Friday, 24 October 2014

अफगानिस्तान




काबुल में समझौता

22-09-14 

अफगानिस्तान में अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच समझौता होने से लगभग तीन महीने पुराना गतिरोध खत्म हो गया है और नई सरकार के बनने का रास्ता साफ हो गया है। अप्रैल में हुए चुनावों का तालिबान ने विरोध किया था, इसके बावजूद आम लोगों ने भारी तादाद में मतदान में हिस्सा लिया था। इससे यह पता चलता है कि अफगानिस्तान की जनता में अपनी सरकार को चुनने और देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के कायम होने की कितनी प्रबल इच्छा है। लेकिन चुनाव शांतिपूर्ण नहीं रहे और हिंसा के साथ व्यापक धांधली के भी आरोप लगे। कड़े मुकाबले में अशरफ गनी राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन हारे हुए उम्मीदवार अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने धांधली के आरोप लगाते हुए चुनाव प्रक्रिया और नतीजों को मानने से इनकार कर दिया। चुनावों में भारी हिंसा हुई और दोनों पक्षों के हथियारबंद कार्यकर्ता अब भी मोर्चा लेने को तैयार हैं। दोनों पक्षों में दुश्मनी इस तरह हो गई थी कि सरकार बनाए जाने पर समानांतर सरकार बनाने की धमकी भी ताकतवर कबीलाई नेता देने लगे थे। अब कम से कम कुछ तो शांति स्थापित हुई है।
दोनों नेताओं में जो समझौता हुआ है, उसके मुताबिक अशरफ गनी राष्ट्रपति बनेंगे और एक पद मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ का होगा। सीईओ के अधिकार प्रधानमंत्री वाले होंगे और सरकार में प्रशासनिक सत्ता दोनों में विभाजित रहेगी। दो साल में संविधान में संशोधन करके प्रधानमंत्री का पद निर्माण किया जाएगा और तब सीईओ की जगह प्रधानमंत्री ले लेंगे। यह देखना होगा कि अब्दुल्ला खुद सीईओ का पद स्वीकार करते हैं या अपने किसी आदमी को इस पद पर बिठाते हैं। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस व्यवस्था को कैसे निभाया जाता है। दोनों नेता पढ़े-लिखे हैं, महत्वपूर्ण पदों पर साथ-साथ काम कर चुके हैं, लेकिन दोनों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं। समझौते की घोषणा जब की गई, तब भी दोनों नेताओं के बीच कोई गर्मजोशी नहीं दिखी। घोषणा के बाद प्रस्तावित प्रेस कांफ्रेंस भी नहीं हुई। दोनों नेताओं से ज्यादा खराब रिश्ते उनके समर्थकों के बीच हैं, जिनके बीच पिछले दिनों कई हिंसक झड़पें हो चुकी हैं और इस बात की भी संभावना कम है कि अब दोनों के हथियारबंद समर्थक शांतिपूर्वक घर लौट जाएंगे। अगर इन दोनों नेताओं के बीच समझौता नहीं चला, तो अफगानिस्तान फिर गृहयुद्ध में फंस सकता है। जब से चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से तालिबान ने भी अपने हमले तेज कर दिए हैं। ऐसे में, जरूरी यह है कि अफगान जनता की इच्छा के मुताबिक एक चुनी हुई स्थिर सरकार सत्ता संभाले और स्थिति को नियंत्रित करे। अफगान जनता ने भारी खतरा उठाकर चुनावों में हिस्सा लिया था, उनकी हिम्मत का उन्हें अच्छा नतीजा मिले, यह कोशिश जरूरी है। अब अफगानिस्तान में दो काबिल और समझदार नेता शीर्ष पर हैं, मगर परस्पर शत्रुता की वजह से अस्थिरता बनी हुई है। हालांकि कुछ अच्छी बातें तो हो ही जाएंगी। सबसे पहले दोनों नेता अमेरिकी और नाटो सेनाओं की मौजूदगी के लिए समझौते पर दस्तखत करेंगे, जिससे साल के अंत में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद भी कुछ जरूरी दस्ते वहां रह सकेंगे। ये दोनों ही नेता तालिबान से लड़ने में हामिद करजई से ज्यादा गंभीरता दिखाएंगे। इस सरकार के बनने के बाद विदेशी सरकारों से सहायता राशि भी मिलनी शुरू हो जाएगी। फिलहाल सरकारी कर्मचारियों को तनख्वाह तक मिलना मुश्किल हो रहा है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अर्थशास्त्री अशरफ गनी और चिकित्सक अब्दुल्ला अब्दुल्ला क्या अफगानिस्तान की स्थिति में स्थायी सुधार ला पाएंगे?
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अफगान नीति का इम्तिहान

Sun, 05 Oct 2014

अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति के तौर पर विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री अशरफ गनी ने शपथ लेने के साथ ही शासन में सुधार लाने, विकास को बढ़ावा देने तथा गरीबी और भ्रष्टाचार को खत्म करने का वादा किया है। कई महीनों के बाद हुए समझौते के रूप में राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर अब्दुल्ला अब्दुल्ला और गनी ने अमेरिका की मध्यस्थता में सत्ता के बंटवारे के मसौदे पर हस्ताक्षर किए। जो अंतिम बाधा थी वह यही कि परिणामों को किस तरह घोषित किया जाए। अब्दुल्ला आकलनों के मुताबिक गनी से पिछड़ रहे थे। उन्हें इस बात के लिए राजी किया गया कि आधिकारिक मतदान प्रतिशत को किसी भी हाल में सार्वजनिक नहीं किया जाए। समझौते के कुछ घंटों बाद ही राष्ट्रपति के तौर पर गनी को विजेता घोषित कर दिया गया। इस तरह अब्दुल्ला को एक नवसृजित पद दिया गया, जिसके तहत उन्हें प्रमुख कार्यकारी बनाया गया है। यह पद शक्ति के लिहाज से प्रधानमंत्री के बराबर है। उन्होंने वादा किया कि पूर्ण विश्वास और ईमानदारी के साथ वह एक दूसरे के साथ अफगानिस्तान के बेहतर भविष्य के लिए काम करेंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ और सबने इस घटनाक्रम का स्वागत किया। ओबामा प्रशासन को इससे बड़ी राहत मिली और समझौते की सराहना करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण अवसर बताया गया जो अफगानिस्तान की एकता और स्थिरता के लिहाज से जरूरी था।
वाशिंगटन ने अब्दुल्ला और गनी, दोनों को ही अफगानिस्तान के राजनीतिक संकट का समाधान निकालने के लिए बधाई दी और नए प्रशासन की सफलता को सुनिश्चित करने के लिए साथ मिलकर काम करने की बात कही। एक दिन बाद ही गनी ने द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते के तहत 2014 के बाद भी अफगानिस्तान में लगभग 10 हजार अमेरिकी सैनिकों के रुकने के समझौते पर हस्ताक्षर किए ताकि अफगान सेना और पुलिस बलों को प्रशिक्षित किया जा सके। इसी तरह सशस्त्र बलों को अलग दर्जा देने के समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए जिसके तहत दिसंबर 2014 के बाद भी नाटो बलों की एक छोटी टुकड़ी अफगानिस्तान में बनी रहेगी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तालिबान ने इसकी मुखालफत करते हुए समझौते को शर्मनाक बताया है। एक बयान में तालिबान प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अशरफ गनी को राष्ट्रपति बनाने और एक फर्जी प्रशासन के गठन को अफगान जनता कभी भी स्वीकार नहीं करेगी। अपनी बात बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हम जब तक कब्जाए गए अपने देश को मुक्त नहीं करा लेते और इस्लामिक सरकार की नींव नहीं रख लेते हमारा जिहाद जारी रहेगा।
इस संदर्भ में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि अफगानिस्तान में राजनीतिक सत्ता के प्रथम लोकतांत्रिक हस्तांतरण का काम किस तरह पूरा होता है। इस संदर्भ में अब भारत को अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी। अफगानिस्तान के वास्तविक राजनीतिक हालात के मद्देनजर मोदी सरकार काबुल के साथ अपने संबंधों को लेकर अभी कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उस प्रतिबद्धता को पुन: दोहराया कि अफगानिस्तान की तमाम चुनौतियों के मद्देनजर भारत आगे भी हरसंभव मदद जारी रखेगा। उन्होंने इसकी भी पुष्टि की कि भारत अफगानिस्तान में महत्वपूर्ण निर्माण गतिविधियों को जारी रखेगा। विदेश मंत्री भारत को अफगानिस्तान का प्रथम सामरिक साझेदार बताते हुए कहा कि नई दिल्ली सदैव यहां की जनता के मजबूत और समृद्ध अफगानिस्तान के विजन के साथ है। उन्होंने अफगानिस्तान के साथ भारत की सहभागिता को लेकर लोगों के सकारात्मक रुख का भी उल्लेख किया। उन्होंने विशेष रूप से राजनीतिक दलों का भी आभार जताया है। अफगानिस्तान के शीर्ष नेताओं से मिलकर भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने और उन्हें अकेला नहीं छोड़ने की बात कहने के लिए शशि थरूर ने भी सुषमा स्वराज की सराहना की। भारत के सभी दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों के साथ काबुल से दूर होना मोदी सरकार के लिए चिंता की बात रही है। अफगानिस्तान में जारी राजनीतिक अनिश्चितता ही वास्तविक मायनों में काबुल से दूर होने का कारण रही है। जब नई सरकार के तौर पर अफगानिस्तान के प्रति नीतियों में बदलाव अथवा समीक्षा के लिए सुषमा स्वराज से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इसमें बदलाव की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रधानमंत्री की अमेरिकी यात्रा के दौरान अफगानिस्तान उनका एक मुख्य एजेंडा था। भारत द्वारा बल दिए जाने पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा कि हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे तालिबान और अलकायदा के बीच गठबंधन तोड़ा जा सके।
भारत और अमेरिका अफगानिस्तान में ऐसी व्यवस्था की अपेक्षा कर रहे हैं जिससे वहां रहने वाले सभी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो। यह गौर करने वाली बात है कि अमेरिका बिना किसी हिचक के तालिबान के साथ बातचीत करने के लिए तैयार है। अभी तक तालिबान का रुख चिंताजनक रहा है। वह अफगानिस्तान सरकार को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है और न ही अलकायदा से अपना संबंध तोड़ना चाहता है। वाशिंगटन और लंदन द्वारा युद्ध को समाप्त करने की जल्दबाजी को तालिबान अच्छी तरह समझता है। अपनी यात्रा के दौरान मोदी ने वाशिंगटन से यह आश्वासन मांगा कि तालिबान को सामान्य राजनीतिक प्रक्त्रिया में शामिल करते समय भारतीय हितों के साथ समझौता नहीं किया जाए, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि नई दिल्ली अमेरिका पर पूर्ण निर्भर न रहे। भारत ने खुद को अफगानिस्तान से दूर किया है और इसके लिए वह स्वयं दोषी है। हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी चाहिए। अब समय आ गया है जब मोदी सरकार वाशिंगटन की तरह मुखर हो।
[लेखक हर्ष वी. पंत, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हैं]
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