सपना साकार करने का समय
Wed, 17 Sep 2014
मैंने 17 साल पहले भी प्राचीन व रहस्यमय भारत की यात्रा की थी। उस वक्त भारत आर्थिक सुधारों की नीति को आगे बढ़ा रहा था और आर्थिक विकास के क्षेत्र में नई उम्मीद दिख रही थी। भारत का प्रमुख समृद्ध वाणिज्यिक शहर मुंबई, सिलिकॉन वैली बेंगलूर और बॉलीवुड की फिल्में व योग विश्व भर को प्रभावित करते रहे हैं। भारतीय जनता को अपने भविष्य के प्रति बहुत सारी उम्मीदें हैं। पुरानी सभ्यता में पुन: युवा शक्ति का जोश दिखने लगा है। 17 साल बाद फिर एक बार मैं इस सुंदर भूमि पर कदम रखूंगा। आज का भारत एक उल्लेखनीय नवोदित बाजार और बड़ा विकासशील देश बन चुका है। यह एशिया का तीसरा बड़ा आर्थिक समुदाय, विश्व का दूसरा बड़ा सॉफ्टवेयर पॉवर और कृषि उत्पादों का निर्यातक देश भी है। भारत संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और ब्रिक्स आदि संगठनों का भी सदस्य है, जो अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मंच पर दिन-ब-दिन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत की कहानी लोगों की जुबान पर गूंजती रहती है। भारत में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद विकास व आर्थिक सुधारों का रुझान तेज हुआ है। भारतीय जनता का आत्मविश्वास बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत में मौके तलाश रहा है।
नई सदी में प्रवेश करने के बाद चीन-भारत संबंधों का व्यापक विकास हुआ है। दोनों देशों ने शांति व समृद्धि की दिशा में रणनीतिक सहयोग आधारित साझेदारी संबंध स्थापित किए हैं। चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस भागीदार बन चुका है। द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2000 में तीन अरब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अब लगभग 70 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच चुका है। पिछले साल दोनों देशों के 8 लाख 20 हजार नागरिकों ने एक-दूसरे के यहां दौरा या पर्यटन किया। जलवायु परिवर्तन, खाद्यान्न सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे वैश्रि्वक समस्याओं पर दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। इसके साथ ही द्विपक्षीय संबंधों तथा विकासशील देशों के समान हितों की रक्षा के लिए कारगर पहल हुई है। दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता को लेकर भी सक्रिय प्रगति हुई है। दोनों पक्षों ने सीमा क्षेत्र में अमन-चैन स्थापित करने की पूरी कोशिश की है। चीन-भारत संबंध 21वीं सदी में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सक्रिय द्विपक्षीय संबंधों में से एक बन चुका है। चीन और भारत के बीच अच्छे रिश्ते जरूरी हैं। हम एक-दूसरे पर भरोसे के सिद्धांत को अपनाकर रणनीतिक संपर्क को निरंतर मजबूत करने के साथ-साथ परस्पर विश्वास को और प्रगाढ़ करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं। हम एक-दूसरे के प्रति उदार रुख अपनाते हुए परस्पर सहयोग के क्षेत्रों का लगातार विस्तार करने की कोशिश में हैं और एक-दूसरे की भलाई और हितों के अनुरूप काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम मैत्रीपूर्ण भावना से एक-दूसरे के प्रति सम्मानजनक व्यवहार द्वारा सांस्कृतिक व मानवीय आवागमन को प्रोत्साहित करने और द्विपक्षीय संबंधों को प्रगाढ़ बनाने की दिशा में डटे हैं। इसके साथ ही हम एक-दूसरे के अहम सवालों का सम्मान करके समस्याओं व मतभेदों का अच्छी तरह प्रबंधन व निपटारा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं।
वर्तमान में चीन और भारत सुधार व विकास के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। चीनी जनता अपने राष्ट्र के महान पुनरुत्थान के चीनी सपने को साकार करने के लिए कठिन मेहनत कर रही है। चीन सुधार को सवरंगीण रूप से अपना रहा है और आगे बढ़ रहा है। वहीं चीनी विशेषता वाली समाजवादी प्रणाली में सुधार व विकास करने, देश की प्रशासनिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण के काम को आगे बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है। चीन ने 15 क्षेत्रों में 330 से अधिक सुधार के कदम उठाए हैं। हमारी सरकार अब इन नीतियों को आगे बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत की नई सरकार ने नौकरशाही को दुरुस्त करने और देश के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए 10 प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं। भारत एकजुट, शक्तिशाली व आधुनिक देश के तौर पर अपने महान राष्ट्र का निर्माण करने में लगा हुआ है। भारतीय जनता नए दौर के विकास लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयत्न कर रही है। चीन व भारत विकास के ऐतिहासिक दौर में हैं।
चीन व भारत के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का सपना एक-दूसरे से मिलता-जुलता है। हमें दोनों देशों की विकास संबंधी रणनीतियों को और मजबूती से आगे बढ़ाना चाहिए। साथ ही हाथ मिलाकर शक्तिशाली व समृद्ध देश के सपने को साकार करने की कोशिश करनी चाहिए। विभिन्न श्रेष्ठताओं वाले नवोदित बाजारवादी देश के तौर पर हमें विकास के लिए और अधिक साझेदारी की जरूरत है। हमें एक-दूसरे की खूबियों से सीख कर अपनी कमियों को दूर करते हुए आगे विकास करना चाहिए। बुनियादी संरचनाओं के निर्माण और प्रसंस्करण उद्योग के क्षेत्र में चीन के पास अधिक व्यापक अनुभव है। इन क्षेत्रों में चीन भारत के विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। भारत में सूचना व दवा उद्योग बहुत विकसित है। हम भारतीय कारोबारियों का चीन के बाजार में निवेश करने के लिए स्वागत करते हैं। विश्व का कारखाना और विश्व का दफ्तर यदि एक साथ आते हैं तो हम दुनिया में सर्वाधिक प्रतिस्पर्धी उत्पादन केंद्र बन सकते हैं और सबसे आकर्षक उपभोक्ता बाजार तैयार कर सकते हैं।
चीन और भारत को एशियाई अर्थव्यवस्था के दो इंजन होने के कारण आर्थिक विकास में परस्पर साझेदारी बढ़ानी चाहिए। मुझे विश्वास है कि चीनी ऊर्जा और भारतीय बुद्धिमत्ता का मिलन हो जाए तो बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। एशियाई अर्थव्यवस्था के अनवरत विकास को आगे बढ़ाने के लिए हम बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर के निर्माण को आगे बढ़ाएंगे, जबकि सिल्क रोड आर्थिक जोन और 21वीं शताब्दी में समुद्री सिल्क रोड के आह्वान पर भी चर्चा करेंगे। वैश्रि्वक बहुध्रुवीकरण की प्रक्त्रिया में दो बड़ी और महत्वपूर्ण शक्तियां होने के कारण हमें रणनीतिक सहयोग वाली वैश्रि्वक साझेदारी करनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि चीन व भारत दो शरीर और एक भावना हैं। मैं इससे सहमत हूं। हालांकि चीनी ड्रैगन और भारतीय हाथी की भिन्न-भिन्न विशेषताएं हैं, फिर भी दोनों देश शांति, निष्पक्षता और न्याय के पक्षधर हैं। हमें पंचशील सिद्धांत का प्रसार करके अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को और अधिक निष्पक्ष व सही दिशा में विकसित करने की कोशिश जारी रखनी चाहिए। वहीं युग के विकास और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की समान मांग को पूरा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को बेहतर ढंग से हल करने की आवश्यकता है। चीनी नेता देंग ने कहा था, एशिया की सदी का सपना चीन-भारत और अन्य पड़ोसी देशों के विकास के बाद ही साकार हो सकेगा। हम युग प्रदत्त जिम्मेदारी को निभाते हुए चीन-भारत मैत्री की प्रेरणाशक्ति बनने को तैयार हैं। भारत यात्रा के दौरान शांति व समृद्धि की दिशा में उन्मुख चीन-भारत रणनीतिक सहयोग आधारित साझेदारी संबंधों में नई प्रेरणा शक्ति डालने के लिए मैं भारतीय नेताओं के साथ दोनों देशों के बीच रिश्तों पर गहन आदान-प्रदान की प्रतीक्षा में हूं। मुझे विश्वास है कि अगर चीन व भारत एकजुट होकर सहयोग करते रहे तो एक समृद्ध व पुनर्जीवित एशिया की सदी अवश्य ही जल्द साकार होगी।
[लेखक शी चिनफिंग, चीन के राष्ट्रपति हैं]
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चीन की चुनौती का जवाब
Tue, 23 Sep 2014
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की विदाई के साथ ही लद्दाख के चुमार में चीनी सैनिकों का फिर से घुस आना क्या रेखांकित करता है? शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई शिखर वार्ता के बाद लद्दाख के चुमार और डेमचक इलाके में घुस आए चीनी सैनिकों की वापसी क्या महज दिखावा था? दोनों देशों के बीच हुई शिखर वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी के सख्त एतराज के बाद शी चिनफिंग ने दशकों से लंबित सीमा विवाद को निबटाने की प्रतिबद्धता जताई थी, उस भरोसे को तोड़ने का क्या अर्थ है? प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट किया है कि सीमा पर शांति कायम रखकर ही आर्थिक संभावनाओं की बुनियाद मजबूत की जा सकती है। यह सही है कि नेहरू-माओ के युग की तुलना में आज आर्थिक पहलुओं का महत्व भूगोल से कम नहीं है और भारतीय बाजार पर निगाहें टिकाए चीन को भारत के साथ शांतिपूर्ण संबंधों और सकारात्मक माहौल की गंभीरता की समझ है। ऐसे में चीनी सैनिकों द्वारा निरंतर भारतीय सीमाओं का उल्लंघन क्यों? भारत आने से पूर्व शी चिनफिंग का मालदीव और श्रीलंका का दौरा, भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के वियतनाम दौरे में हुए तेल एवं गैस दोहन के करार पर चीन की आपत्तिऔर हिंद महासागर व दक्षिण चीन सागर में निरंतर प्रभुत्व कायम करने के चीनी प्रयासों पर चिंता स्वाभाविक है। क्यों चीन की कथनी और करनी में विरोधाभास बना हुआ है?
अपने वियतनाम दौरे में प्रणब मुखर्जी ने वियतनाम के साथ जो करार किया है उस पर चीन की आपत्तिदूसरे देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप करना है। वियतनाम के साथ तेल एवं गैस दोहन की संभावनाओं पर काम करने से पूर्व भारत चीन से सलाह क्यों ले? दो साल पूर्व भी जब भारत ने वियतनाम के साथ 128 ब्लॉक में तेल एवं गैस दोहन का करार किया था तब भी चीन ने कड़ी आपत्तिजताई थी। तत्कालीन सत्ता अधिष्ठान ने चीनी दबाव में उस योजना पर काम बंद भी कर दिया। यह सही है कि कोई भी राष्ट्र इतिहास से चिपक कर नहीं जी सकता, भविष्य की इबारत लिखना ही कालचक्र है। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी और शी चिनफिंग के बीच हुई वार्ता का एक सकारात्मक संदेश है, दोनों ही देश आर्थिक समृद्धि की दिशा में द्विपक्षीय कारोबार को बढ़ाने के साथ सीमा विवाद सुलझाने के पक्ष में हैं।
शी चिनफिंग और प्रधानमंत्री मोदी केबीच हुई शिखर वार्ता में दोनों देशों के बीच 12 समझौतों में अगले पांच साल के लिए आर्थिक प्लान पर हुआ करार अत्यंत महत्वपूर्ण है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए वैकल्पिक मार्ग की घोषणा करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सौगात से कम नहीं है। दोनों देशों के बीच मीडिया, रेलवे के आधुनिकीकरण, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण करार हुए। वर्ष 2000 के बाद से अब तक भारत और चीन के बीच व्यापार में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2010 तक यह व्यापार तीस गुना बढ़ा है। किंतु अब तक यह व्यापार भारत के लिए घाटे का सौदा रहा है। भारत निर्यात कम और आयात ज्यादा करता है। भारत से च्यादातर लौह अयस्क और कीमती पत्थर निर्यात किए जाते हैं। भारत की अपेक्षा चीन च्यादा निर्यात करने के साथ उन्हीं कच्चे मालों से सामान तैयार कर भारत और अन्य देशों को बेचता है। चीन ने भारत में जहां मात्र 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, वहीं दक्षिण एशियाई देशों के साथ अपना व्यापार 150 अरब डॉलर तक बढ़ाने की इच्छा जताई है। गहराई में देखा जाए तो दक्षिण एशिया के जिन देशों में भारत का जो भी प्रभाव है, चीन उसे लक्ष्य कर उन तमाम देशों में अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है। मालदीव और श्रीलंका के दौरे में शी चिनफिंग ने कहा है कि उन देशों में वह किसी भी बाहरी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे। वह बाहरी देश कोई और नहीं, भारत ही है।
चीन लंबे समय से भारत की सामरिक और आर्थिक घेरेबंदी में जुटा है। चीन केवल हमारी सीमाओं को निगलने के लिए लालायित नहीं है। दक्षिण चीन सागर की सीमाओं के लिए वह वियतनाम तो पूर्वी चीन सागर के कुछ द्वीपों को लेकर निरंतर जापान के साथ टकराव की मुद्रा में है। नेपाल में चीन ने एक ऐसा वर्ग पोषित किया है जो घोर भारत विरोधी और चीनपरस्त है। चीन निर्मित सस्ते उत्पादों के कारण भारत का कुटीर उद्योग चौपट हो चुका है। दीपावली के अवसर पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और दीपक भी चीन से आयात हो रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन को अपना बाजार भारतीय उत्पादों के लिए खोलने को कहा है ताकि 'मेक इन इंडिया' के साथ 'मेड इन इंडिया' को भी बाजार उपलब्ध हो सके।
दोनों देशों के बीच सीमा विवाद दशकों पुराना है और इसका निदान निकालने की आवश्यकता है। भारत की दो हजार मील अंतरराष्ट्रीय सीमा चीन के साथ लगती है। आजादी से लेकर अब तक इस सीमा पर विवाद बरकरार है। चीन ने अक्साई चिन के 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर जहां अवैध कब्जा कर रखा है वहीं वह अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता। सन 2007 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश के एक प्रशासनिक अधिकारी को इसीलिए वीजा देने से मना कर दिया था। अरुणाचल प्रदेश के सन 2011 के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुनावी सभाओं का उसने कड़ा विरोध किया था। कश्मीर को वह विवादग्रस्त क्षेत्र मानता है। शिखर वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने इन सारे मामलों में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। इस नेतृत्व क्षमता की कमी देश लंबे समय से अनुभव कर रहा था। एक सुनियोजित रणनीति के तहत चीन थल और जल क्षेत्र में भारत के इर्द-गिर्द अपना साम्राच्यवादी शिकंजा बढ़ाता जा रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के बंदरगाहों में चीन ने अपने नौसैन्य अड्डे स्थापित कर रखे हैं। पाकिस्तान के ग्वादर में तैनात चीनी मिसाइलों की मारक क्षमता इतनी है कि मुंबई जैसे शहर उसकी जद में हैं।
भारत को भी चाहिए कि जिन सीमावर्ती प्रांतों में सड़क और रेलमागरें के विकास की उपेक्षा हुई है, उसे दूर कर देश की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। चीन ने भारतीय सीमाओं तक सड़क और रेलमागरें का जाल बिछा रखा है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के सुकार्दू और म्यांमार से सटे कुनमिंग जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक आधारभूत संरचनाओं का विकास कर चीन दक्षिण एशिया पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहता है। तिब्बत के राजमागरें को चौड़ा कर दो-लेन का बनाया गया है। 1962 में चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। अक्साई चिन और ल्हासा के बीच संपर्क मार्ग विकसित करने के साथ चीन ने तिब्बत के दूरगम्य क्षेत्रों तक भी सड़कों का विस्तार किया है। भारत सीमा से सटे अपने सैन्य और सामरिक महत्व के अड्डों तक चीन ने सुचारु आवागमन व परिवहन व्यवस्था विकसित कर ली है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का सीमा विवाद को लेकर चीन से दो टूक बात करना दृढ़ नेतृत्व क्षमता का ही परिचायक है।
[लेखक बलबीर पुंज, भाजपा के राच्यसभा सदस्य हैं]
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चीन से दोस्ती
Thu, 18 Sep 2014
चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा की जैसी भव्य शुरुआत अहमदाबाद में हुई उससे यह तो स्पष्ट हो रहा है कि दोनों देश नए सिरे से दोस्ती का दौर शुरू करने जा रहे हैं। जिस तरह चीन को भारत से तमाम उम्मीदें हैं उसी तरह भारत को भी उससे हैं। दरअसल दोनों देश एक दूसरे की जरूरत बन गए हैं और ऐसे में देखना यह है कि दोनों किस तरह मिलकर आगे बढ़ पाते हैं? इससे इन्कार नहीं कि चीन आर्थिक रूप से एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है और उसके मुकाबले भारत कुछ पीछे दिखाई देता है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि एशिया की दूसरी सबसे बड़ी ताकत के रूप में भारत को ही देखा जा रहा है। खुद चीन के साथ-साथ दुनिया के बड़े देश भी यह मान रहे हैं कि भारत में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभरने की प्रबल संभावनाएं हैं। यही कारण है कि दुनिया के सभी प्रमुख देश भारत की ओर निहार रहे हैं और उससे अपने संबंध मजबूत करना चाहते हैं। चीनी राष्ट्रपति एक ऐसे समय भारत आए हैं जब उसकी आर्थिक प्रगति की रफ्तार थमी है और उसे भारत में अपने लिए तमाम अवसर दिखाई दे रहे हैं। चीन अपनी तरक्की की रफ्तार बढ़ाने के लिए भारत में निवेश करने को तैयार है तो भारत को भी विदेशी पूंजी की आवश्यकता है। इस अनुकूल स्थिति के बावजूद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चीन भारत की चिंताओं को समझने के लिए तैयार नहीं दिखाई देता। चीन स्वयं तो भारत के पड़ोसी देशों में अपना आर्थिक प्रभुत्व बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है, लेकिन वह भारत को अपने पड़ोसी देशों में आर्थिक तौर पर सक्रिय होते हुए नहीं देखना चाहता और इसका ताजा प्रमाण है वियतनाम के साथ तेल संबंधी समझौते का विरोध।
भारत के लिए चिंता का एक मामला यह भी है कि चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कोई विशेष इच्छुक दिखाई नहीं देता। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जब चीनी राष्ट्रपति का भव्य स्वागत हो रहा है तब लद्दाख में सीमा विवाद को लेकर तनातनी की स्थिति बनी हुई है। ऐसी स्थिति जब तब उभरती ही रहती है और चीन के पास सदैव यही बहाना होता है कि सीमा का निर्धारण न होने से इस तरह के हालात पैदा होते हैं। चीन जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को नत्थी वीजा देने के मामले में भी अड़ियल रवैया अपनाए हुए है। विचित्र यह है कि वह यह तो चाहता है कि ताइवान और तिब्बत के मामले में भारत वही करे और कहे जैसा वह चाहता है, लेकिन उसे भारतीय हितों की कोई परवाह नहीं। शायद यही कारण है कि हाल की अपनी जापान यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री ने उसकी विस्तारवादी प्रवृत्तिका उल्लेख करने में संकोच नहीं किया। उम्मीद की जाती है कि आर्थिक संबंधों को बल देते समय भारतीय नेतृत्व यह सुनिश्चित करेगा कि चीन की ही न चलने पाए। मित्रता में लेन-देन भी होता है। अगर चीन कुछ मामलों में भारत से लचीले रवैये की अपेक्षा कर रहा है तो ऐसी ही अपेक्षा भारत को उससे भी है। बेहतर हो कि चीन यह समझे कि इस अपेक्षा की पूर्ति से ही दोनों देशों के रिश्तों को एक नई दिशा मिल सकती है।
[मुख्य संपादकीय]
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शी चिन फिंग भारत में
नवभारत टाइम्स | Sep 18, 2014
चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग का आज से शुरू हो रहा भारत दौरा बेहद अहम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आपसी संबंधों को लेकर संशय के बादल छटेंगे और रिश्तों का एक नया समीकरण बनेगा। हाल में लद्दाख स्थित भारत-चीन सीमा पर घटी कुछ घटनाओं को लेकर भारत में चीन के रुख को लेकर कुछ चिंताएं उभरी हैं। दूसरी तरफ जापान के साथ भारत के समझौतों और वहां दिए गए प्रधानमंत्री मोदी के एक बयान को लेकर चीन में भी कुछ सवाल उठाए गए। चीनियों में एक राय यह भी चल रही है कि भारत जाने-अनजाने चीन की अंतरराष्ट्रीय घेरेबंदी का औजार बन रहा है। पर मोदी और चिन फिंग दोनों जनभावनाओं की समझ रखने वाले सुलझे हुए राजनेता हैं, तमाम दुविधाओं के बीच से वे कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे। दरअसल दोनों नेता नेहरू और माओ के दौर में पैदा हुए तनावों को पीछे छोड़कर आज के समय के अनुरूप संबंधों का सूत्र तलाशना चाहते हैं। अभी की डिप्लोमेसी में आर्थिक तत्वों की भूमिका भूगोल से कहीं ज्यादा बड़ी है। कारोबारी लेनदेन बढ़ने से कूटनीतिक और राजनीतिक मसलों पर भी राह आसान होती है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि चीन के साथ व्यावसायिक संबंधों को इतना आगे ले जाया जाए कि सीमा विवाद रिश्तों की किताब में एक फुटनोट बनकर रह जाए। चीन को भारतीय बाजार की सख्त जरूरत है। यूरोप में मंदी गहराने से उसका एक बड़ा मार्केट कमजोर पड़ा है। इधर हमारे यहां पिछले दो वर्षों में चीनी माल की आवक कुछ कम हुई है। हालांकि ऐसा कागज पर ही है। चोरी-छुपे चीजें आ रही हैं और देसी लेबल लगाकर ऊंचे दामों में बिक रही हैं। चीन इस हालात को बदलना चाहेगा। हमारे लिए सबसे जरूरी है कि भारत में चीन का निवेश बढ़े। फिर एक क्रम में व्यापार संतुलन भी बदले और हमारा व्यापार घाटा खत्म हो। अभी चीन का निर्यात हमसे कहीं ज्यादा है। कुछ समय पहले मुंबई में चीन के महा वाणिज्य दूत (कोंसुल जनरल) ने कहा था कि चीन अगले पांच वर्षों में भारत में सौ अरब डॉलर तक का निवेश कर सकता है, जो जापान द्वारा प्रस्तावित 35 अरब डॉलर से काफी ज्यादा है। चिन फिंग की यात्रा में दोनों देशों के बीच 15 से ज्यादा समझौते होंगे। इनमें कर्नाटक में हाई स्पीड ट्रेन के लिए रेल नेटवर्क बिछाने के अलावा दो आधुनिक रेलवे स्टेशन बनाने का प्रोजेक्ट शामिल है। निजी कंपनियों में कुल 3.4 अरब डॉलर के दर्जनों करार होने की संभावना है। उद्योग मंत्रालय के साथ पंचवर्षीय समझौते और स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन पर करार भी मुमकिन है। एविएशन, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों में समझौता होने की चर्चा है। पूरी संभावना है कि दोनों देश आयात-निर्यात से जुड़े कायदे-कानून आसान करें। सीमा विवाद पर बहुत जल्दी कुछ होना संभव नहीं है, पर हमें अपना पक्ष संतुलित तरीके से रखना होगा। हो सकता है कोई ऐसा सूत्र मिल जाए जो दोनों के लिए सुविधाजनक हो।
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नाजुक रिश्तों की नई दिशा
Sat, 20 Sep 2014
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की महत्वपूर्ण भारत यात्रा के समग्र प्रभाव का विश्लेषण कर रहे हैं जबिन टी. जैकब
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का तीन दिवसीय भारत दौरा संपन्न होगा। इसे कई कारणों से खासी ख्याति मिली। हालांकि ठोस नतीजों की बात करें तो इससे कोई बहुत महत्वपूर्ण दिशा उभरती दिखाई नहीं दी। सालों से चीन ने जिन चीजों के लिए प्रसिद्धि हासिल की है वे हैं इसकी परियोजनाओं का वृहद आकार, तीव्र महत्वाकांक्षाएं और इन्हें पूरा करने की तेज रफ्तार। इन तमाम मुद्दों पर चीन के राष्ट्रपति का भारत दौरा खरा नहीं उतरता।
शी चिनफिंग और नरेंद्र मोदी, दोनों नेता अपने-अपने देश में मजबूत माने जाते हैं और इसलिए लंबे समय से लंबित सीमा विवाद का राजनीतिक हल निकालने की स्थिति में नजर आते हैं। हालांकि विश्लेषकों ने चीन के राष्ट्रपति की इस यात्रा के दौरान सीमा विवाद पर किसी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं की थी। हालांकि इस दौरे से आर्थिक मोर्चे पर बड़ी उम्मीदें थीं, क्योंकि यात्रा से पहले मुंबई में चीनी महावाणिज्य दूत ने चीन द्वारा भारत में सौ अरब डॉलर के निवेश की उम्मीद जताई थी।
ऐसे में केवल 20 अरब डॉलर के निवेश का वादा काफी निराशाजनक है। ऐसा क्यों हुआ? सबसे पहले तो चीनी दूत ने इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के आंकड़े को एक तय समयसीमा में नहीं बांधा था, बल्कि भविष्य में निवेश की बात कही थी। इसके अलावा, शी चिनफिंग की हालिया यात्रा में इस निवेश के होने की उम्मीद भी नहीं थी। किंतु इससे पहले हम निराशा में पूरी तरह डूब जाएं, आर्थिक प्रकृति के कुछ अन्य महत्वपूर्ण सवालों के जवाब ढूंढ़ना भी जरूरी है। क्या चीनी उद्योग जगत उतना ही मुनाफाखोर है जितना कि पश्चिमी। और आम धारणा के विपरीत वह कौन है जो कम्युनिस्ट पार्टी या चीनी सरकार के दुमछल्ले के तौर पर कार्य नहीं करता और जिसके पास अपनी मर्जी से फैसले की छूट है।
निश्चित ही चीन का उद्योग जगत जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार में कई तरह के प्रतिबंध हैं जो इतनी बड़ी राशि के निवेश की घोषणा की राह की बाधा हैं। इसी आलोक में देखा जाना चाहिए कि दो औद्योगिक पार्को की महत्वपूर्ण पहल गुजरात और महाराष्ट्र के पुणे में करने की घोषणा की गई है। ये दोनों क्षेत्र इंफ्रास्ट्रक्चरऔर मानव संसाधन क्षमताओं के नजरिये से उद्योग और निवेश के लिए उपयुक्त हैं।
दूसरे शब्दों में चीन भारत की केंद्र और राज्य सरकारों से नीतिगत समर्थन के बिना पूंजी और ढांचागत विकास के लिए भंडारा खोलने नहीं जा रहा है। वह यह भी देखना चाहता है कि इस प्रकार के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से उसे क्या हासिल होने जा रहा है। इस संदर्भ में केवल गुजरात और कुछ अन्य राज्यों का ही साफ-सुथरा रिकॉर्ड है। यही कारण है कि जापानी निवेश भी गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में होने की योजना है जहां पहले से ही ढांचागत विकास हो चुका है और जो निवेश के लिए बेहतर विकल्प हैं। देश के अन्य राज्यों को सुशासन, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक व आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। चाहे निवेश चीनी हो, जापानी हो या फिर किसी अन्य देश का, इन राज्यों को खुद को इसके लिए तैयार करना पड़ेगा। किंतु सवाल खड़ा होता है कि क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति में ताकतवर होने के अभिलाषी चीन ने अगर जापान से अधिक नहीं, तो कम से कम उसके बराबर के निवेश की घोषणा क्यों नहीं की?
निश्चित तौर पर उसके पास साधन हैं और वह चाहता तो ऐसा कर सकता था। भारत एक ऐसी जगह है जहां निवेश से क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव में बढ़ोतरी होती और यह चीन के लिए फायदेमंद होता। लगता है कि यहीं राजनीति बीच में आ गई। इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में, जिसकी अध्यक्षता भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने की थी, शी चिनफिंग ने कहा कि चीन दक्षिण एशिया में 30 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगले पांच साल में चीन का इरादा इस क्षेत्र में अपने व्यापार को बढ़ाकर 150 अरब डॉलर करने का है। दूसरे शब्दों में चीनी राष्ट्रपति ने संदेश दिया कि चीन की पूंजी उन्हीं देशों में जाएगी जहां के आर्थिक और राजनीतिक हालात चीनी हितों के अनुकूल होंगे।
दौरे की समाप्ति पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान पर गौर करें। अहमदाबाद में स्वागत-सत्कार में कोई कोर-कसर न छोड़ने वाले मोदी ने चुनार और देपसंग में हालिया घुसपैठ को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाई। चीन ने अपने राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान हालात को जटिल बनाने की कोशिश क्यों की? स्पष्ट है कि चीन भारत को संकेत दे रहा है कि चीनी प्रधानमंत्री ली कछ्यांग और राष्ट्रपति शी चिनफिंग की यात्रा पर ऐसी घुसपैठ की छाया रही जिसकी प्रकृति लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर घुसपैठ की सामान्य घटनाओं से अलग और विशिष्ट है। इन दलीलों में दम नहीं है कि चीनी नेतृत्व पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पर नियंत्रण में अक्षम है, जिस कारण इस तरह की घुसपैठ की घटनाएं हो रही हैं। इसका सीधा सा कारण यह है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की निष्ठा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से गहरे जुड़ी हुई है और इन दोनों के साझा हित हैं। इसलिए शी चिनफिंग को पता ही होगा कि चीनी सेना भारत में घुसपैठ करेगी।
तब इसका क्या संकेत है? अगर कुछ भारतीय विश्लेषकों की बात पर यकीन कर भी लें कि शी चिनफिंग की चीनी सेना पर पकड़ मजबूत नहीं है तो यह केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि चीन के तमाम पड़ोसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। या फिर चीन का पक्का विश्वास है कि भारत चीन की हरकतों की कड़ी प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं है या फिर इसके गंभीर दुष्परिणाम नहीं होंगे? या फिर उसके जेहन में यह है कि भारत को चीनी पूंजी की उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि चीन को विदेश में निवेश करने की? स्पष्ट है कि यह मसला जितना सरल दिखता है उतना ही जटिल है। यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने कड़ा बयान जारी किया, जो सीमा विवाद के शीघ्र निपटारे पर जोर देता है। ऐसा ही बयान शी ने भी आइसीडब्ल्यूए के कार्यक्रम में दिया था। उन्होंने लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को स्पष्ट करने पर जोर दिया था। मोदी ने चीन की वीजा नीति और दोनों देशों के बीच बहने वालीं नदियों के पानी के मुद्दे को भी उठाया। दूसरे शब्दों ने मोदी ने हर उस प्रमुख मुद्दे को उठाया जो दोनों पक्षों के बीच समस्या बना हुआ है और शी को इन मुद्दों से कन्नी काटने का मौका नहीं दिया। भारत अपने मुद्दों को और बेहतर ढंग व जोरदारी के साथ रख सकता था या फिर उसने इस यात्रा के दौरान कुछ गंवा दिया है, यह सवाल किसी और दिन के लिए।
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज, दिल्ली में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं)
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एक बार फिर भाई-भाई
नवभारत टाइम्स | Sep 19, 2014
भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व ने जिस तरह एक-दूसरे के प्रति विश्वास जताया है, वह एशिया ही नहीं पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत में कई जरूरी मुद्दे उठे और आपसी सहयोग पर सहमति बनी। इसमें बहुत सी चीजें अनसुलझी लगती हैं, पर यह समझ जरूर बनी है कि उन पर धीरे-धीरे बात करके कोई रास्ता ढूंढा जाएगा। चीन फिलहाल भारत में 20 अरब डॉलर का निवेश करने के लिए तैयार हुआ है। सिविल न्यूक्लियर मामले में सहयोग के लिए दोनों देश बातचीत करने पर सहमत हुए हैं। शिखर वार्ता में दोनों देशों के बीच 12 समझौते हुए, जिनमें पांच साल के आर्थिक प्लान पर हुआ करार बेहद अहम है। कैलाश यात्रा के लिए नए रूट, ऑडियो वीडियो मीडिया, रेलवे के आधुनिकीकरण, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में सहयोग को लेकर भी समझौता हुआ। कस्टम को आसान करने का करार हुआ है। मुंबई को शंघाई की तरह विकसित करने में चीन मदद करेगा और गुजरात तथा महाराष्ट्र में दो इंडस्ट्रियल पार्क बनाएगा। जाहिर है, भारत के तेज विकास और आधुनिकीकरण में चीन की भूमिका बढ़ने वाली है। निश्चय ही इसका लाभ चीनी इकॉनमी को भी मिलेगा। लेकिन देखना होगा कि स्थायी सिरदर्द का रूप ले चुके सीमा तनाव से आर्थिक सहयोग की विराट संभावना में कोई बाधा न आए। कारोबारी गतिविधियां तभी सुचारू रूप से चल पाती हैं जब दो मुल्कों के सियासी और कूटनीतिक रिश्ते बेहतर होते रहें। अभी जो भरोसा राजनयिक स्तर पर कायम हुआ है, वह दोनों देशों की जनता के बीच भी बनना चाहिए, तभी आर्थिक समझौतों का कोई मतलब है। इसके लिए दोतरफा सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ाना एक अच्छा रास्ता है। दुर्भाग्य से शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान ही जम्मू-कश्मीर के चुमार इलाके में चीनी सेना की घुसपैठ का मामला सामने आ गया। शिखर वार्ता में यह मसला भी उठा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सीमा पर शांति के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है। उन्होंने चीन से अपनी वीजा नीति पर भी स्टैंड साफ करने को कहा। यह मसला अरुणाचल प्रदेश और कश्मीर के लोगों को स्टेपल्ड वीजा दिए जाने को लेकर उठता रहा है। चीनी राष्ट्रपति का मानना है कि भारत-चीन की सीमा चिह्नित न होने के कारण वहां कुछ ऐसी गतिविधियां होती हैं जिससे गलतफहमी फैलती है। शी ने इस मुद्दे को सुलझाने का आश्वासन भी दिया है। दोनों देशों को यह बात समझनी होगी कि सीमा पर स्थायी शांति कायम करके ही आर्थिक रिश्तों को दूर तक ले जाया जा सकेगा। भारत के आम लोगों में जब तक चीन को लेकर पॉजिटिव राय नहीं बनेगी, तब तक उसका निवेश यहां अन्य देशों जितना सुरक्षित नहीं रह सकता। इसलिए आशा की जानी चाहिए कि इस दिशा में अलग से पहल होगी। अभी सीमावर्ती क्षेत्रों का टकराव सुलझाने के लिए फ्लैग मीटिंग का जो सिस्टम चल रहा है, उसे तत्काल फूलप्रूफ शक्ल देने की जरूरत है, लेकिन इसके लिए सैन्य नेतृत्व के बीच सीधे संवाद की व्यवस्था बनानी होगी।
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निवेश की कूटनीति
जनसत्ता 19 सितंबर, 2014: चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भारत आने से ऐन पहले कहा था कि दोनों देश आपसी संबंधों का नया अध्याय लिखना चाहते हैं। स्वाभाविक ही इससे काफी आस जगी। पर क्या यह कहा जा सकता है कि वे उम्मीदें पूरी हुर्इं? चीन से भारत के लोगों की उम्मीदें आर्थिक संबंध और प्रगाढ़ करने के साथ-साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और सीमा विवाद के संतोषजनक समाधान की भी रही हैं। जबकि चिनफिंग ने केवल भारत के बाजार में दिलचस्पी दिखाई और मोदी सरकार भी चीनी निवेश के लिए बेतरह लालायित दिखी। विचित्र है कि एक तरफ भारत में चीन से निवेश संबंधी समझौतों पर बातचीत और हस्ताक्षर हो रहे थे और दूसरी तरफ चीन के सैनिक लद्दाख के चुमार सेक्टर में घुसपैठ कर रहे थे। चीन की सैनिक टुकड़ी से पहले उसके कुछ नागरिक भी वहां घुस आए थे। चिनफिंग की यात्रा का पहला पड़ाव अमदाबाद रहा, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनका स्वागत करने पहुंचे। मोदी ने दोनों देशों के रिश्तों में बौद्ध प्रतीकों का स्मरण कराया, और उनके साथ चिनफिंग ने कुछ वक्त साबरमती आश्रम में भी बिताया। पर क्या वास्तव में बुद्ध और गांधी की कोई छाप कहीं दिखी? शिखर बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सीमा विवाद का मुद््दा भी उठा था और उन्होंने लद्दाख में चीन की तरफ से हुए ताजा अतिक्रमण पर भारत की चिंता जताई। पर चीन के रुख में बदलाव का कोई संकेत नहीं दिखता। चिनफिंग ने कहा कि विकास के लिए शांति जरूरी है, पर साथ में यह जोड़ा कि सीमा का निर्धारण अभी तक नहीं हुआ है। यह सही है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों के बीच दशकों से मतभेद हैं, पर क्या इतने अहम मौके पर भी चीन संयम नहीं बरत सकता? जिस समय भारत चिनफिंग के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए हुए था उसी समय सीमा पर तनाव की घटनाएं क्या यह संदेश देने के लिए थीं कि चीन को सिर्फ भारत के बाजार की फिक्र है। अमदाबाद में तीन और फिर दिल्ली में भी दोनों पक्षों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से ज्यादातर भारत में चीन के निवेश से संबंधित हैं। चिनफिंग ने अगले पांच साल में यहां बीस अरब डॉलर के निवेश का इरादा जताया है। चीन गुजरात और महाराष्ट्र में औद्योगिक पार्क बनाएगा। इसके अलावा रेलवे और विनिर्माण में भी चीन के पूंजी लगाने का रास्ता खुल गया है। दोनों देशों का सालाना व्यापार पचहत्तर अरब डॉलर तक पहुंच चुका है और इस वक्त चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। लेकिन आपसी व्यापार का पलड़ा चीन की तरफ काफी झुका हुआ है। इस असंतुलन को दूर करने के भारत के सुझावों को चीन लगातार अनसुना करता रहा है। इसलिए कई लोगों का मानना है कि अगर इस तरह का बाहरी निवेश भारत के लिए जरूरी ही है, तो जापान उसका बेहतर विकल्प हो सकता था। मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान चीन को चेताया था कि वह अपनी विस्तारवादी नीति से बाज आए। पर प्रधानमंत्री का पद संभालते ही उन्होंने कहा कि उनकी विदेश नीति में चीन सर्वोच्च प्राथमिकता रखता है। अपनी जापान यात्रा के दौरान उन्होंने चीन के विस्तारवाद की आलोचना की। साफ है कि चीन की बाबत उनके वक्तव्यों में निरंतरता नहीं रही है। फिर, सवाल है क्या चीन भी भारत को वैसी ही प्राथमिकता देता है? सीमा विवाद को वह इतिहास की देन कह कर टाल देता है। इसी तरह तिब्बत से निकलने वाली नदियों को लेकर भी उसका रवैया बेहद चिंताजनक रहा है। सिर्फ कैलास मानसरोवर के लिए एक और रास्ता खुलने से ये चिंताएं कम नहीं हो जातीं।
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शरारती रवैया
Sun, 21 Sep 2014
चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान और फिर उनके विदा हो जाने के बाद लद्दाख में चीनी सैनिकों की चहलकदमी चीन की शरारत और उसके अहंकारी रवैये का ही परिचायक है। यह विचित्र है कि चीन एक ओर तो अपने राष्ट्रपति की भारत यात्रा को ऐतिहासिक बता रहा है और दूसरी ओर सीमा पर अवांछित हरकतें भी कर रहा है। कूटनीतिक तौर पर इससे अधिक अशोभनीय और कुछ नहीं हो सकता कि अपने राष्ट्रपति की भारत यात्रा के समय चीन अपनी फौज को भारतीय सीमा में घुसाने का काम करे। लगता है कि चीन ने खुद के ताकतवर होने का कुछ ज्यादा ही दंभ पाल लिया है। चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत से इन्कार नहीं, लेकिन उसे खुद को एक जिम्मेदार देश के रूप में भी पेश करना आना चाहिए। वह जिस तरह भारत के साथ पेश आ रहा है उसी तरह अपने अन्य पड़ोसी देशों से भी। इसके चलते उसके प्रति दुनिया भर में अविश्वास उभर रहा है। यह अविश्वास उसे महंगा पड़ सकता है। चीन को यह अहसास होना चाहिए कि भारतीय सीमा पर उसके सैनिकों की ओर से जो खुराफात की जा रही है उससे भारत में उसके प्रति उमड़ी शुभेच्छा खत्म होने में देर नहीं लगेगी और अगर ऐसा होता है तो इसका बुरा असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ेगा।
यह ठीक है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने चीनी राष्ट्रपति से यह कहने में संकोच नहीं किया कि सीमा पर होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं संबंधों को खराब करने का काम कर सकती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि चीन को नए सिरे से यह बताने की जरूरत है कि अगर सीमा पर उसकी छेड़छाड़ जारी रही तो फिर उसके साथ आर्थिक-व्यापारिक सहयोग की संभावनाएं धूमिल पड़ सकती हैं। वैसे भी चीन के साथ आर्थिक-व्यापारिक क्षेत्र में वे तमाम समझौते नहीं हो सके जिनकी उम्मीद की जा रही थी और इसका कारण यही है कि उसकी ओर से पर्याप्त सकारात्मक संकेत ही नहीं दिए गए। चीन के राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में सीमा विवाद सुलझाने का आश्वासन अवश्य दिया, लेकिन अगर वह अपनी बात को लेकर तनिक भी गंभीर होते तो सीमा पर चीनी सैनिकों की ओर से वैसा कुछ नहीं किया जाता जो भारत को नागवार गुजरता। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि लद्दाख के चुमार क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के मामले को कूटनीतिक स्तर पर हल करने की कोशिश हो रही है, क्योंकि दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता के बाद ऐसी किसी समस्या की नौबत ही नहीं आने देनी चाहिए थी। चीन सरकार और वहां का मीडिया कुछ भी कहे, पिछले कुछ दिनों से लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिकों की हरकतों ने भारत के मन को खट्टा करने का ही काम किया है। अगर चीन की ओर से सीमा पर इस तरह की हरकतें जारी रहती हैं तो फिर भारत को इस पर विचार करना ही होगा कि उसके साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की दिशा में आगे बढ़ा जाए या नहीं? आर्थिक-व्यापारिक सहयोग के लिए दोनों देशों के बीच सकारात्मक माहौल आवश्यक है और चीन को यह समझना ही होगा कि सीमा पर उसके सैनिकों द्वारा जो कुछ किया जा रहा है उससे इस तरह का माहौल नहीं बनने वाला।
[मुख्य संपादकीय]
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गिलास आधा खाली नहीं, भरा है
Sun, 21 Sep 2014
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत यात्रा का अगर समग्र विश्लेषण किया जाए तो यह दौरा मिश्रित नतीजों वाला रहा है। सभी की निगाहें दोनों देशों की मीटिंग पर टिकी थीं, यह बात और है कि इस दौरान एक दूसरे की उम्मीदों और अपेक्षाओं को जिस चश्मे से देखा गया, वह कुछ अलग था। मोदी की जापान यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच संबंधों के नए युग के सूत्रपात और उनकी आगामी अमेरिकी यात्रा की छाया में कूटनीतिक जगत चीनियों की भारत के संबंध में नई रणनीति पर ध्यान केंद्रित किए हुए था। परंपरा से हटते हुए शी चिनफिंग के अहमदाबाद में भव्य स्वागत और नरेंद्र मोदी के साथ निजी और गर्मजोशी भरे संबंधों के विकसित होने से उन मिश्रित भावनाओं को बल मिला। मजबूती के साथ संबंधों का महत्व स्थापित हुआ। पिछले साल चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग और अब राष्ट्रपति चिनफिंग की यात्रा से निष्कर्ष निकलता है कि दोनों पक्ष अपने संबंधों को स्थिर रखते हुए लाभकारी दिशा में बढ़ने के इच्छुक हैं। कोई भी पक्ष नकारात्मक संदेश नहीं देना चाहता क्योंकि संघर्षरत भारत-चीनी संबंध एशियाई सदी की संभावनाओं को कुठाराघात पहुंचाता है और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और अर्थव्यवस्था के रूपांतरण का संतुलन बिगाड़ता है।
चुमार सेक्टर में चीनी सैनिकों की ताजा घुसपैठ से अपेक्षाओं का स्तर गिरा। हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि इसकी वजह से समझौते अपेक्षानुरूप नहीं हो सके। लेकिन कोई यदि मोदी-चिनफिंग संबंधों से इतर यदि ध्यान केंद्रित करे तो स्पष्ट रूप से पता चलता है कि विवादित सीमा और तिब्बती मसला मजबूत आर्थिक आधार बनाने के प्रयासों में अवरोध उत्पन्न करते हैं। सवाल उठता है कि क्या दोनों देश समानान्तर ट्रैक पर संबंधों को आगे बढ़ा सकते हैं। यानी कि 2003 से विवादित विषयों को सुलझाने के लिए निर्धारित फ्रेमवर्क पर बातचीत चल रही है और दूसरी तरफ आपसी समन्वय और सहयोग की भावना के साथ सहयोग के एजेंडे पर विकास और आधुनिकीकरण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा रहा है। उम्मीद यह थी कि चीन का भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश होगा लेकिन हमने मात्र 20 अरब पाया। इसे किस तरह देखा जाए? यह महत्वपूर्ण है कि हम निवेश संबंधी बातचीत को आर्थिक-व्यापारिक के साथ-साथ लागत-लाभ के दृष्टिकोण से देखें। बड़े निवेशों के साथ राजनीतिक संकेत या प्रतीक संबद्ध हो सकता है। इससे राजनीतिक लाभ लिया भी गया है लेकिन चिन्हित क्षेत्रों में निवेश के पूर्व अपनी तैयारियों का आकलन करना चाहिए। 20 अरब डॉलर की रकम काफी होती है और हमें इस रकम के उपयोग करने की क्षमता प्रदर्शित करनी होगी, वह भी तेज गति से। चीन से समय पर फंड जारी होंगे और तब प्रोजेक्टों के क्त्रियान्वयन में हमारी विश्वसनीयता व क्षमता की जांच होगी।
चीनी नेताओं के अब तक के सभी दौरे सीमा विवाद के साये में होते रहे हैं लेकिन इस बार धारणा यह है कि स्थिति वास्तव में चिंतनीय हैं। सामान्य भारतीयों के मन में यह सवाल है कि जब चीन भूटान को छोड़ सभी देशों के साथ सीमा विवाद को हल कर चुका है तो भारत के साथ समाधान निकालने में क्या इतनी बड़ी समस्या है? यह पहली बार नहीं है कि सीमा विवाद के आपसी संबंधों पर असर व संबंधित खबर के रूप-स्वरूप पर सवाल उठाये जा रहे हैं। इसमें तनिक ही संदेह है कि आधिकारिक स्थिति जिसमें अपरिभाषित वास्तविक नियंत्रण रेखा का दोनों ओर से अतिक्रमण तय है और दोनों देशों की सीमाओं को लेकर दावे का आम लोगों पर कोई असर पड़ने वाला है। फिलहाल समय की महत्वपूर्ण मांग यह है कि दोनों देश अपनी जनता को सीमा विवाद की प्रकृति से परिचित कराएं, अपने-अपने दावे को भी बताएं तथा 'लेन-देन' की भावना के तहत समस्या का हल करें। अच्छी बात है कि दोनों देशों ने सीमा विवाद के जल्द समाधान की जरूरत बतायी है और इस पर जोर दिया है कि यह सर्वाधिक अहम रणनीतिक उद्देश्य है।
यह देखना हार्दिक खुशी देता है कि दोनों देश अपने संबंधों को आकार देने के लिए ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा कर रहे हैं। जब एशिया के शक्तिशाली देश के साथ भारत की वार्ता हो रही है तो यह दिमाग में रखना आवश्यक होगा कि शी चिनफिंग के घरेलू मोर्चे पर कुछ विवशताएं भी हैं तो दूसरी ओर क्या उन्होंने दूसरे देशों से बातचीत में आउट ऑफ बॉक्स सोच प्रदर्शित की है। इस संबंध में काफी कुछ लिखा जा चुका है कि शी चिनफिंग चीन के शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे हैं। प्रचंड तानाशाही वाले देश की छवि के बावजूद बाजार में आए बदलाव ने चीनी समाज को भी परिवर्तित किया है। लिहाजा जटिलताएं उभरी हैं, असमानताएं बढ़ी हैं, समाज में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, गरीबी जारी है, प्रदूषण के मामले आ रहे हैं, कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ही भ्रष्टाचार पनपा है, प्रदेशों के नेतृत्व की अवज्ञा भी सामने आ रही है और सिविल सोसाइटी ग्रुप मुखर हुए हैं। चीन चौथी पीढ़ी (फोर्थ जेनरेशन) के आर्थिक सुधारों के मुहाने पर है। तिब्बत व जिनजियांग में अशांति व हिंसा से चिंताएं बढ़ी हैं। साफ है कि चीनी नेताओं के समक्ष घरेलू समस्याएं भी कम नहीं हैं लेकिन वह चीन का नेता नहीं हो सकता जो इन सबके बावजूद एशिया के लिए बड़े दृश्य व दृष्टिकोण को न प्रस्तुत कर सके। यह
वास्तव में रोचक व नयी सोच है कि ऐतिहासिक सिल्क रूट पर बात हो रही है। इसके लिए व्यापक फ्रेमवर्क तैयार करना होगा। भारत को अपने कार्यो को जिम्मेदारी पूर्वक करना होगा।
-अलका आचार्य [निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज, दिल्ली]
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नया दौर: दोस्ती की दरकार
Sun, 21 Sep 2014
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की यात्रा के दौरान भारत ने पलक पांवड़े बिछा दिए। दोनों देश नए दौर की दोस्ती की इबारत लिखने को बेकरार दिख रहे हैं। भले ही कुछ विशेषज्ञ चीन के इस रुख को भारत-जापान संबंधों पर श्रेष्ठता कायम करने के एक दांव के रूप में देख रहे हों, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि वैश्विक मंचों पर कई मुद्दों पर भारत और चीन के रुख एक से हैं। चाहे वह डब्ल्यूटीओ से जुड़े मसले हों, अंतरराष्ट्रीय वित्त प्रणाली में सुधार की बात हो, जलवायु परिवर्तन का मसला हो, सीरिया में हिंसा की बात हो। क्षेत्रीय स्तर पर दोनों ही देश क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं। आतंकवाद से जंग और अफगानिस्तान जैसे मसलों पर दोनों के एक से हित हैं।
आने वाले दिनों में दुनिया में एशिया की धमक के चलते चीन इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ है कि पश्चिमी देश और उसके दुश्मन देश भारत पर डोरे डाल सकते हैं। लिहाजा भारत का भरोसा हासिल करने को वह बेकरार दिखता है। भारत सहित दुनिया को वह यह दिखते हुए लगने चाहता है कि वह अपने पड़ोसी देश का स्वाभाविक मित्र बनने की ओर चल पड़ा है। भारत की स्थिति दूध से जली बिल्ली की तरह है जो छाछ को भी फूंक-फूंककर पी रही है।
पूर्व में मिले घाव और सीमा पर रह-रहकर होने वाली हलचल के चलते रहस्यमयी चीन के प्रति उसकी शंका जायज है। साथ ही उसे पता है कि क्षेत्रीय स्थिरता और तरक्की के लिए दोनों देशों का मिल जुलकर काम करना बहुत जरूरी है। ऐसे में इस यात्रा को लेकर दोनों देश न केवल गंभीर हैं बल्कि हिंदी चीनी भाई-भाई के नारे को और मजबूती देने को प्रतिबद्ध दिखते हैं। दोनों देशों की दोस्ती की इस प्रतिबद्धता के पीछे छिपी हिचक और हित की पड़ताल आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।
जनमत
क्या चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे से दोनों देशों के बीच भरोसे का पुल और मजबूत होगा?
हां 71 फीसद
नहीं 29 फीसद
क्या पश्चिमी देशों को पीछे छोड़ने के लिए दोनों एशियाई शक्तियों चीन-भारत का मिलकर काम करना वक्त की जरूरत है?
हां 12 फीसद
नहीं 88 फीसद
आपकी आवाज
पूरे विश्व की नजर अभी भारत और चीन के संबंधों पर टिकी है। अगर एशिया की ये दोनों महाशक्तियां साथ मिलकर काम करती है तो विश्व इतिहास में निश्चय ही नई नीतियों की इबारत लिखी जाएगी। -मधुराजकुमार
भारत में निवेश बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए हमें चीन का सहयोग लेना चाहिए। इससे दोनों देशों के बीच भागीदारी बढ़ेगी और भरोसे का पुल मजबूत होगा। परंतु चीन के विस्तारवादी रवैये को देखते हुए हमें सतर्क रहने की भी जरूरत है। -चंदन सिंह
चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान हुए वार्ता में आम मुद्दों पर चर्चा से दोनों देशों के बीच व्यापक और दोस्ती के संबंध में प्रगति होगी और गहनता बढ़ेगी। - मनीष श्रीवास्तव
चीन से नया और मजबूत संबंध बनाने के लिए मोदी सरकार ने अच्छा प्रयास किया है। चीन हमारी कई तरह से मदद कर सकता है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि चीन पहले की तरह विश्वासघात तो नहीं करेगा। -सुमनभट्टाचार्या1920@जीमेल.कॉम
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मनोवैज्ञानिक दबाव से उबरना होगा हमें
Sun, 21 Sep 2014
चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की भारत यात्रा के दौरान चीनी सैनिकों (पीएलए) की चुमार (लद्दाख) में भारी घुसपैठ के जरिये चीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हावी नहीं होने दिया। पहले दिन अहमदाबाद में जहां मोदी पूरे दिन छाए रहे लेकिन दिल्ली में नियंत्रित दिखे। यहां तक कि प्रेस वक्तव्य में भी मोदी ने सीमा के मसले को शुरू में ही उठाया और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्पष्टता की बात कही। हालांकि सीमा विवाद पर ज्यादा तवज्जो न देकर चिनफिंग ने भारत के पड़ोसियों को चीनी सामर्थ्य का संदेश दिया है। इससे बीजिंग को उसके महत्वाकांक्षी सिल्क रूट प्रोजेक्ट के लिए हिंद महासागर में तटीय देशों का पूर्ण समर्थन मिलेगा। इसके भविष्य में सैन्य निहितार्थ भी हैं।
दुर्भाग्य से भारत का कूटनीतिक तबका इस अनकहे संदेश को पकड़ नहीं सका और अपने दो विरोधियों चीन और पाकिस्तान के बीच भेद नहीं कर सका। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना की तरह ही पीएलए की अपनी अलग सत्ता है और वह चिनफिंग और अपने विदेश विभाग की बात नहीं सुनती। पश्चिमी देशों के बजाय चीन युद्ध या आक्रामकता को विफल कूटनीति का परिणाम नहीं मानता है। बीजिंग के लिए आक्रामकता सामरिक के बजाय मनोवैज्ञानिक विजय है। वह उसकी बातचीत के तौर-तरीके का अभिन्न हिस्सा है। चीन किसी भी स्तर पर कोई भी खास बातचीत को महत्वपूर्ण या निर्णायक घटना के रूप में नहीं मानता जोकि कोई नतीजा देगी या फेल हो जाएगी। उसके लिए बातचीत का मतलब विपक्षी को तनाव और परेशान कर देना है ताकि उपयुक्त मौका आने पर वह अपने आप ही चीनी पक्ष को मान ले। इसीलिए चीन कूटनीति में ऐतिहासिक और कभी-कभी भ्रामक दृष्टिकोण का इस्तेमाल तब तक करता है जब तक कि उसे मनोनुकूल नतीजे नहीं मिल जाते।
2012 में राष्ट्रपति शी चिनफिंग के अधीन चीनी नेतृत्व की पांचवीं पीढ़ी सत्तारूढ़ हुई तो वह अपने पूर्ववर्ती नेतृत्व से प्राप्त प्रचुर आर्थिक ताकत के उपयोग से अपने क्षेत्र को मजबूत और रणनीतिक सीमाओं का विस्तार करने के लिए विश्वस्त थी। इस बात की बानगी चिनफिंग के एक ही साथ देश के तीनों प्रमुख पदों-पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी, केंद्रीय सैन्य आयोग और सरकार के मुखिया के रूप में नियुक्ति के रूप में दिखाई दी। इसका मकसद चीन में एक से अधिक शक्ति केंद्र की संभावनाओं को खारिज करना था। यानी कि बीजिंग ने स्पष्ट रूप से तय कर लिया कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क की तुलना में वह एशिया में नेतृत्व की भूमिका में खड़ा है। पीएलए के निमंत्रण पर जुलाई, 2012 में मेरी बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी सेना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में केवल अमेरिका को लेकर ही मुखर रही। इससे यह भी संकेत निकला कि वह भारत को अपने प्रतिद्वंद्वी होने के लायक भी नहीं समझते।
इसकी पृष्ठभूमि में भारत को यह समझना चाहिए कि केवल सीमा विवाद सुलझाने या वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सहमत होने के बावजूद चीन एलएसी पर अपने दृष्टिकोण को उजागर नहीं करेगा। इसके जरिये चीन, भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करता रहेगा और उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव से युद्ध का भय दिखाता रहेगा जहां कोई भी बाहरी देश सहायता के लिए नहीं आएगा। चीन के खिलाफ अपनी सैन्य क्षमताओं के मामले में भारत अपने लोगों को गुमराह करता है। वास्तव में हमारे यहां के राजनेताओं, सैन्य अफसरों और वैज्ञानिक समुदाय के खोखले दावों को चीन समझता है।
पूर्व में दोनों देशों के सीमा विवाद को लेकर चीन के कदम से दिल्ली को समझना चाहिए कि यह चीन का नीतिगत मसला नहीं है। यह केवल रणनीतिक मसला है और इसका मकसद राजनीतिक-सैन्य प्रयासों के जरिये भारत के महाशक्ति के रूप में उभरने में बाधा पहुंचाना है।
-प्रवीण साहनी [संपादक, फोर्स न्यूज मैगजीन]
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दोस्ती और आशंका
:Fri, 19 Sep 2014
लद्दाख में चीन सीमा के निकट तनातनी की खबरों के साये में नई दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई शिखर वार्ता के बाद यह सामने आना संतोषजनक है कि भारत की सीमा में घुस आए चीनी सैनिक लौट गए। अगर ऐसा नहीं होता दोनों देशों के बीच आर्थिक-व्यापारिक सहयोग की तस्वीर कहीं अधिक धुंधली दिखती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति के साथ बातचीत में सीमा पर हो रही घुसपैठ का भी मामला उठाया, वीजा नीति पर सवाल उठाए और नियंत्रण रेखा को लेकर स्पष्टता की भी बात की। अच्छा होता कि चीनी राष्ट्रपति के भारत आगमन के दौरान सीमा पर कोई खटपट नहीं हुई होती, क्योंकि देश ही नहीं सारी दुनिया ने इस पर गौर किया कि जब दोनों देश दोस्ती बढ़ाने की बातें कर रहे हैं तब चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसे हुए हैं। यह अच्छी बात है कि चीनी राष्ट्रपति ने भारत से मित्रता मजबूत करने वाले कदम बढ़ाने के साथ यह भी आश्वासन दिया कि चीन शांति और सहयोग का पक्षधर है और उसकी आक्रामकता के बारे में जो भी धारणा बनी हुई है उसमें कहीं कोई सच्चाई नहीं है। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर चीन को कथनी और करनी के बीच के अंतर को समाप्त करना होगा, क्योंकि जिस तरह भारत के लिए चीन की आक्रामकता चिंता का विषय बनी हुई है उसी तरह अन्य पड़ोसी देश भी उसके विस्तारवादी रुख से सशंकित हैं।
यह अच्छा हुआ कि नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि के अनुरूप चीनी राष्ट्रपति के समक्ष भारतीय सीमा में घुसपैठ के साथ नत्थी वीजा के मामले को दो टूक ढंग से उठाया और यह कहने में संकोच नहीं किया कि नियंत्रण रेखा को लेकर स्पष्टता की आवश्यकता है। चीन ने इन मुद्दों पर ध्यान देने की बात कही है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि न तो नत्थी वीजा पर कोई ठोस आश्वासन मिला और न ही सीमा विवाद को सुलझाए जाने पर। सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अर्से से वार्ता का क्रम जारी है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही है और इसका प्रमुख कारण यही है कि चीन सीमा विवाद को सुलझाने के लिए अपेक्षित कदम आगे बढ़ाने से इन्कार कर रहा है। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि चीनी राष्ट्रपति को प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से यह संदेश दिया गया है कि अगर वह भारतीय चिंताओं को समझने और उनका समाधान करने में आनाकानी करता है तो उसके तरकश में भी तिब्बत और ताइवान सरीखे तीर हैं। यही नहीं अगर चीन के रवैये में बुनियादी बदलाव नहीं आता तो इससे कम से कम आर्थिक क्षेत्र में तो उसे ही नुकसान उठाना पड़ेगा, क्योंकि भारत अब ऐसी स्थिति में पहुंचता दिखाई दे रहा है जहां उसे अन्य देशों से निवेश हासिल करने में ज्यादा परेशानी नहीं आने वाली। यह स्वागत योग्य है कि चीन ने भारत की आर्थिक और व्यापारिक चिंताओं को न केवल समझा, बल्कि उनका समाधान करने का भरोसा भी दिया। बेहतर हो कि बीजिंग की ओर से इसी तरह का भरोसा उन मुद्दों के संदर्भ में भी दिलाया जाए जो भारत के लिए कहीं अधिक चिंता का विषय हैं और जिनके कारण दोनों देशों के बीच विश्वास का वातावरण कायम करने में परेशानी आ रही है।
[मुख्य संपादकीय]
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विदेश नीति बनाम व्यापार
के विक्रम राव
जनसत्ता 9 अक्तूबर, 2014: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अरुणाचल प्रदेश को भारतीय भू-भाग शी चिनफिंग से मनवा नहीं पाए। मुद्दा टल गया। शी ने सुझाया होगा कि वार्ता व्यापार पर केंद्रित रहे, भूगोल पर न बहके। लेकिन प्रधानमंत्री को राष्ट्र को जवाब देना चाहिए था कि किरण रिजिजू को सीमा-वार्ता से ही नहीं, चीन के दल की पूरी यात्रा से ही क्यों दूर रखा गया? केवल इसलिए कि वे अरुणाचल के सांसद हैं, जिसे विस्तारवादी चीन अपना उपनिवेश मानता है? रिजिजू केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हैं। अरुणाचल से भाजपाई सांसद हैं। इसीलिए यह शी को नागवार गुजरा। संकोची मोदी ने अरुणाचल मसला छेड़ कर छोड़ दिया, मुद््दा नहीं बनाया। वही नेहरू-इंदिरा वाली फितरत की मुसीबत कि पर्वत को चढ़ कर पार न कर पाओ तो उसके बगल से गुजर जाओ। टाल जाओ। चाउएन लाइ के सामने जवाहरलाल नेहरू इस पूर्वोत्तर प्रदेश के मामले में आत्मसंशय से ग्रस्त थे। दावा ढीला रखा। ली शियान्निन के सामने महाशक्तिशाली इंदिरा गांधी झिझकती रहीं, हू जिनताओ के सामने मनमोहन सिंह ठिठके रहे, और उसके पहले राजीव गांधी भी अपनी चीन यात्रा पर केवल रुपया-आना-पाई वाले व्यापार की चर्चा करते रहे।
सबसे कमजोर रहे अटल बिहारी वाजपेयी, जो जियांग जेमिन से मनुहार करते रहे सहयोग के लिए। 26 जून, 2003 को बेजिंग में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री को चीन ने शांति पुरुष के पुरस्कार से नवाजा था। उस समारोह के चंद घंटों पूर्व, अरुणाचल के नगर आसाफिला में चीन की सेना ने दस भारतीय जवानों को बंदी बना लिया था, क्योंकि वे अरुणाचल की सीमा के अंदर कथित घुसपैठ कर रहे थे। यह घटना अटलजी से उनके अमले ने गुप्त रखी, क्योंकि तब भारत-चीन व्यापार वार्ता में खटास पैदा हो जाती।
वही अटलजी मोदी के आदर्श हैं। शायद इसीलिए केवल दस किलोमीटर दूर चीन की सीमा पर इटानगर की चुनावी सभा (अप्रैल 2014) में गरजने वाले मोदी दिल्ली में शी चिनफिंग के समक्ष बरस नहीं पाए। मोदी तो बहुमत-प्राप्त दल की सरकार के नेता हैं, स्वभाव से दबंग हैं, अपनी जिद मनवाने में महारत रखते हैं, क्यों संकोची रहे? अरुणाचल का हृदय है तवांग, जिसके समीपस्थ भाग पर चीन का आधा कब्जा है। इस दस हजार फुट ऊंचे बौद्ध धर्मस्थल को नास्तिक चीन छीनना चाहता है। देंग शियाओ पेंग ने राजीव गांधी की 1988 में चीन यात्रा पर कहा था कि तवांग ही दे दें तो चीन संतुष्ट हो जाएगा। मनमोहन सिंह के राज में ही 30 अक्तूबर, 2007 को चीन की सेना ने तवांग की बौद्ध मूर्ति को तोड़ डाला था, क्योंकि भारतीय सेना ने उस मूर्ति को अन्यत्र हटा कर लगाने से इनकार कर दिया था। इसी संदर्भ में चीन की मांग थी कि अक्साई चिन को छोड़ कर भारत शेष लद््दाख को रख ले। अक्साई चिन क्षेत्र से चीन और पाकिस्तान का सड़क मार्ग है।
इसलिए प्रश्न उठता है कि अरुणाचल से दिल्ली के इन शासकों की ऐसी भी क्या बेरुखी है। पीछे चलें। स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों के दौर में। सन 1956 में अक्तूबर का ही महीना था जब भारतीय प्रतिनिधि बीएन चक्रवर्ती ने संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन में कम्युनिस्ट चीन को मान्यता और सदस्यता देने का फिर से आग्रह-भरा प्रस्ताव पेश किया था। हालांकि उसी तारीख की सुबह चीन की लाल सेना पूर्वोत्तर (अरुणाचल) प्रदेश के कई मील अंदर तक आ गई थी। भारत पर चीन हमला कर चुका था। उसी बैठक में युगांडा के प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे ने सुझाया था कि पहले चीन (अरुणाचल प्रदेश में) युद्ध-विराम घोषित करे, फिर उसकी सदस्यता पर चर्चा हो। मगर नेहरू सरकार के प्रतिनिधि ने भारत-मित्र ओबोटे का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। तब तक हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा पूरी तरह मंद नहीं पड़ा था।
आखिर अपने ही पूर्वोत्तर प्रदेश पर सार्वभौम अधिकार के लिए भारत का ऐसा कातर व्यवहार क्यों? गौर कीजिए इन तथ्यों पर। आम अरुणाचली अभिवादन में ‘जय हिंद’ कहता है। वहां कतिपय पड़ोसी प्रदेशों की भांति अलगाववादी आंदोलन कभी नहीं चले, वहां कारागार नहीं निर्मित हुए। पांच दशक पूर्व जब चीन ने हमला किया था तो अरुणाचली किसानों और गृहणियों ने भारतीय फौजियों को अन्न, आश्रय और सूचना मुहैया कराई थी। मोदी को अपनी कूटनीतिक व्यस्तता में शायद स्मरण नहीं रहा कि अरुणाचली सब बौद्ध होते हैं, जिनके इष्टदेव दलाई लामा को भारत में सम्मान दिया जाता है।
ऐसी संकल्प शक्ति का अभाव दशकों से भारत सरकार में दिखता है, जब बार-बार चीन अरुणाचल-वासियों को अपने यहां आने के लिए वीजा नहीं देता। चीन की जिद है कि अरुणाचल पर तो उसका दावा बनता है, इसलिए वहां के निवासियों को चीन जाने के लिए कैसा वीजा? भारत मूकदर्शक की भांति अपने ही स्वजनों और अपने ही भूभाग के प्रति चीन का यह व्यवहार देखता रहता है।
तब संयुक्त मोर्चा की गुजराल-देवगौड़ा की सरकार थी। उनकी विदेश राज्यमंत्री कमला सिन्हा ने राज्यसभा को बताया कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री गेगोंग अपांग को चीन ने वीजा देने से इनकार कर दिया। वामपंथी, विदेश नीति के माहिर इंद्रकुमार गुजराल दुरूहता को टाल गए।
दिसंबर 2007 में लगभग सौ-सदस्यीय आइएस अधिकारियों को चीन यात्रा रद््द करनी पड़ी, क्योंकि अरुणाचल के गणेश कोयू को चीन ने वीजा नहीं दिया। यहां इस तथ्य को भी स्मरण कर लें कि सत्रह वर्षों तक कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री अरुणाचल नहीं गया। पिछले वर्ष मनमोहन सिंह गए थे, क्योंकि भारत की जनता के इस सवाल का दबाव था कि क्या अरुणाचल प्रधानमंत्री के लिए वर्जित है। हालत आज ऐसी है कि लुम्ला से कांग्रेसी विधायक टीजी रिम्पोची ने अप्रैल 2008 में चीन की विस्तारवादी नीति के विरोध में जन-प्रर्दशन करना चाहा तो सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी।
भौगोलिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक तथ्यों के अलावा भी अरुणाचल को भारत का हिस्सा मानने का एक बड़ा तर्क है जिसे विश्व मानता है।अंतरराष्ट्रीय कानून भी स्वीकार करता है। महर्षि रिचीक के पौत्र, साधु जमदग्नि के पुत्र विप्र-शिरोमणि परशुराम का आश्रम अरुणाचल में है। बौद्ध स्तूप यहां सदियों पूर्व बने थे। कालिका पुराण के अनुसार ऋषि शांतनु और उनकी पत्नी अमोधा यहां आश्रम बना कर रहते थे। मास्य पुराण में अरुणाचल के मालिनीथान भूभाग की मिट्टी का विशद उल्लेख है। कालिका पुराण के अनुसार यहीं पार्वती ने कृष्ण को सत्यभामा से उनके विवाह पर फूल भेंट किए थे। कृष्ण ने पार्वती को मालिनी समझ कर इस भूभाग को मालिनी क्षेत्र कहा था।
प्रधानमंत्री मोदी ने चाणक्य का गहन अध्ययन किया है। कौटिल्य के अनुसार शठ चीन को शठता से ही जवाब देना चाहिए। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज चीन को सचेत कर चुकी हैं कि हम एक चीन की नीति का अनुसरण करते हैं जिसके तहत ताइवान और तिब्बत चीन के प्रदेश हैं, उसी पैमाने से चीन को भी एक भारत के सिद्धांत को दृढ़ता से मानना चाहिए। वरना मोदी ताइवान से मैत्री संबंध बढ़ा सकते हैं जैसा अमेरिका और कई राष्ट्रों ने किया है। उसी प्रकार तिब्बत के मानवाधिकार के मसले को भारत विश्व-मंचों पर उठाए, जैसे पाकिस्तान चीन की सांठगांठ से कश्मीर का प्रश्न उठाता रहता है। विदेश नीति राष्ट्र-हित पर आधारित होती है, परंपरा की बेड़ियों से जकड़ी नहीं रहती। लिहाजा, भारत ताइवान के नागरिकों को अलग से मान्यता दे और वहां अपना दूतावास बनाए। मगर ऐसा निर्णय करना कलेजेवाली बात हो जाती। शौर्य भरा कदम होता।
एक तात्कालिक नीति मोदी अपना सकते हैं। उइगर मुसलमानों पर चीन की हुकूमत सितम ढा रही है। इस्लामी पाकिस्तान की चीन से यारी है, इसलिए वह खामोशी बनाए हुए है। मगर सेक्युलर भारत को तो इन मजलूमों के लिए दुनिया में आवाज बुलंद करनी चाहिए। आखिर चीन की केंद्रीय सरकार से इन उइगर मुसलमानों ने मांगा क्या था? बस वे अधिकार, जिनका भारत में हर मुसलमान दशकों से निर्बाध रूप से उपभोग कर रहा है।
उइगर लोग चाहते हैं कि उन्हें जुम्मे की नमाज मस्जिदों में अता करने दी जाए, वजू करने के लिए नल का पानी वहां पर मिले। हज यात्रियों की संख्या में की गई कटौती खत्म हो। पचास वर्ष से कम आयु वालों को हज पर जाने की इजाजत वापस दी जाय, अठारह वर्ष से कम उम्र वालों को मस्जिद प्रवेश की अनुमति दी जाय। उनकी मातृभाषा तुर्की को सीखने पर लगी पाबंदी हटा ली जाय और उन पर मंडारिन भाषा न लादी जाय।
उइगर साहित्य को अरबी लिपि में ही रहने दिया जाय, मजहबी किताबों की बिक्री पर से पाबंदी हटाई जाय, पाक कुरान का सरकारी संस्करण न थोपा जाय, मदरसे के सील खोल दिए जाएं, पुनर्शिक्षित करने के नाम पर बंदी शिविरों में अकीदतमंदों को जबरन नास्तिक न बनाया जाय। सरकारी दफ्तरों में नमाज पढ़ने के लिए अल्पावकाश का प्रावधान किया जाय। उनकी रिहाइशी बस्तियों में घेंटी का गोश्त न बेचा जाय। उनके अपने रोजगार में बहुसंख्यक हान वर्ण के चीनीजन को वरीयता न दी जाय। उनकी ऐतिहासिक राजधानी काशगर में विश्व धरोहर करार दी गर्इं इमारतें ध्वस्त कर आवासीय कॉलोनी और शॉपिंग मॉल न बनाए जाएं।
मोदी सरकार से इसी सिलसिले में सवाल पूछा जाए कि शी चिनफिंग से अरुणाचल को भारतीय कहने में हिचके क्यों? यहां लोकसभा की बहस के एक अंश की याद दिलाना प्रासंगिक होगा। तब (1956) रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने कहा था कि जिस सीमावर्ती क्षेत्र पर चीन ने कब्जा किया है वह बंजर है। वहां घास भी नहीं उगती। तब देहरादून के कांगे्रसी सांसद महावीर त्यागी ने पूछा कि ‘मेरी गंजी खोपड़ी पर भी कुछ नहीं उगता है। तो उसे भी चीन को दे देंगे?’ तब नेहरू केवल मुस्कराए थे। आज लॉर्ड कर्जन की 1903 में कही बात याद कर लें, ‘‘हिमालय आज भारत की रक्षा करता है। वक्त आएगा कि भारत को हिमालय को बचाना होगा।’’ सरदार पटेल, फिर बाद में लोहिया ने बहुत पहले इसे दुहराया था। नेहरू सरकार मूक रही। आज यह सब उसी का परिणाम है।
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