Friday, 24 October 2014

नियंत्रण रेखा




कठिन दौर की शुरुआत के संकेत

Sun, 24 Aug 2014

दोनों देश के बीच वार्ता रद होने के गतिरोध का बड़ा संकेत मिलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नियंत्रण रेखा (एलओसी) को भी चीन के साथ वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) की तरह रखना चाहते हैं। इसका आशय यह है कि जिस तरह भारत ने स्वीकार कर लिया है कि चीन के साथ पूरी तरह से द्विपक्षीय रिश्ते बेहतर होने तक उसके साथ विवादित सीमा पर बातचीत के लिए रुका जा सकता है। उसी तरह भावना के स्तर पर कम विवादित द्विपक्षीय मसलों के समाधान तक कश्मीर विवाद के सवाल पर रुका जा सकता है। इसीलिए जुलाई, 1972 के शिमला समझौते के शब्दों पर टिककर उन्होंने उसकी भावना और कश्मीर प्रस्ताव की प्रक्रिया तंत्र को छोड़ दिया।
शिमला समझौते पर इंदिरा गांधी के निकटतम सलाहकारों में से एक पीएन धर ने अपनी किताब 'इंदिरा गांधी, द इमरजेंसी एंड इंडियन डेमोक्रेसी' में गहन रोशनी डाली है। धर के मुताबिक, 'कश्मीर समस्या के भारतीय समाधान के मूल में संघर्ष विराम रेखा को नियंत्रण रेखा में तब्दील करना था। यह नियंत्रण रेखा ही भविष्य में धीरे-धीरे बॉर्डर के स्तर तक पहुंचती।' वास्तव में यह पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के भारतीय प्रधानमंत्री को मौखिक आश्वासन पर आधारित थी। धर के मुताबिक, 'भुट्टो न केवल संघर्ष विराम रेखा को एलओसी के रूप में तब्दीली पर सहमत थे बल्कि वह इस बात के लिए भी सहमत थे कि उसमें बाद में धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा के लक्षण विकसित हो जाएंगे।' उसके बाद अगले शिखर स्तर की बातचीत होने से पहले जहां शिमला के उस मौखिक आवासन को अमलीजामा पहनाया जाना था, इंदिरा गांधी ने महसूस किया, 'घाटी के मुसलमानों की भावनाओं को भी संतुष्ट किए जाने की जरूरत है।' नतीजतन इंदिरा-अब्दुल्ला समझौता अस्तित्व में आया। इसके तहत कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व करने वाले शेख अब्दुल्ला भी भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली वार्ता के एक पक्षकार बन गए।
उसके बाद से केंद्र की सभी सरकारों ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए दोहरे ट्रैक पाकिस्तान के साथ और घरेलू स्तर पर बातचीत को अपनाया। कश्मीर में उग्रवाद जब चरम पर था तब मई, 1993 में अलगाववादी नेताओं के संगठन हुर्रियत के अस्तित्व में आने के बाद नई दिल्ली ने कश्मीर में राजनीतिक प्रतिनिधि के अलावा हुर्रियत को भी आंतरिक पक्षकार का हिस्सा माना। वाजपेयी और मनमोहन सिंह सरकारों ने हुर्रियत के उदारवादी धड़े के साथ विभिन्न स्तरों पर बातचीत की। घाटी के मूड को भांपने के लिए पाकिस्तान ने भी यही किया।
बासित की हुर्रियत नेताओं से बातचीत करने के क्रम में मोदी सरकार ने असाधारण रोष प्रकट कर कश्मीर मसले पर बातचीत को स्थगित करने के संकेत दिए हैं। इससे भारत उस संकल्प के पक्ष में खड़ा दिखता है जो 22 फरवरी, 1994 में संसद में पारित हुआ था। उसमें कहा गया था कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान को इसके कब्जे वाले हिस्से से हटना चाहिए। वास्तव में बिना किसी अपवाद के सभी राजनीतिक दल समझते हैं कि शिमला समझौते की भावना के अनुरूप एलओसी को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा में तब्दील करना ही इस समस्या का एकमात्र व्यवहारिक समाधान है।
1998 में परमाणु परीक्षण के बाद जसवंत सिंह से 13 दौर की बातचीत करने वाले क्लिंटन प्रशासन के डिप्टी सेक्रेट्री ऑफ स्टेट स्ट्रोब टॉलबोट ने अपनी किताब 'इंगेजिंग इंडिया' में लिखा है, 'जसवंत सिंह ने जिक्र किया था कि सरकार 1949 की एलओसी को अंतरराष्ट्रीय रेखा के रूप में विचार कर रही है।' यह भाजपा की उस स्थापित लाइन से विचलन था जिसके तहत भारत को पाक अधिकृत कश्मीर के हिस्से को भी एकीकरण के तहत अपने अधीन लाने का उपक्रम करना चाहिए।
क्या शिमला समझौते की भावना को दरकिनार कर मोदी भाजपा की इस मूल लाइन पर लौटने का प्रयास कर रहे हैं? यदि यह सही है तो भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए कठिन दौर होगा। पाकिस्तान की भारतीय नीति की संरक्षक वहां की सेना कभी इसको स्वीकार नहीं करेगी।
-प्रवीण साहनी [संपादक, फोर्स न्यूज मैगजीन]

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