता रहा है। चीन ने 1950 में तिब्बत को अपने में मिला लिया था।
विदेश में कारोबार
भारत की द. अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में कारोबारी गतिविधियों से चीन सशंकित रहा है।
द्विपक्षीय कारोबार
1978 में व्यापारिक संबंध शुरू हुए। छह साल बाद दोनों ने मोस्ट फेवर्ड नेशन का समझौता हस्ताक्षरित किया। वर्ष 2000 में व्यापार मात्र 2.92 अरब डॉलर था। 2011 में यह 73.9 अरब डॉलर हुआ।
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कितने पास
Sun, 21 Sep 2014
कई ऐसे मसले हैं जिनपर भारत और चीन की रीति-नीति एक सी है। यह भी इन्हें एक नैसर्गिक दोस्त की श्रेणी में खड़ा करने की वजह बनती है।
डब्ल्यूटीओ में फूड सब्सिडी
भारत का डब्ल्यूटीओ में पक्ष है कि खाद्य वस्तुओं व खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों पर अनुदान जारी रहना चाहिए। वहीं डब्ल्यूटीओ के प्रस्तावित ट्रेड फेसिलिटेशन एग्रीमेंट के तहत कुल कृषि उत्पादन मूल्य का 10 प्रतिशत से अधिक अनुदान नहीं दिया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन
दोनों देशों की राय रही है कि यूएन क्लाइमेट समिट ऐसा फोरम नहीं है जिससे पूरे विश्व की जलवायु के विषय पर कोई निर्णय सुनाया जा सके। विकसित व विकासशील देशों में अंतर करना ही होगा।
आतंकवाद
चीन के जिनजियांग में ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट के आतंकी सक्रिय हैं। ईटीआइएम को अलकायदा का संरक्षण प्राप्त है। हालांकि पाकिस्तान को लेकर उसके रुख से सवाल जरूर खड़े होते रहे हैं।
अफगानिस्तान
शांत, स्थिर और समृद्ध अफगानिस्तान दोनों देशों के हित में है।
सीरिया
भारत-चीन का पक्ष रहा है कि किसी देश की संप्रभुता-एकता पर आंच नहीं आनी चाहिए।
वित्तीय प्रणाली में सुधार
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैं जैसी संस्थाओं के नियम-कानूनों में बदलाव लाते हुए कोटा सिस्टम चाहते हैं।
ब्रिक्स
ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक आइएमएफ में अमेरिका के वर्चस्व को देखते हुए खड़ा किया गया है।
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सामरिक संबंधों का त्रिकोण
Mon, 22 Sep 2014
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की दिल्ली यात्रा समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही अमेरिका रवाना होंगे जहां वह संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करेंगे, लेकिन उनका ध्यान मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होने वाली पहली मुलाकात पर केंद्रित होगा। हालांकि मोदी की इस यात्रा का प्रत्यक्ष पहलू यही है कि वह न्यूयार्क में तकरीबन 20,000 भारतीयों से सार्वजनिक संवाद कायम करेंगे, लेकिन इसका कहीं अधिक वास्तविक पहलू वाशिंगटन डीसी से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के समक्ष सामरिक चुनौती एक बड़ी समस्या है। इस मामले में उनके पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत के संदर्भ में त्रिकोणीय संबंधों को लेकर एक बेहतर संतुलन कायम किया था, जिसके एक तरह अमेरिका था तो दूसरी ओर चीन था।
उभरते हुए वृहद वैश्रि्वक आर्थिक परिदृश्य में आगामी दशकों में इस त्रिकोणीय व्यवस्था के तहत 2025 तक अमेरिका को पछाड़ते हुए चीन विश्व की सबसे बड़ी जीडीपी वाली अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इस नई व्यवस्था में अमेरिका चीन से थोड़ा ही पीछे होगा और वह दूसरे स्थान पर होगा, जबकि भारत तीसरे स्थान पर होगा, लेकिन यह दूरी कहीं अधिक होगी। हालांकि इस असंगत हालात में चीन सभी मामलों में दुनिया का सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्र होगा, जबकि अमेरिका सैन्य मामलों में सर्वाधिक ताकतवर राष्ट्र बना रहेगा और वैश्रि्वक मामलों में वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतीक रहेगा। ऐसे में एक तरह की आंतरिक प्रतिस्पर्धा जारी रहेगी और भारत के समक्ष जो चुनौती होगी वह यही कि कैसे वह अपनी जगह बनाता है और दोनों से खुद को बचाए रखते हुए किस तरह इन जटिल हालात में अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाता है तथा नई वैश्रि्वक व्यवस्था में अपनी उपस्थिति बढ़ाता है। इस संदर्भ में शी चिनफिंग की भारत यात्रा महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है जो उनके अहमदाबाद आगमन से शुरू हुई। वहां महात्मा गांधी के आश्रम में उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित की, जो प्रतीकात्मक रूप से परस्पर संबंधों को मजबूत बनाने और मोदी की नीति 'इंच टू माइल्स' की दिशा में एक कदम था। शी चिनफिंग की यात्रा पर भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि केवल भारत और चीन के संबंध ही ऐसे हैं जो नई सहस्नाब्दि में विशिष्ट साम्यता रखते हैं। हालांकि वास्तविक संभावना की दृष्टि से यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य मेल नहीं खाता। भारत और चीन के बीच संबंध बहुत हद तक अविश्वास के घेरे में जकड़े हुए हैं और सुरक्षा तथा सामरिक मतभेदों की वजह से यह बहुत अस्पष्ट हैं। विवादित भूभाग और सीमा के मुद्दे पर चीन बहुत सदाशयी नहीं रहा है। यही कारण है कि एशिया की इन दो बड़ी शक्तियों के बीच अक्टूबर 1962 में एक सीमित युद्ध भी देखने को मिला।
यह भी कम विचित्र नहीं कि शी चिनफिंग की दिल्ली यात्रा इस रिपोर्ट के साथ शुरू हुई कि चुमार क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैन्य टुकड़ियों ने घुसपैठ कर रखी है और इसकी छाया चीनी राष्ट्रपति की यात्रा पर भी रही। इस बारे में तमाम तरह की व्याख्याएं हो रही हैं कि आखिर क्यों इस अत्यधिक उच्च राजनीतिक यात्रा के दौरान चीनी सेना ने ऐसी गतिविधि को अंजाम दिया? यह अप्रैल 2013 की याद दिलाता है जब चीनी प्रधानमंत्री ने भारत का दौरा किया था। उस समय भी ठीक इसी तरह की घटना घटी थी। उस समय दिल्ली ने कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिया था कि यदि चीनी सैन्य टुकड़ियां वापस नहीं लौटतीं तो प्रधानमंत्री ली की यात्रा को टालना पड़ सकता है। इस प्रकार अंतत: इस विवाद का समापन हुआ। इस बार भी यह देखने की कोशिश की गई कि राष्ट्रपति शी चिनफिंग चीनी सेना की घुसपैठ की समस्या को दूर करने के लिए कोई निर्णय लेते हैं या नहीं। पूर्व में भी बीजिंग ने अपनी बातों पर दृढ़ रहते हुए चीनी सेना के ऐसे कदमों को सही ठहराने की कोशिश की है। चीनी सैन्य टुकड़ी की वर्तमान घुसपैठ भारत-चीन संबंधों में असहजता का एक और वाकया है। यहां जो बात अधिक मायने रखती है वह है इस समस्या के मद्देनजर शी चिनफिंग की भारत यात्रा के कम हुए महत्व की। यहां यह कहा जा सकता है कि मोदी और शी चिनफिंग के बीच यह पहली मुलाकात थी, जो वास्तविक मुद्दों के मद्देनजर अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही, हालांकि दोनों नेताओं के बीच सहज व्यक्तिगत रिश्तों का समीकरण कायम करने में मदद मिली है। दोनों ही नेता अपने इतिहास और विरासत के बोझ से दबे-बंधे हुए थे।
शी चिनफिंग की यात्रा से जो एक बात उभरकर सामने आई वह यही कि जटिल भूभाग और सीमा संबंधी विवाद अभी भी एक बड़ी बाधा है, जो दोनों देशों के बीच राजनीतिक वार्ताओं के दौरान एक महत्वपूर्ण दर्जा रखता है और इस पर चर्चा होनी शुरू हुई है। शी चिनफिंग की यात्रा के बाद जारी किए गए संयुक्त बयान में कहा गया है कि सीमा संबंधी सवाल का अंतिम समाधान अभी भी होना शेष है और इसके लिए दोनों ही देश अथवा पक्ष अपना प्रयास सतत रूप से जारी रखेंगे ताकि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सद्भाव को कायम रखा जा सके। इसके साथ यह भी कहा गया कि दोनों पक्ष चुमार क्षेत्र और ऐसे ही अन्य तनावपूर्ण क्षेत्रों में अपनी सैन्य टुकड़ियों की वर्तमान संख्या को बरकरार रखेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी टोक्यो में अपने जापानी समकक्ष से मिल चुके हैं तथा दिल्ली में उन्होंने चीनी राष्ट्रपति से मुलाकात की और अब उनकी अन्य महत्वपूर्ण बैठक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ होनी है। भारत के लिए अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब 2008 के उत्तारार्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु मुद्दे पर सहमति कायम की। हालांकि पिछले छह वषरें तक घरेलू राजनीतिक बाध्यताओं की वजहों से दोनों देशों के रिश्तों में ठहराव रहा। मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किस तरह मृतप्राय हो चुके भारत-अमेरिकी संबंधों में नई जान डाली जाए। अमेरिका स्वयं आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और वह भारत में अधिक निवेश करने की स्थिति में नहीं है, जैसा कि जापान और चीन ने क्रमश: 35 अरब डॉलर और 20 अरब डॉलर करने का वादा किया है। इसी तरह भारत के पास किसी औपचारिक सैन्य गठजोड़ का भी विकल्प नहीं है, ताकि बीजिंग को जवाब दिया जा सके। ऐसे में भारत का रास्ता साफ है कि वह अपनी आर्थिक, तकनीकी और सैन्य क्षमताओं में इजाफा करे तथा कुछ हद तक चीन के साथ तादात्म्य कायम करे। अमेरिकी रक्षा मंत्री चक हेगेल ने अपनी यात्रा के दौरान भारत को तमाम सैन्य साजोसामान और रक्षा उत्पादों की आपूर्ति का भरोसा दिया था। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी इनमें से कुछ संभावनाओं को मूर्त रूप दे सकेंगे और जून 2005 में हुए रम्सफेल्ड-मुखर्जी समझौते को आगे बढ़ाएंगे।
[लेखक सी. उदयभास्कर, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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विश्व राजनीति में नई साझेदारी की ओर भारत-चीन
Monday September 22, 2014
लेखकः रंजीत कुमार।।
चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के भारत दौरे के ऐन मौके पर लद्दाख के चुमार और देमचोक इलाके में घुसपैठ की घटनाएं नहीं होतीं तो शिखर वार्ता के नतीजों के आधार पर यही कहा जाता कि भारत और चीन के रिश्ते आसमान छू सकते हैं। 18 सितंबर को शिखर बैठक के दौरान अतिक्रमण की घटनाओं के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सीमा मसला दोनों देशों के बीच रिश्तों में एक कांटे की तरह है। यह कांटा जितनी जल्दी निकाला जाएगा, भारत-चीन रिश्ते उतनी तेजी से बुलंदी पर पहुंचेंगे। शुक्र है कि मोदी - शी वार्ता के बाद दोनों देशों ने साझा बयान में इसे जल्द हल करने की प्रतिबद्धता दिखाई है। राष्ट्रपति शी अपनी ओर से भारत दौरे में मुख्य जोर आर्थिक रिश्तों को गहरा करने और अपनी आर्थिक कूटनीति को आगे बढ़ाने पर देना चाहते थे। जहां तक आर्थिक रिश्तों को गहरा करने की बात है तो मोदी ने इसमें चीन का खुल कर साथ दिया, लेकिन उसकी रेशम मार्ग जैसी आर्थिक कूटनीति से अपने को अलग कर लिया। चीन के दक्षिणी रेशम गलियारे (बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारा) से भी भारत ने केवल सहमति दिखाई, प्रतिबद्धता नहीं जताई।
व्यापार बढ़ाने पर जोर
अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुद चीन के राष्ट्रपति की अगवानी करने से मोदी और शी के बीच रिश्तों में एक तालमेल बना है जिसका लाभ उठाते हुए दोनों देश आने वाले सालों में आपसी रिश्तों को विवादरहित बनाने की ओर ले जा सकते हैं। मोदी - शी वार्ता में दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को गहरा करने का जो संकल्प लिया गया है, उसका सकारात्मक असर राजनयिक रिश्तों पर भी पड़ेगा। क्योंकि इससे दोनों देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़ जाएगी, दोनों देशों के लोगों और व्यापारियों के बीच मेलजोल गहरा होने लगेगा और दोनों मुल्कों के लोग एक-दूसरे को बेहतर समझने लगेंगे। लेकिन केवल आर्थिक व्यवहार बढ़ाने से रिश्तों की कड़वाहट दूर हो ही जाए, यह जरूरी नहीं है। इसका उदाहरण चीन और जापान हैं जिनके बीच के व्यापारिक आंकड़े 307 अरब डॉलर को छू चुके हैं। बावजूद इसके, दोनों के बीच राजनयिक तनाव चरम पर है। अस्सी के दशक में चीन के शिखर पुरुष तंग श्याओ फिंग कहते थे कि पहले आर्थिक रिश्ते सुधारो तो राजनीतिक रिश्ते खुद बेहतर होने लगेंगे। इसके जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी का कहना होता था कि पहले सीमा मसले को हल करेंगे तभी एक-दूसरे पर भरोसा पैदा होगा और विश्वास के माहौल में ही दोनों देश आपसी राजनीतिक रिश्तों को गहरा कर सकेंगे। लेकिन, पिछले दशक से भारत और चीन ने आर्थिक आदान-प्रदान बढ़ाने शुरू किए और आज यह 67 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। खास बात यह रही कि भारत और चीन ने आर्थिक रिश्ते गहरे करने के साथ-साथ सीमा मसले पर भी बातचीत जारी रखी और अब तक 30 से भी अधिक दौर की बातचीत हो चुकी है। इसके बावजूद सीमा (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर दोनों की सेनाएं पहले की तरह आमने-सामने हैं। राहत की बात यही है कि भारत-पाकिस्तान सीमा की तरह भारत-चीन सीमा गंभीर मतभेदों के बावजूद खाली कारतूसों से अटी नहीं पड़ी है। दोनों देशों के सैनिक बर्फीली पहाड़ियों पर भारी सर्दी झेलते हुए आमने-सामने हैं और एक-दूसरे पर चौकस नजर रखे हुए हैं कि कोई अतिक्रमण या घुसपैठ नहीं करे। इसके बावजूद अक्सर घुसपैठ की घटनाएं हो ही जाती हैं और एक-दो बार इसे लेकर रिश्तों में राजनयिक तनाव पैदा हो ही जाता है।
क्या है फॉर्म्युला
इसी माहौल में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के विशेष प्रतिनिधियों की सीमा मसले पर 16 दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है और इसमें सैद्धांतिक स्तर पर इसके हल का फॉर्म्युला भी निकाल लिया गया है। अब जरूरत इस बात की है कि 2005 के इस समझौते के अनुरूप दोनों देश ठोस बातचीत करें। 2005 के राजनीतिक दिशानिर्देश वाले समझौते में कहा गया है कि यदि दोनों पक्ष किसी खास इलाके को लेने की मांग करते हैं और वहां आबादी बसी है तो उसकी भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए। इस नजरिए से भारत यह मान कर चल रहा है कि चीन जिस अरुणाचल प्रदेश और खासकर तवांग के इलाके की मांग कर रहा है, वहां रहने वाले लोग तो भारत के साथ हैं ही। इसलिए अरुणाचल और खासकर तवांग के इलाके पर भारत के जायज अधिकार को मान्यता देने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय के हाल के कुछ बयानों में 2005 के इस समझौते का जिस शैली में जिक्र किया गया है, उससे संकेत मिलता है कि यदि चीन से सही तरीके से बात की जाए तो अरुणाचल प्रदेश और तवांग इलाके पर चीन अपना अधिकार छोड़ सकता है। दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के जिस अक्साइ चिन इलाके पर, जहां एक भी आदमी नहीं रहता, भारत अपना अधिकार त्याग कर सीमा समझौते पर पहुंच सकता है। एक बार सीमा मसला हल हो जाए तो दोनों देशों के बीच और कोई बड़ा विवाद नहीं बचता। उस स्थिति में दोनों एशियाई देश साथ मिलकर विश्व राजनीति में नई पारी खेल सकते हैं।
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चीन के विकास मॉडल पर न हों मुग्ध
विश्लेषण अरुण तिवारी
निवेशक चाहे चीन हो, जापान हो या अमेरिका; प्रत्येक अपने मुनाफे के लिए ही निवेश करता है। इसी तरह इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि निवेशकों में होड़ तभी होती है, जब निवेश करना सुरक्षित हो और मुनाफा पर्याप्त। संभवत: इस दृष्टि से दुनिया आज भारत को सबसे मुफीद देशों में से एक मान रही है। निर्णय लेने और उसे लागू कराने में सक्षम प्रधानमंत्री की नरेंद्र मोदी की छवि, निस्संदेह निवेशकों को आकर्षित करने में मददगार है। इसीलिए यह होड़ है। चूंकि हम निवेश के भूखे हैं, अत: इस होड़ को लेकर हमारी खुशी स्वाभाविक है। किंतु इस खुशी में हम यह कभी न भूले कि जिस तरह जरूरत से ज्यादा किया गया भोजन जहर है; ठीक इसी तरह किसी भी संज्ञा या सर्वनाम का जरूरत से ज्यादा किया गया दोहन भी एक दिन जहर ही साबित होता है। चीन अपनी धरती पर यही कर रहा है। भारत अपने यहां यह न होने दे। चीन निवेश करे, किंतु द्विपक्षीय सहमत शतरे पर। अभी-अभी गंगा जलमार्ग हेतु भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण द्वारा जारी विज्ञापन में कहा गया है कि परामर्शदाताओं का चयन, रोजगार आदि विश्व बैंक उधारदाताओं के निर्देशों के अनुसार होगा। यह न हो। यह भी न हो कि निवेशकों की शर्त पर चलते-चलते भारत सरकार भी निवेशक जैसी हो जाए- परियोजनाओं में वह भी सिर्फ लाभ ही देखे और सभी का शुभ भूल जाए। पारंपरिक रूप में भारतीय व्यापारी, लाभ के साथ शुभ का गठजोड़ बनाकर व्यापार करता रहा है। ‘शुभ-लाभ’ का यह गठजोड़ सरकार कभी न टूटने दे। यह इसलिए कहना पड़ रहा है कि भारत भी अब उसी नियंतण्र होड़ में शामिल होता दिखाई दे रहा है, जिसमें चीन और अमेरिका हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन की बराबरी करने की इच्छा भी जाहिर की है। वर्तमान सरकार को एक बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि भारतीय विकास का भावी मॉडल चाहे जो हो, वह चीन सरीखा तो कतई नहीं हो सकता। चीनी अर्थव्यवस्था का मॉडल घटिया चीनी सामान की तरह है; जिसका उत्पादन, उत्पादनकर्ता, उपलब्धता और बिक्री बहुत है, किंतु टिकाऊपन की गारंटी न के बराबर। चीन आर्थिक विकास की आंधी में बहता एक ऐसा राष्ट्र बन गया है, जिसे दूसरे के पैसे और जमीन पर कब्जे की चिंता है; अपनी तथा दूसरे की जिंदगी व सेहत की चिंता कतई नहीं। खुद चीन के कारनामे यह संदेश दे रहे हैं। यह सच है कि चीन ने अपनी आबादी को बोझ समझने की बजाय एक संसाधन मानकर बाजार के लिए उसका उपयोग करना सीख लिया है। यह बुरा नहीं है। ऐसा कर भारत भी आर्थिक विकास सूचकांक पर और आगे दिख सकता है। किंतु समग्र विकास के तमाम अन्य मानकों की अनदेखी करके यह करना खतरनाक होगा। त्रासदियों के आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक दौड़ में आगे दिखता चीन प्राकृतिक समृद्धि, सेहत और सामाजिक मुस्कान के सूचकांक में काफी पिछड़ गया है। उपलब्ध रिपोर्ट बताती हैं कि चीनी सामाजिक परिवेश में तनाव गहराता जा रहा है। अमेरिका की गैलप नाम अग्रणी सव्रे एजेंसी के मुताबिक, दुनिया के खुशहाल देशों की सूची में भारत, चीन से 19 पायदान ऊपर है। भारत के 19 फीसद लोग अपने रोजमर्रा के काम और तरक्की से खुश हैं, तो चीन में मात्र नौ प्रतिशत। जनवरी, 2013 से अगस्त, 2013 के आठ महीनों में करीब 50 दिन ऐसे आए, जब चीन के किसी न किसी हिस्से में कुदरत का कहर बरपा। औसतन एक महीने में छह दिन! बाढ़, बर्फबारी, भयानक लू, जंगल की आग, भूकंप, खदान धंसान और टायफून आदि के रूप में आई कुदरती प्रतिक्रिया के ये संदेश कतई ऐसे नहीं हैं कि इन्हें नजरंदाज किया जा सके। खासतौर पर तब, जब उत्तराखंड और कश्मीर के जलजले के रूप में ये संदेश अब भारत में भी आने लगे हैं। सिर्फ छह जनवरी, 2013 की ही तारीख को लें तो चीन में व्यापक बर्फबारी से साढ़े सात लाख लोगों के प्रभावित होने का आंकड़ा है। प्रदूषण की वजह से चीन की 33 लाख हेक्टेयर भूमि खेती लायक ही नहीं बची। ऐसी भूमि में उत्पादित फसल को जहरीला करार दिया गया है। तिब्बत को वह ‘क्रिटिकल जोन’ बनाने में लगा ही हुआ है। खबर है कि अपने परमाणु कचरे के लिए वह तिब्बत को ‘डंप एरिया’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। तिब्बत से नदियों में बहकर आने पर यह परमाणु कचरा उत्तर-पूर्व भारत को बीमार ही करेगा। कई विकसित कहे जाने वाले देश भी स्वयं को बचाने के लिए ज्यादा कचरा फेंकने वाले उद्योगों को दूसरे ऐसे देशों में ले जा रहे हैं, जहां प्रति व्यक्ति आय कम है। क्या चीन जैसी मलिन अर्थव्यवस्था में तब्दील हो जाने की हमारी बेसब्री उचित है? गौरतलब है कि जिस चीनी विकास की दुहाई देते हम नहीं थक रहे, उसी चीन के बीजिंग, शंघाई और ग्वांगझो जैसे नामी शहरों के बाशिंदे प्रदूषण की वजह से बड़े पैमाने पर गंभीर बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। चीन के गांसू प्रांत के लांझू शहर पर औद्योगीकरण इस कदर हावी है कि लांझू चीन के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार हो गया है। बीते 11 अप्रैल की ही घटना है। लांझू शहर को आपूत्तर्ि किया जा रहा पेयजल इतना जहरीला पाया गया कि आपूत्तर्ि ही रोक देनी पड़ी। आपूत्तर्ि जल में बेंजीन की मात्रा सामान्य से 20 गुना अधिक पाई गई। यानी एक लीटर पानी में 200 मिलीग्राम! बेंजीन की इतनी अधिक मात्रा सीधे-सीधे कैंसर को अपनी गर्दन पकड़ लेने के लिए दिया गया न्योता है। प्रशासन ने आपूत्तर्ि रोक जरूर दी, लेकिन इससे आपूत्तर्ि के लिए जिम्मेदार ‘विओलिया वाटर’ नामक ब्रितानी कंपनी की जिम्मेदारी पर सवालिया निशान छोटा नहीं हो जाता। भारत के लिए इस निशान पर गौर करना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि यह वही विओलिया वाटर है, जिसकी भारतीय संस्करण बनी ‘विओलिया इंडिया’ नागपुर नगर निगम और दिल्ली जल बोर्ड के साथ हुए करार के साथ ही विवादों के घेरे में है। यदि चीन जैसे सख्त कानून वाले देश में ‘विओलिया वाटर’ जानलेवा पानी की आपूत्तर्ि करके भी कायम है, तो इससे ‘पीपीपी’ मॉडल में भ्रष्टाचार की पूरी संभावना की मौजूदगी का सत्य स्थापित होता ही है। अत: कम से कम बुनियादी ढांचागत क्षेत्र के विकास व बुनियादी जरूरतों की पूर्ति वाले सेवाक्षेत्र में यह मॉडल नहीं अपनाया जाना चाहिए। निजी कंपनी का काम मुनाफा कमाना होता है। वह कमाएगी ही। ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी’ का कानूनी प्रावधान भले ही हो, बावजूद इसके ‘शुभ लाभ’ की जगह ‘अधिकतम लाभ’ के इस मुनाफाखोर युग में किसी कंपनी से कल्याणकारी निकाय की भूमिका निभाने की अपेक्षा करना गलत है। एक कल्याणकारी राज्य में नागरिकों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सरकार की जिम्मेदारी होती है। इसे सरकार को ही निभाना चाहिए। जरूरत प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायीकरण से होने वाले मुनाफे में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी के प्रावधान करने से ज्यादा, प्राकृतिक संसाधनों का शोषण रोकने की है। प्राकृतिक संसाधनों का हमारे रोजगार, आर्थिक विकास दर और हमारे होठों पर स्थाई मुस्कान से गहरा रिश्ता है। इस रिश्ते की गुहार यह है कि अब भारत ‘प्राकृतिक संसाधन समृद्धि विकास दर’ को घटाए बगैर, आर्थिक विकास दर बढ़ाने वाला मॉडल चुने। चीन के विकास मॉडल की नकल विनाशकारी हो सकती है। (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं)
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विश्वास और व्यापार
Fri, 26 Sep 2014
भारत और चीन दो बड़े राष्ट्र हैं, जहां विश्व की एक तिहाई आबादी बसती है। सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दृष्टि से दुनिया में चीन का दूसरा और भारत का तीसरा स्थान है। अमेरिका अभी भी प्रथम स्थान पर है। चीन की कोशिश है कि चंद वषरें में वह अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाए। चीन की अर्थव्यवस्था का आकार अभी 100 खरब डॉलर का है, जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था 20 खरब डॉलर की है। थोड़ी तुलना और आगे बढ़ाएं तो चीन का विदेशी मुद्रा का भंडार 4000 अरब डॉलर के ऊपर जा चुका है, जबकि भारत के पास 320 अरब डॉलर के आसपास ही विदेशी मुद्रा भंडार है। चीन 2008 से भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है। दोनों देशों के बीच पिछले वर्ष 70 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। 2012 में जब भारत और चीन के प्रधानमंत्री मिले थे तो उन्होंने 2015 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य बनाया था। व्यापार असंतुलन लगातार चीन के पक्ष में जा रहा है। भारत का व्यापार घाटा तकरीबन 40 अरब डॉलर हो चुका है। स्पष्ट है कि चीन की व्यापार रणनीति भारत के लिए भारी पड़ रही है-वैसे ही जैसे उसकी विस्तारवादी सीमा नीति।
चीन से जिन वस्तुओं का भारत में आयात होता है उनमें प्रमुख हैं इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, मशीनरी, पावर रिएक्टर, सिल्क और गिफ्ट सामान, जिनमें चीन में बनी हुई गणेश और लक्ष्मी की मूर्तियां, त्यौहारों पर सजावट के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली बिजली की लड़ियां, बिल्डिंग मैटेरियल, सैनिटरी गुड्स आदि। चीन जो चीजें भारत से खदीदता है उनमें प्रमुख हैं आयरन, रबर, मेडिकल उपकरण, डेयरी प्रोडक्ट, बीज, नमक आदि। विगत दो दशकों में चीन ने भारतीय बाजारों में अपनी गहरी पैठ बनाई है। गुणवत्ता की दृष्टि से अधिकांश चीनी वस्तुएं विकसित देशों के उत्पाद से निम्न हैं, लेकिन कम कीमत होने से वे बाजार में अधिक बिकती हैं। चीन लागत से भी कम दाम में बाजारों में अपने माल डंप करने के लिए जाना जाता है। इसका सीधा असर स्वदेशी उत्पादकों, विशेषकर मध्यम और लघु उद्योगों पर पड़ता है। इस तरह छोटे उद्योग बंद हो जाते हैं और लोग बेरोजगार हो जाते हैं। इससे छोटे उद्योग में लगे लोग उत्पादन की जगह ट्रेडिंग पसंद करने लगते हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक होता है। चीन ने अपने बाजार भारतीय कंपनियों के लिए अभी भी सीमित रूप से खोले हैं। भारतीय निर्यातकों के साथ चीन के अधिकारियों का व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। चीन के विभिन्न राज्यों की व्यापार नीति, पारदर्शिता का अभाव और सौतेला व्यवहार भारत से निर्यात में बाधक रहे हैं। जनवरी से अप्रैल 2014 में ही भारतीय निर्यात चीनी आयात के मुकाबले 9 अरब डॉलर कम रहा। मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के समक्ष बढ़ते व्यापार घाटे का मुद्दा रखा है, लेकिन चीन इस पर कितना ध्यान देता है, यह देखने वाली बात होगी।
नए व्यापार समझौते के अंतर्गत भी चीन ने सीमित रूप से ही अपने बाजार खोले हैं। भारत और चीन के बीच जो व्यापार समझौता हुआ है उससे दोनों ही देश लाभ की उम्मीद कर रहे हैं। भारत में बुलेट ट्रेनों के निर्माण, रेल विश्वविद्यालय की स्थापना, भारतीय कर्मचारियों को चीन द्वारा ट्रेनिंग की व्यवस्था, रेलवे ट्रैकों का आधुनिकीकरण और विस्तार, स्टेशनों की दशा सुधारना जैसे कदम भारतीय रेल की क्षमता और उसके विकास में सहायक बनेंगे। रेलवे में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश के मोदी सरकार के हाल के फैसले से रेलवे में विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकेगा। बुलेट ट्रेन के लिए जापान के साथ हुआ समझौता महत्वपूर्ण है। इस क्रम में चीन से तीव्र गति के रेलवे के लिए समझौता पूरी रेल व्यवस्था को बदलने में सहायक होगा। चेन्नई और मैसूर के बीच तीव्र गति की गाड़ियां चलाने के प्रोजेक्ट पर शीघ्र ही अमल संभव है। चीन में स्वास्थ्य सेवा के विकास और वहां लोगों की औसत आमदनी तेजी से बढ़ने के कारण दवाओं की मांग बढ़ी है। चीन सरकार ने इस आवश्यकता के मद्देनजर भारतीय दवा उत्पादकों को वहां सुविधा देने की बात कही है। समझौते के मुताबिक चीन भारत में दो औद्योगिक पार्क भी स्थापित करेगा- एक गुजरात में और दूसरा महाराष्ट्र में। इन पाकरें में बड़े पैमाने पर चीनी उद्योगपति निवेश कर सकेंगे और कारखाने लगाएंगे। भारतीय तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर जाने के लिए सिक्किम से नया मार्ग खोलने का राष्ट्रपति चिनफिंग का वादा स्वागतयोग्य है। यह भावनात्मक स्तर पर दोनों देशों को नजदीक लाने का प्रयास है। इससे दोनों देशों के बीच पर्यटन विकास की संभावना भी बढ़ेगी। सरकारी समझौतों के अलावा दोनों देशों की कई कंपनियों ने भी तमाम समझौते किए हैं। इससे 3.4 अरब डॉलर का अतिरिक्त व्यापार होगा। पवन ऊर्जा के लिए पार्ट्स बनाने पर भी समझौता हुआ है। फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए फिल्मों के संयुक्त निर्माण पर भी सहमति बनी है।
अगले पांच वषरें में चीन भारत में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा। कुछ दिनों पहले मुंबई में चीन के वाणिज्य दूतावास की ओर से 100 अरब डॉलर के निवेश की बात कही गई थी। भारत को अपनी ओर खींचने का चीन का यह वादा मात्र वादा ही रह गया। भारत के साथ जापान का बढ़ता रिश्ता चीन की आंखों में खटक रहा है। संभवत: इसीलिए चीन इस तरह की रणनीति अपना रहा है, किंतु हाल के घटनाक्रमों के कारण दोनों के बीच अविश्वास की भावना बढ़ी ही है। चीन के साथ जब भी समझौते होते हैं, भारतवासियों को 1962 के पंचशील समझौते की याद आ जाती है। समझौते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। हालांकि आर्थिक समझौतों में इस तरह का भय नहीं होता। रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में जो निवेश चीन करेगा उसका लाभ पूरे देश को होगा। दोनों देशों के बीच हुए समझौते मील के पत्थर तभी साबित हो सकते हैं जब दोनों के बीच परस्पर सहयोग की भावना बढ़े। यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो समझौते हुए वे ऐतिहासिक हैं, किंतु दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को मजबूत करने के लिए लिहाज से उन्हें एक महत्वपूर्ण प्रयास अवश्य माना जा सकता है।
[लेखक प्रो. लल्लन प्रसाद, आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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भारत-चीन सीमा विवाद और गहराया
01, OCT, 2014, WEDNESDAY
मेरा मन कहता है गुजरात के भारतीय नक्शे में अरुणाचल प्रदेश को विवादित क्षेत्र के रूप में दिखाया जाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कहने पर हुआ है। गुजरात उनका आंगन है और वह जो चाहे करा सकते हैं। यहां तक कि नक्शे का विरोधामास भी बेमन से था और इसे आगे की 'जांचÓ के लिए छोड़ दिया गया।
यात्रा पर आए राष्ट्रपति शी चिनपिंग को मोदी शायद यह बताना चाहते थे कि वह अरुणाचल प्रदेश को एक विवादित क्षेत्र बनाए रखने को तैयार हैं अगर बीजिंग यह संकेत दे कि वह नई दिल्ली की समझ और भावना, दोनों का ख्याल रखते हुए सीमा विवाद को हल करना चाहता है। लद्दाख में गतिरोध के बाद ऐसी कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती।
राष्ट्रपति शी की प्रतिक्रिया से समस्या के हल में कोई मदद नहीं मिली और उन्होंने पूरी यात्रा के दौरान घुसपैठ टिकाए रखा। उनके बीजिंग लौटने के बाद खबर आई कि चीन के राष्ट्रपति ने अपने उच्चाधिकारियों से कहा है कि उन्हें क्षेत्रीय मुद्दों के लिए तैयार रहना चाहिए और वह चाहते हैं कि इन्हें किसी भी तरह जीता जाए। इशारा नई दिल्ली की तरफ ही था जिसने पता नहीं किन वजहों से अपनी नाराजगी बताने के लिए एक भी शब्द भी नहीं कहा। यह रुख तो गुलाम देश अपने मालिकों के लिए ही अपनाते हैं।
मुझे आश्चर्य हुआ कि हमने चीनी राष्ट्रपति को आमंत्रित ही क्यों किया जब बीजिंग 1962 में किए गए विश्वासघात की उस नीति में कोई सुधार नहीं लाया है जब उसने भारत, जो बिना तैयारी के था, पर हमला किया। उसने जबरन कब्जा किए गए क्षेत्रों को खाली भी नहीं किया है। विदेश मंत्रालय को शी की यात्रा के पहले स्थिति परख लेनी चाहिए थी।
उस समय से अब तक चीन की ओर से उठाए गए कदम-वीसा के साथ पासपोर्ट नत्थी करने से लेकर गिलगित-बाल्टीस्तान में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों के जमावड़े- चिढ़ पैदा करने वाली उन ढेर सारी बातों से नई दिल्ली को सारी बातें साफ हो जानी चाहिए थीं। लेकिन 1962 में जिस तरह भारत ने किया उसी तरह चीन के हाथों में खेलना भोलापन ही होगा। अपनी बढ़ती ताकत के अहसास ने बीजिंग को अपनी श्रेष्ठता की भावना से भर दिया है। वह उसे रुखेपन के साथ दिखा रहा है, खासकर उस समय जब भारत अस्त-व्यस्त और आपस में बंटा दिखाई देता है।
नई दिल्ली के लिए ज्यादा चिंता की बात है कि बीजिंग भारत के चारों ओर श्रीलंका, बंगलादेश, म्यांमार और नेपाल में एक उभरती शक्ति के रूप में दिखाई देता है। नई दिल्ली को भी ताईवान, वियतनाम और दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के नजदीक जाना चाहिए जो चीन की बढ़ती हठधर्मी महसूस कर रहे हैं। बीजिंग को यह महसूस कराना चाहिए कि भारत ने तिब्बत पर चीन का आधिपत्य स्वीकार कर लिया है लेकिन उस क्षेत्र की आबादी के स्वरूप में बदलाव या क्रूर दमन को नहीं। दलाईलामा पहले से ही अशांत हैं और तनाव में हैं।
जवाहरलाल नेहरू ने 1962 में ही भारत को आगाह किया था: यह सोचना थोड़ा सा भोलापन होगा कि चीन के साथ हमारी समस्या मुख्यरूप से कुछ क्षेत्रों पर विवाद की वजह से है। इसकी गहरी वजहें हैं। एशिया के दो बड़े राष्ट्र एक विशाल सीमा पर एक-दूसरे के सामने हैं। उनके बीच कई मतभेद हैं। और इसकी परीक्षा यह है कि दोनों में से कौन सीमा पर और खुद एशिया में हावी है।
मैं चीन के राष्ट्रपति का निरादर नहीं करना चाहता। लेकिन उनकी यात्रा का फे ल होना निश्चित था। भारत में निवेश ज्यादा से ज्यादा सीमा पर दिए जा रहे घावों के दर्द को कम करने जैसा है। मैं उनकी यात्रा का- अपने देश के हित के हिसाब से-मतलब ही समझ नहीं पाया, सराहना की बात तो छोडि़ए।
वास्तव में, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की दिल्ली में चल रही बातचीत के दौरान चीन की लद्दाख में घुसपैठ सीमा पर उसके अडिय़लपन को रेखांकित करता है। चीन का भारत में 20 अरब डालर (शुरू में 100अरब डालर का आंकड़ा था) का निवेश बीजिंग के लिए ठीक है कि वह नई दिल्ली के साथ अपना व्यापार बढ़ाना चाहता है क्योंकि इससे उसे व्यापक बाजार और कई अन्य अवसर हासिल होते हैं। लेकिन बुनियादी जरूरत- आपसी विश्वास- का क्या हो।
नेहरू ने चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई को दुनिया के सामने लाया। वह नेहरू का आदर करते थे, लेकिन तभी तक जब तक अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में वह जाने नहीं जा रहे थे। चाऊ एनलाई ने नेहरू के साथ विश्वासघात किया जब चीन ने भारत के विश्वास और बेतैयारी का फायदा उठाया। मुझे नहीं लगता कि प्रधामंत्री नरेंद्र्र मोदी का चीन के राष्ट्रपति के साथ कभी भी वैसा रिश्ता बन सकता है जैसा नेहरू और चाऊ एनलाई के बीच था। लेकिन उसके बाद भी लद्दाख में उस क्षेत्र पर कब्जा कर जिस पर चीन का दावा था, चाऊ एनलाई ने वही किया जो कार्य उसके मन में था मोदी और चिनपिंग के बातचीत के दौरान हमारे क्षेत्र में घुसपैठ यही बताता है कि चीन सीमा विवाद पर भारत की राय को जगह नहीं देना चाहता है।
मुझे ऊंचे स्तर पर संकल्प का अभाव दिखाई देता है। बहुत सारे ख्याली पुलाव हैं। इस बहस से क्या फायदा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीमा विवाद पर चीन या राष्ट्रपति चिनपिंग से क्या बेहतर मिला जब हमारे समाज की वास्तविकता जाति और वर्ग है? दलितों के साथ आज भी अछूतों की तरह व्यवहार होता है जैसा हमारे पुरखे करते थे। आज के युवक को बाकी किसी चीज से कोई मतलब नहीं है लेकिन अपने ऊंचे होने की भावना जिसे वे अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते हैं के बारे में ऐसा नहीं है।
ग्यारह बच्चे जिसमें चचेरे भाई भी शामिल थे, को बीकानेर के एक स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि उनमें से दो ने शिक्षक के लिए रखे मिट्टी के घड़े से पानी पिया था। यह खबर भी आई कि उसने दोनों बच्चों को अपमानित किया और पीटा भी। सच है कि जब परिवार वालों ने शिकायत की तो शिक्षक मंगल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लेकिन बाकी समाज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। प्रधानमंत्री श्री मोदी विकास की बात करते हैं। किस तरह का विकास उनके मन में है जिसमें जाति का पूर्वाग्रह बना रहे?
भारत-चीन सीमा विवाद के मुद्दे पर लौटें तो राष्ट्रपति चिनपिंग की यात्रा से यह विवाद पहले से ज्यादा जटिल बन गया है। उदाहरण के तौर पर, चीन की फौज जो भारत की सीमा में घुस आई थी, न केवल वहां रुकी, बल्कि उसने अपनी संख्या भी बढ़ा ली। उन्हें वहां से वापस बुला लेने की खबर आई है। लेकिन बीजिंग ने यह पूरी तरह से साफ कर दिया है कि भारत विवादित क्षेत्र से दूर रहे।
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सीमा पर तकरार
नवभारत टाइम्स | Sep 24, 2014
चीन के राष्ट्रपति ने अपनी सेना से जो कहा है, लद्दाख के हालात देखते हुए वह हमारे लिए चिंता का विषय है। शी चिन फिंग ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से कहा है कि वह क्षेत्रीय युद्ध के लिए तैयार रहें। कहीं उनका इशारा भारत की तरफ तो नहीं? ऐसी बातें उन्होंने शायद पहले भी कही हों, लेकिन अभी हमारी आशंका के पर्याप्त आधार हैं। गौरतलब है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पिछले कई दिनों से तनाव बना हुआ है। लद्दाख के तीन इलाकों में भारत और चीन के हजारों फौजी आमने-सामने हैं। जिस समय फिंग भारत में प्रधानमंत्री मोदी के साथ शिखर वार्ता कर रहे थे, उस समय लद्दाख के चुमार इलाके में चीनी सैनिक टेंट गाड़ कर बैठे हुए थे। जब भारत ने फिंग का ध्यान इस ओर खींचा तो उन्होंने संकेत दिया कि वे इस मामले का हल निकालेंगे। भारत में यह उम्मीद जगी कि शायद अब चीनी सैनिक वापस हो जाएंगे। लेकिन उनके तंबू अब भी हटे नहीं हैं। बल्कि उन्होंने दूसरे रास्तों से भी घुसपैठ की है। ऐसे हालात में शी चिन फिंग का यह बयान आया है। वैसे एलएसी पर चीनी सेना के बड़े जमावड़े या सैन्य तैयारी के कोई संकेत नहीं मिले हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि पीपल्स आर्मी के कुछ अफसरों का तबादला कर दिया गया है। भारत में इसकी व्याख्या इस रूप में की गई कि शायद चुमार पर चीनी प्रेजिंडेट का निर्देश न मानने के कारण उन्हें यह सजा दी गई है। इस राय को फिंग की इस बात से भी बल मिल रहा है कि चीनी सेना सरकार के प्रति वफादार रहे। क्या फिंग ने चीनी सेना को चुमार से पीछे हटने को कहा था, जिसे अधिकारियों ने नहीं माना? मामला चाहे जो हो, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सच यह है कि भारत की आपत्तियों के बावजूद चीनी सैनिक चुमार में डटे हुए हैं। संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा के दौरान ही उसके देश की सेना ने सीमा पर इस तरह का आक्रामक रुख अपनाया है। तो क्या चीन के लिए उन आर्थिक समझौतों का कोई अर्थ नहीं है, जो फिंग की यात्रा के दौरान भारत के साथ किए गए? कहीं चीन भारत के साथ वही नीति तो नहीं अपना रहा, जो उसने जापान या वियतनाम के साथ अपना रखी है? यानी पहले राजनयिक और सीमा संबंधी मसले हल हों, उसके बाद ही आर्थिक मामलों को तवज्जो दी जाए। चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण न होने से इसको लेकर दोनों पक्षों के विचारों में अंतर है। यही बात फिंग ने भी अपनी यात्रा के दौरान कही थी। मुमकिन है, चीन इस बार दबाव बनाकर इस पर कोई अंतिम फैसला करवाने के मूड में हो। जाहिर है, भारत को इसे गंभीरता से लेना होगा। तनाव के मद्देनजर सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग को अपना पहला विदेश दौरा रद्द करना पड़ा है। लेकिन इस बारे में कोई निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को ही लेना होगा।
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Sat, 27 Sep 2014
मोदी से चीन के साथ रिश्तों के संदर्भ में तिब्बत मसले को फिर से खोलने की अपेक्षा कर रहे हैं
ब्रह्मा चेलानी
चीन ने वर्ष 1950 में तिब्बत को हड़प लिया या कहें अपने में मिला लिया। हालांकि अभी भी यह मुद्दा भारत-चीन की समस्याओं का मुख्य केंद्र है, जिसमें भौगोलिक विवाद, सीमा तनाव और जल विवाद शामिल हैं। बीजिंग ने स्वयं तिब्बत मसले को एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए भारत के एक बड़े भूभाग पर दावा किया है और कहा है कि इन भूभागों का संबंध तिब्बत से है। जब चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग पिछले सप्ताह भारत की यात्रा पर थे तो तिब्बत को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा गया। वास्तव में देखा जाए तो शी चिनफिंग की यात्रा बहुत हद तक परंपरागत भारत-तिब्बत सीमा में चीनी सेना की घुसपैठ के साये में संपन्न हुई। पिछले कई वर्षो से हो रही घुसपैठ के मद्देनजर इस बार चीनी सैनिकों की संख्या काफी अधिक थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि शी चिनफिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन के उपहार के तौर पर भारत को कड़ा संदेश देने के लिए यह समय चुना अथवा निर्धारित किया।
मोदी सरकार ने नई दिल्ली में शी चिनफिंग की यात्रा के दो दिनों के दौरान तिब्बत के निर्वासितों को विरोध प्रदर्शन की अनुमति दी। इसमें शिखर बैठक के पास का स्थान भी शामिल है। यह विरोध प्रदर्शन 1990 की शुरुआत में होने वाले कड़े विरोध प्रदर्शनों से अलग था जब पुलिस किसी भी महत्वपूर्ण चीनी व्यक्ति के आगमन पर ऐसे किसी भी विरोध प्रदर्शनों को नाकाम अथवा विफल बनाने की कोशिश करती थी। वास्तव में मनमोहन सिंह के ही एक दशक लंबे शासन के दौरान पुलिस ऐसी किसी स्थिति में दिल्ली में स्थित तिब्बतियों के घरों के आसपास वाले इलाकों को बंद करा देती थी और रैली की कोशिश करने पर उन्हें बुरी तरह पीटती थी। इस तरह का क्रूर बर्ताव बहुत हद तक चीन के एकाधिकारवादी शासन से मेल खाता था, लेकिन यह उस देश के लिए शोभा नहीं देता जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता हो। ऐसी किसी भी घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों का मुंह बंद कराने पर चीन से भारत को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसलिए यह बदलाव स्वागतयोग्य है कि भारत ने बड़ी तादाद में तिब्बती प्रदर्शनकारियोंको अपने वैध लोकतांत्रिक अधिकारों को अभिव्यक्त करने की मान्यता अथवा स्वीकृति दी। यहां तक कि खुद दलाई लामा ने भी शी चिनफिंग की यात्रा के दौरान अपनी बात कहने में अधिक सहजता महसूस की। उन्होंने भारतीयों को याद दिलाया कि तिब्बत की समस्या वास्तव में भारत की भी समस्या है। चीन के खिलाफ होने वाला तिब्बती प्रदर्शन हालांकि शांतिपूर्ण होता है, जिसे खुद भारतीय संस्थान ही अनुमति देता है।
मई में जब मोदी ने पदभार ग्रहण किया तो तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांग्ये को भी इसमें आमंत्रित किया गया था। इसलिए शी चिनफिंग ने मोदी से यह आश्वासन मांगा कि वह तिब्बत को चीन के हिस्से के तौर पर मान्यता दें। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तिब्बत चीन का आंतरिक हिस्सा है और भारत अपनी जमीन से किसी भी अलगाववादी गतिविधि को अनुमति नहीं देगा। निश्चित ही यह आश्वासन निजी बातचीत में दिया गया, क्योंकि मोदी ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी नहीं बोला है। विस्तृत रूप में फैला हुआ तिब्बती भूभाग अपने पूरे इतिहास काल में भारतीय और चीनी सभ्यता द्वारा पृथक रहा है। सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी इसका संबंध चीन से बहुत कम रहा है और राजनीतिक संबंध तो कभी रहा ही नहीं। चीन द्वारा तिब्बत को जबरन हड़पे जाने के बाद ही चीनी सेना की टुकडि़यां भारत के हिमालयी सीमावर्ती इलाकों में पहली बार दाखिल हुई। इस घटना का ही परिणाम था कि 1962 में हिमालय पार करके चीन ने खूनी युद्ध को अंजाम दिया। तिब्बत के पतन से आधुनिक भारत का इतिहास भू-राजनीतिक रूप से बदल गया। बावजूद इसके प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में तिब्बत पर ब्रिटिश शासकों द्वारा दिए गए अतिरिक्त अधिकार को छोड़ दिया और तिब्बत को चीन के तिब्बत क्षेत्र के तौर पर मान्यता दे दी। हालांकि उस समय तक बीजिंग ने भारत-तिब्बत सीमा को मान्यता नहीं दी थी। उन्होंने यह काम एक समझौते पर हस्ताक्षर करके किया और इसे तिब्बती बौद्ध दर्शन के मुताबिक पंचशील नाम दिया।
वर्षो बाद एक अन्य भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार और औपचारिक तौर पर भारत के हाथ में मौजूद तिब्बत कार्ड को चीन को समर्पित करने का काम किया। वाजपेयी की 2003 में बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी सरकार ने उनसे असंदिग्ध तौर पर तिब्बत को चीन का हिस्सा होने की स्वीकृति हासिल की। वाजपेयी ने पहली बार इसे वैध शब्दावली प्रदान करते हुए भारत की स्वीकृति अथवा मान्यता दी, जिसे चीन तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र कहता है। चीन इसे अपने भूभाग का आंतरिक हिस्सा बताता है। वाजपेयी के इस आत्मसमर्पण अथवा समझौते ने चीन को भारत के एक बड़े उत्तरपूर्वी क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश (ताइवान से तीन गुना बड़ा) पर अपना दावा करने का मौका दिया। 2006 से चीन इसे दक्षिण तिब्बत नाम से पुकारता है। इसी तरह चीन ने जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से पर उसकी संप्रभुता को लेकर सवाल उठाना शुरू किया। इसका एक तिहाई हिस्से से अधिक भाग पाकिस्तान के पास है तो पांचवां भाग चीन ने कब्जा रखा है। इस तरह के हालात ने चीनी सेना को बार-बार घुसपैठ के लिए बल दिया। 2010 से भारत ने तिब्बत का उल्लेख करना बंद कर दिया है और चीन के साथ संयुक्त बयानों में 'एक चीन' शब्द का उल्लेख किया जाता है।
फिर से एक गड़बड़ी यह हुई कि मोदी-शी के संयुक्त बयान में पिछले दरवाजे से तिब्बत का मुद्दा लाया गया और चीनी तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र की स्थानीय सरकार को धन्यवाद दिया गया। इस संयुक्त बयान में भारतीय पक्ष की ओर से भारतीय तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए चीनी तिब्बती स्वायत्तशासी क्षेत्र की स्थानीय सरकार और विदेश मंत्रालय के सहयोग और समर्थन के लिए प्रशंसा की गई है। बहुत चतुराई से उन शब्दों का प्रयोग किया गया है जैसा कि बीजिंग चाहता था, जबकि 2013 में चीन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के समय संयुक्त बयान में कहा गया था भारतीय तीर्थयात्रियों की दी जाने वाली सुविधा में सुधार के लिए भारतीय पक्ष चीनी पक्ष की सराहना करता है। शब्दों में यह बदलाव आखिर किसकी गलती से हुआ और क्या इसके लिए मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अनुमति ली गई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोषियों को दंडित किया जाएगा। मोदी को अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों में सुधार करना चाहिए। वास्तव में भारत को चाहिए कि वह चीन पर तिब्बत से मेल-मिलाप के लिए दबाव डाले अन्यथा तिब्बत मसला भारत-चीन विभाजन का मुख्य मुद्दा बना रहेगा।
(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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26-09-14
चीन के अशांत शिनजियांग प्रांत में हिंसा से पचास से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। इस इलाके में पिछले एक साल में 300 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। चीन में खबरों पर कड़ा सेंसर है और चीनी मीडिया भी इस इलाके की खबरें सिर्फ सरकारी शिन्हुआ एजेंसी से ही ले सकता है, इसलिए यह मुमकिन है कि वहां की सच्ची तस्वीर लोगों को पता नहीं चलती हो। विदेश में बसे उइगुर लोगों का कहना है कि चीनी सुरक्षा बल इस इलाके में भारी दमन कर रहे हैं और बहुत सारी घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं होतीं। ताजा घटना को चीन सरकार ने आतंकवादी वारदात कहा है, हालांकि 40 से ज्यादा लोग पुलिस की गोली से मरे हैं, जिन्हें चीन सरकार दंगाई बता रही है। दो दंगाइयों को जिंदा पकड़ने का दावा भी सरकार ने किया है। जाहिर है कि जब इतने लोग सुरक्षा बलों की गोलियों के शिकार हुए हैं, तो इसका मतलब है कि सुरक्षा बलों ने काफी सख्ती बरती है। उइगुर लोगों का कहना है कि सुरक्षा बल आम तौर पर अंधाधुंध गोलियां चलाते हैं, जिससे कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं। शिनजियांग इलाके में पिछली मई में एक बाजार में हुए विस्फोटों में 30 लोग मारे गए थे और एक रेलवे स्टेशन पर हुए हमले में 29 लोग मारे गए थे। चीन के उइगुर लोग ज्यादातर मुस्लिम हैं और सांस्कृतिक रूप से भी वे बाकी चीन के लोगों से काफी अलग हैं। इन लोगों में अपने लिए अलग राज्य की मांग जोर पकड़ रही है। चीन सरकार का कहना है कि इनमें आतंकवादी तत्व हैं और इन्हें बाहर से मदद मिल रही है। यह भी दावा किया जाता है कि कई आंदोलनकारी अफगानिस्तान से प्रशिक्षण लेकर लौटे हैं। चीन सरकार की रणनीति यह है कि विरोध करने वालों का सख्ती से दमन किया जाए और इस इलाके के पिछड़ेपन को खत्म करने के लिए भारी पैमाने पर निवेश किया जाए। चीन में लोकतांत्रिक सरकार नहीं है, इसलिए वह इन लोगों की समस्या सुनने के लिए किसी किस्म के संवाद की पक्षधर नहीं है। इस हिंसा के दो दिन बाद ही मध्यमार्गी उइगुर नेता और विद्वान इल्हाम तोहती को आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई है। तोहती शांतिपूर्ण तरीकों और संवाद के जरिये समस्याएं सुलझाने के पक्षधर हैं और जानकार यह मानते हैं कि उन्हें सजा सुनाकर किसी किस्म के संवाद की संभावना को चीन की सरकार ने खत्म कर दिया है। यह भी खबर है कि इससे विरोध और भड़क उठा है। यह भी सही है कि उइगुर में कई कट्टरवादी और आतंकवादी तत्व हैं, जिन्हें तालिबान और अल कायदा जैसे संगठनों से प्रेरणा और सहायता मिल रही है। यह भी संभव है कि ऐसे संगठन स्थानीय असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हों। लेकिन स्थानीय लोगों के सभी आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। चीन की एक और समस्या यह है कि उसका निकटस्थ मित्र देश पाकिस्तान आतंक के निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र है और चीन के लिए यह सुविधाजनक भी है कि ऐसे तत्व भारत या पश्चिमी देशों के खिलाफ हिंसा फैलाएं। अब आंच चीन तक पहुंच रही है, इसलिए चीन ने पाकिस्तान से भी कहा है कि उसके द्वारा प्रायोजित संगठन चीन में उइगुर अलगाववाद को बढ़ावा न दें। लेकिन कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान का नियंत्रण भी सीमित है और अगर पड़ोस में आग लगी है, तो चीन के लिए यह मुश्किल है कि आंच से अपने घर को बचाए रख सके। अगर चीन कुछ लोकतांत्रिक तौर-तरीके सीख पाए, तो उसे शायद इस आतंकवाद और अलगाववाद से निपटने में आसानी हो, लेकिन ऐसा फिलहाल तो मुश्किल लगता है।
नवभारत टाइम्स | Sep 24, 2014
चीन के राष्ट्रपति ने अपनी सेना से जो कहा है, लद्दाख के हालात देखते हुए वह हमारे लिए चिंता का विषय है। शी चिन फिंग ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) से कहा है कि वह क्षेत्रीय युद्ध के लिए तैयार रहें। कहीं उनका इशारा भारत की तरफ तो नहीं? ऐसी बातें उन्होंने शायद पहले भी कही हों, लेकिन अभी हमारी आशंका के पर्याप्त आधार हैं। गौरतलब है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पिछले कई दिनों से तनाव बना हुआ है। लद्दाख के तीन इलाकों में भारत और चीन के हजारों फौजी आमने-सामने हैं। जिस समय फिंग भारत में प्रधानमंत्री मोदी के साथ शिखर वार्ता कर रहे थे, उस समय लद्दाख के चुमार इलाके में चीनी सैनिक टेंट गाड़ कर बैठे हुए थे। जब भारत ने फिंग का ध्यान इस ओर खींचा तो उन्होंने संकेत दिया कि वे इस मामले का हल निकालेंगे। भारत में यह उम्मीद जगी कि शायद अब चीनी सैनिक वापस हो जाएंगे। लेकिन उनके तंबू अब भी हटे नहीं हैं। बल्कि उन्होंने दूसरे रास्तों से भी घुसपैठ की है। ऐसे हालात में शी चिन फिंग का यह बयान आया है। वैसे एलएसी पर चीनी सेना के बड़े जमावड़े या सैन्य तैयारी के कोई संकेत नहीं मिले हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि पीपल्स आर्मी के कुछ अफसरों का तबादला कर दिया गया है। भारत में इसकी व्याख्या इस रूप में की गई कि शायद चुमार पर चीनी प्रेजिंडेट का निर्देश न मानने के कारण उन्हें यह सजा दी गई है। इस राय को फिंग की इस बात से भी बल मिल रहा है कि चीनी सेना सरकार के प्रति वफादार रहे। क्या फिंग ने चीनी सेना को चुमार से पीछे हटने को कहा था, जिसे अधिकारियों ने नहीं माना? मामला चाहे जो हो, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सच यह है कि भारत की आपत्तियों के बावजूद चीनी सैनिक चुमार में डटे हुए हैं। संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी राष्ट्राध्यक्ष की यात्रा के दौरान ही उसके देश की सेना ने सीमा पर इस तरह का आक्रामक रुख अपनाया है। तो क्या चीन के लिए उन आर्थिक समझौतों का कोई अर्थ नहीं है, जो फिंग की यात्रा के दौरान भारत के साथ किए गए? कहीं चीन भारत के साथ वही नीति तो नहीं अपना रहा, जो उसने जापान या वियतनाम के साथ अपना रखी है? यानी पहले राजनयिक और सीमा संबंधी मसले हल हों, उसके बाद ही आर्थिक मामलों को तवज्जो दी जाए। चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा का निर्धारण न होने से इसको लेकर दोनों पक्षों के विचारों में अंतर है। यही बात फिंग ने भी अपनी यात्रा के दौरान कही थी। मुमकिन है, चीन इस बार दबाव बनाकर इस पर कोई अंतिम फैसला करवाने के मूड में हो। जाहिर है, भारत को इसे गंभीरता से लेना होगा। तनाव के मद्देनजर सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग को अपना पहला विदेश दौरा रद्द करना पड़ा है। लेकिन इस बारे में कोई निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को ही लेना होगा।
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तिब्बत पर फिर गलती
Sat, 27 Sep 2014
मोदी से चीन के साथ रिश्तों के संदर्भ में तिब्बत मसले को फिर से खोलने की अपेक्षा कर रहे हैं
ब्रह्मा चेलानी
चीन ने वर्ष 1950 में तिब्बत को हड़प लिया या कहें अपने में मिला लिया। हालांकि अभी भी यह मुद्दा भारत-चीन की समस्याओं का मुख्य केंद्र है, जिसमें भौगोलिक विवाद, सीमा तनाव और जल विवाद शामिल हैं। बीजिंग ने स्वयं तिब्बत मसले को एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए भारत के एक बड़े भूभाग पर दावा किया है और कहा है कि इन भूभागों का संबंध तिब्बत से है। जब चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग पिछले सप्ताह भारत की यात्रा पर थे तो तिब्बत को लेकर बहुत कुछ लिखा और कहा गया। वास्तव में देखा जाए तो शी चिनफिंग की यात्रा बहुत हद तक परंपरागत भारत-तिब्बत सीमा में चीनी सेना की घुसपैठ के साये में संपन्न हुई। पिछले कई वर्षो से हो रही घुसपैठ के मद्देनजर इस बार चीनी सैनिकों की संख्या काफी अधिक थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि शी चिनफिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन के उपहार के तौर पर भारत को कड़ा संदेश देने के लिए यह समय चुना अथवा निर्धारित किया।
मोदी सरकार ने नई दिल्ली में शी चिनफिंग की यात्रा के दो दिनों के दौरान तिब्बत के निर्वासितों को विरोध प्रदर्शन की अनुमति दी। इसमें शिखर बैठक के पास का स्थान भी शामिल है। यह विरोध प्रदर्शन 1990 की शुरुआत में होने वाले कड़े विरोध प्रदर्शनों से अलग था जब पुलिस किसी भी महत्वपूर्ण चीनी व्यक्ति के आगमन पर ऐसे किसी भी विरोध प्रदर्शनों को नाकाम अथवा विफल बनाने की कोशिश करती थी। वास्तव में मनमोहन सिंह के ही एक दशक लंबे शासन के दौरान पुलिस ऐसी किसी स्थिति में दिल्ली में स्थित तिब्बतियों के घरों के आसपास वाले इलाकों को बंद करा देती थी और रैली की कोशिश करने पर उन्हें बुरी तरह पीटती थी। इस तरह का क्रूर बर्ताव बहुत हद तक चीन के एकाधिकारवादी शासन से मेल खाता था, लेकिन यह उस देश के लिए शोभा नहीं देता जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता हो। ऐसी किसी भी घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों का मुंह बंद कराने पर चीन से भारत को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसलिए यह बदलाव स्वागतयोग्य है कि भारत ने बड़ी तादाद में तिब्बती प्रदर्शनकारियोंको अपने वैध लोकतांत्रिक अधिकारों को अभिव्यक्त करने की मान्यता अथवा स्वीकृति दी। यहां तक कि खुद दलाई लामा ने भी शी चिनफिंग की यात्रा के दौरान अपनी बात कहने में अधिक सहजता महसूस की। उन्होंने भारतीयों को याद दिलाया कि तिब्बत की समस्या वास्तव में भारत की भी समस्या है। चीन के खिलाफ होने वाला तिब्बती प्रदर्शन हालांकि शांतिपूर्ण होता है, जिसे खुद भारतीय संस्थान ही अनुमति देता है।
मई में जब मोदी ने पदभार ग्रहण किया तो तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांग्ये को भी इसमें आमंत्रित किया गया था। इसलिए शी चिनफिंग ने मोदी से यह आश्वासन मांगा कि वह तिब्बत को चीन के हिस्से के तौर पर मान्यता दें। चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तिब्बत चीन का आंतरिक हिस्सा है और भारत अपनी जमीन से किसी भी अलगाववादी गतिविधि को अनुमति नहीं देगा। निश्चित ही यह आश्वासन निजी बातचीत में दिया गया, क्योंकि मोदी ने इस विषय पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी नहीं बोला है। विस्तृत रूप में फैला हुआ तिब्बती भूभाग अपने पूरे इतिहास काल में भारतीय और चीनी सभ्यता द्वारा पृथक रहा है। सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से भी इसका संबंध चीन से बहुत कम रहा है और राजनीतिक संबंध तो कभी रहा ही नहीं। चीन द्वारा तिब्बत को जबरन हड़पे जाने के बाद ही चीनी सेना की टुकडि़यां भारत के हिमालयी सीमावर्ती इलाकों में पहली बार दाखिल हुई। इस घटना का ही परिणाम था कि 1962 में हिमालय पार करके चीन ने खूनी युद्ध को अंजाम दिया। तिब्बत के पतन से आधुनिक भारत का इतिहास भू-राजनीतिक रूप से बदल गया। बावजूद इसके प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1954 में तिब्बत पर ब्रिटिश शासकों द्वारा दिए गए अतिरिक्त अधिकार को छोड़ दिया और तिब्बत को चीन के तिब्बत क्षेत्र के तौर पर मान्यता दे दी। हालांकि उस समय तक बीजिंग ने भारत-तिब्बत सीमा को मान्यता नहीं दी थी। उन्होंने यह काम एक समझौते पर हस्ताक्षर करके किया और इसे तिब्बती बौद्ध दर्शन के मुताबिक पंचशील नाम दिया।
वर्षो बाद एक अन्य भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार और औपचारिक तौर पर भारत के हाथ में मौजूद तिब्बत कार्ड को चीन को समर्पित करने का काम किया। वाजपेयी की 2003 में बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी सरकार ने उनसे असंदिग्ध तौर पर तिब्बत को चीन का हिस्सा होने की स्वीकृति हासिल की। वाजपेयी ने पहली बार इसे वैध शब्दावली प्रदान करते हुए भारत की स्वीकृति अथवा मान्यता दी, जिसे चीन तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र कहता है। चीन इसे अपने भूभाग का आंतरिक हिस्सा बताता है। वाजपेयी के इस आत्मसमर्पण अथवा समझौते ने चीन को भारत के एक बड़े उत्तरपूर्वी क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश (ताइवान से तीन गुना बड़ा) पर अपना दावा करने का मौका दिया। 2006 से चीन इसे दक्षिण तिब्बत नाम से पुकारता है। इसी तरह चीन ने जम्मू-कश्मीर के भारतीय हिस्से पर उसकी संप्रभुता को लेकर सवाल उठाना शुरू किया। इसका एक तिहाई हिस्से से अधिक भाग पाकिस्तान के पास है तो पांचवां भाग चीन ने कब्जा रखा है। इस तरह के हालात ने चीनी सेना को बार-बार घुसपैठ के लिए बल दिया। 2010 से भारत ने तिब्बत का उल्लेख करना बंद कर दिया है और चीन के साथ संयुक्त बयानों में 'एक चीन' शब्द का उल्लेख किया जाता है।
फिर से एक गड़बड़ी यह हुई कि मोदी-शी के संयुक्त बयान में पिछले दरवाजे से तिब्बत का मुद्दा लाया गया और चीनी तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र की स्थानीय सरकार को धन्यवाद दिया गया। इस संयुक्त बयान में भारतीय पक्ष की ओर से भारतीय तीर्थयात्रियों को कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए चीनी तिब्बती स्वायत्तशासी क्षेत्र की स्थानीय सरकार और विदेश मंत्रालय के सहयोग और समर्थन के लिए प्रशंसा की गई है। बहुत चतुराई से उन शब्दों का प्रयोग किया गया है जैसा कि बीजिंग चाहता था, जबकि 2013 में चीन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के समय संयुक्त बयान में कहा गया था भारतीय तीर्थयात्रियों की दी जाने वाली सुविधा में सुधार के लिए भारतीय पक्ष चीनी पक्ष की सराहना करता है। शब्दों में यह बदलाव आखिर किसकी गलती से हुआ और क्या इसके लिए मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अनुमति ली गई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोषियों को दंडित किया जाएगा। मोदी को अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों में सुधार करना चाहिए। वास्तव में भारत को चाहिए कि वह चीन पर तिब्बत से मेल-मिलाप के लिए दबाव डाले अन्यथा तिब्बत मसला भारत-चीन विभाजन का मुख्य मुद्दा बना रहेगा।
(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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हिंसा और दमन
26-09-14
चीन के अशांत शिनजियांग प्रांत में हिंसा से पचास से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबर है। इस इलाके में पिछले एक साल में 300 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। चीन में खबरों पर कड़ा सेंसर है और चीनी मीडिया भी इस इलाके की खबरें सिर्फ सरकारी शिन्हुआ एजेंसी से ही ले सकता है, इसलिए यह मुमकिन है कि वहां की सच्ची तस्वीर लोगों को पता नहीं चलती हो। विदेश में बसे उइगुर लोगों का कहना है कि चीनी सुरक्षा बल इस इलाके में भारी दमन कर रहे हैं और बहुत सारी घटनाएं रिपोर्ट ही नहीं होतीं। ताजा घटना को चीन सरकार ने आतंकवादी वारदात कहा है, हालांकि 40 से ज्यादा लोग पुलिस की गोली से मरे हैं, जिन्हें चीन सरकार दंगाई बता रही है। दो दंगाइयों को जिंदा पकड़ने का दावा भी सरकार ने किया है। जाहिर है कि जब इतने लोग सुरक्षा बलों की गोलियों के शिकार हुए हैं, तो इसका मतलब है कि सुरक्षा बलों ने काफी सख्ती बरती है। उइगुर लोगों का कहना है कि सुरक्षा बल आम तौर पर अंधाधुंध गोलियां चलाते हैं, जिससे कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं। शिनजियांग इलाके में पिछली मई में एक बाजार में हुए विस्फोटों में 30 लोग मारे गए थे और एक रेलवे स्टेशन पर हुए हमले में 29 लोग मारे गए थे। चीन के उइगुर लोग ज्यादातर मुस्लिम हैं और सांस्कृतिक रूप से भी वे बाकी चीन के लोगों से काफी अलग हैं। इन लोगों में अपने लिए अलग राज्य की मांग जोर पकड़ रही है। चीन सरकार का कहना है कि इनमें आतंकवादी तत्व हैं और इन्हें बाहर से मदद मिल रही है। यह भी दावा किया जाता है कि कई आंदोलनकारी अफगानिस्तान से प्रशिक्षण लेकर लौटे हैं। चीन सरकार की रणनीति यह है कि विरोध करने वालों का सख्ती से दमन किया जाए और इस इलाके के पिछड़ेपन को खत्म करने के लिए भारी पैमाने पर निवेश किया जाए। चीन में लोकतांत्रिक सरकार नहीं है, इसलिए वह इन लोगों की समस्या सुनने के लिए किसी किस्म के संवाद की पक्षधर नहीं है। इस हिंसा के दो दिन बाद ही मध्यमार्गी उइगुर नेता और विद्वान इल्हाम तोहती को आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई है। तोहती शांतिपूर्ण तरीकों और संवाद के जरिये समस्याएं सुलझाने के पक्षधर हैं और जानकार यह मानते हैं कि उन्हें सजा सुनाकर किसी किस्म के संवाद की संभावना को चीन की सरकार ने खत्म कर दिया है। यह भी खबर है कि इससे विरोध और भड़क उठा है। यह भी सही है कि उइगुर में कई कट्टरवादी और आतंकवादी तत्व हैं, जिन्हें तालिबान और अल कायदा जैसे संगठनों से प्रेरणा और सहायता मिल रही है। यह भी संभव है कि ऐसे संगठन स्थानीय असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हों। लेकिन स्थानीय लोगों के सभी आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। चीन की एक और समस्या यह है कि उसका निकटस्थ मित्र देश पाकिस्तान आतंक के निर्यात का सबसे बड़ा केंद्र है और चीन के लिए यह सुविधाजनक भी है कि ऐसे तत्व भारत या पश्चिमी देशों के खिलाफ हिंसा फैलाएं। अब आंच चीन तक पहुंच रही है, इसलिए चीन ने पाकिस्तान से भी कहा है कि उसके द्वारा प्रायोजित संगठन चीन में उइगुर अलगाववाद को बढ़ावा न दें। लेकिन कट्टरपंथियों पर पाकिस्तान का नियंत्रण भी सीमित है और अगर पड़ोस में आग लगी है, तो चीन के लिए यह मुश्किल है कि आंच से अपने घर को बचाए रख सके। अगर चीन कुछ लोकतांत्रिक तौर-तरीके सीख पाए, तो उसे शायद इस आतंकवाद और अलगाववाद से निपटने में आसानी हो, लेकिन ऐसा फिलहाल तो मुश्किल लगता है।
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