Friday, 24 October 2014

जापान




सहयोग का सफर

जनसत्ता 4 सितंबर, 2014: भारत ने पूरब की ओर देखो की नीति काफी पहले घोषित की थी, पर इस दिशा में उसने कदम देर से उठाए। आसियान से कारोबारी रिश्ते बढ़े। फिर अब जापान से संबंध प्रगाढ़ करने की कोशिशों से इस नीति ने मूर्त रूप ग्रहण किया है। यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू में चीन को अपनी विदेश नीति में सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही थी। पर कूटनीति में ऐसी टिप्पणी कई बार अवसरोचित या औपचारिक होती है। गौर करने की बात यह है कि द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से, भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर, जापान उनका पहला गंतव्य बना। जापान का मोदी का पांच दिन का दौरा जहां व्यावसायिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण साबित हुआ वहीं इसकी सांस्कृतिक रंगत को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। मोदी पहले जापान के प्राचीन शहर क्योतो गए, जो अपने बौद्ध स्मारकों और मंदिरों के लिए जाना जाता है। भारत में अनेक बौद्ध तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार जापान की मदद से ही हुआ है। संयोग से इसी समय अतीत की स्मृतियों को ताजा करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरू हुई, जहां जापान से खासा अनुदान मिला है। मोदी ऐसे समय जापान गए जब उनकी सरकार के सौ दिन पूरे होने वाले थे। इस वक्त भारत की आर्थिक वृद्धि की बाबत आए आंकड़ों ने जापानी निवेशकों से उनके संवाद के लिए उपयुक्त माहौल बनाने में मदद की। जापान के कारोबारी समुदाय को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि वे भारत में निवेश करने में कतई न हिचकें, यहां उनका तहेदिल से स्वागत है, निवेश और व्यापार की राह में बाधा बनने वाले नियम-कानून बदले गए हैं, लालफीताशाही पर रोक लगी है। जापान को निवेश का न्योता खास मायने रखता है, क्योंकि वह प्रौद्योगिकी में अव्वल रहा है और आधारभूत संरचना के निर्माण में उसका सानी नहीं है। दिल्ली मेट्रो की परियोजना जापान की मदद से ही संभव हुई। भारत के कई अन्य शहरों में भी मेट्रो रेल परियोजनाओं में जापान से सहायता मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा स्मार्ट शहरों की मोदी सरकार की योजना में भी जापान अहम भूमिका निभा सकता है। आर्थिक संबंध मजबूत करने के मोदी के आह्वान पर मेजबान ने निराश किया। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे ने अगले पांच साल में भारत में पैंतीस अरब डॉलर के निवेश का भरोसा दिलाया है, जिसमें सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों की भागीदारी होगी। लेकिन एबे और जापान के व्यावसायिक प्रतिनिधियों से मोदी के उत्साहजनक संवाद के बावजूद कर-ढांचे और पेशेवरों के लिए वीजा-नियमों आदि से जुड़े कई मामले ऐसे हैं जिनमें दोनों तरफ से शिकवा-शिकायतें फिलहाल कायम हैं। यूपीए सरकार के समय से ही जापान से असैन्य परमाणु करार की कोशिशें होती रही हैं, पर अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं। इसलिए कि जिस देश ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न किए हों उससे कोई एटमी करार न करने की जापान की नीति रही है। यही अड़चन इस बार भी सामने आई, बावजूद इसके कि मोदी ने विश्व शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दुहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अपनी जापान यात्रा के दौरान मोदी ने बगैर चीन का नाम लिए उसके विस्तारवाद पर अंगुली उठाई। जापान को उनकी यह टिप्पणी रास आई होगी, क्योंकि सेनकाकू द्वीपसमूह को लेकर उसका चीन से विवाद चल रहा है। पर चीन को जरूर बुरा लगा होगा। कई लोगों ने मोदी के इस बयान को चीन के खिलाफ भारत और जापान के रणनीतिक गठजोड़ का संकेत माना है। पर यह शायद अतिरंजित अनुमान है। भारत का विदेश व्यापार सबसे ज्यादा चीन से है और इस तथ्य को नजरअंदाज कर भारत कोई शक्ति संतुलन नहीं बिठाना चाहेगा।
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जापान से रिश्ते में नई जान

bhaskar news|Sep 04, 2014,

नरेंद्र मोदी के इस वक्तव्य से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है कि उनकी जापान यात्रा सफल रही। पूंजी और तकनीक से भरपूर इस देश को जो संदेश देने भारतीय प्रधानमंत्री गए थे, उसका उल्लेख उन्होंने अपने सफर के आखिरी चरण में किया। कहा कि भारत में अब दौर ‘लालफीताशाही’ का नहीं है, बल्कि निवेशकों के स्वागत में वहां ‘लाल कालीन बिछा हुआ है।’ फिर अपनी प्रिय अनुप्रास शैली में तीन ‘डी’ के साथ भारत की ताकत बताई। डेमोक्रेसी (लोकतंत्र), डेमोग्राफी (जनसंख्या) और डिमांड (मांग) की चर्चा कर उन्होंने भारत में अपेक्षित चिर-स्थायी स्थिरता, बड़े बाजार और बढ़ते उपभोग से जापानी उद्योग जगत को परिचित कराने का प्रयास किया। मोदी ने कहा कि जापानी कंपनियां सिर्फ भारतीय बाजार पर अपने कारोबार को केंद्रित करें, तो वे मुनाफा कई गुना बढ़ा सकती हैं। स्पष्टतः यह सुविचारित संदेश है। मोदी से आधिकारिक वार्ता के दौरान जापानी प्रधानमंत्री शिन्जो आबे ने भारत में 34 अरब डॉलर के निवेश का जो संकल्प जताया, वह तभी साकार हो सकेगा, जब मुनाफे का गणित जापानियों को अपने पक्ष में झुका दिखे। दूसरी तरफ भारत में बुनियादी ढांचे, उत्पादन प्रणालियों और आम कारोबार के आधुनिकीकरण के लिए जापानी धन एवं विशेषज्ञता की आवश्यकता है। मोदी का मकसद इन दोनों इच्छाओं के बीच पुल बनाना था। कहा जा सकता है कि इसकी नींव डालने में वे कामयाब रहे। हालांकि, ठोस उपलब्धि हासिल होने की राह में अभी भी रुकावटें हैं। असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता मोदी की इस भावपूर्ण यात्रा के दौरान नहीं हो सका। न ही दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी करार की समीक्षा हो पाई। 2011 में हुए इस समझौते के बाद जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़ा है। दूसरी तरफ भारत के जेनरिक दवा उद्योग की जापानी बाजार में आसानी से पहुंचने की अपेक्षाएं भी उपरोक्त समझौते की समीक्षा पर टिकी हैं। बहरहाल, मोदी और आबे के बीच बने संवाद और सद्‌भाव को देखते हुए यह उम्मीद बेबुनियाद नहीं है कि जल्द ही परमाणु एवं कारोबारी रिश्तों के बीच की पेचीदगियां भी दूर होंगी। फिलहाल, यह महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने दोनों देशों के राजनयिक व आर्थिक रिश्तों में उत्साह एवं आशा का नया संचार कर दिया है। 
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माहौल बदलने का मौका

Sun, 07 Sep 2014 

जापान में अपने समकक्ष शिंजो एबी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रिश्तों का समीकरण कायम करके वहां अपनी असाधारण उपस्थिति दर्ज कराई। मोदी ने मेजबान देश जापान को ड्रम बजाने की अपनी क्षमता से भी अभिभूत किया तो वहां के छात्रों को बांसुरी वादन से खुश कर दिया। मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान वहां के एक प्राथमिक स्कूल में बच्चों के साथ भारतीय पौराणिक कहानियों को साझा किया। उन्होंने भारत पर विश्वास करने के लिए जापान की खुलकर तारीफ की और जापान के सम्राट को गीता की एक प्रति भेंट करते हुए कहा कि उनके पास देने के लिए इससे अधिक कीमती और कोई चीज नहीं और दुनिया इससे अधिक कीमती चीज पा भी नहीं सकती। चीन का नाम लिए बिना उसे फटकार लगाते हुए उन्होंने कहा कि कुछ देश अभी भी 18वीं शताब्दी के विचारों में जी रहे हैं और कभी वे किसी की सीमाओं का अतिक्त्रमण कर जाते हैं तो कभी समुद्र में घुस जाते हैं।
जापान ने मोदी का भरपूर स्वागत किया। मई में प्रधानमंत्री बनने के बाद इस उपमहाद्वीप के बाहर मोदी की यह पहली द्विपक्षीय वार्ता थी। 30 अगस्त को जब मोदी क्योटो पहुंचे तो स्वयं एबी ने उनकी अगवानी की। इस मौके पर एबी ने भारत के साथ जापान के संबंधों के महत्व पर कहा कि दोनों देशों के रिश्ते दुनिया में किसी भी अन्य साझेदारी की तुलना में अधिक उपयोगी हैं। अपनी इच्छा जताते हुए उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह भारत के साथ विशेष रणनीतिक और वैश्रि्वक सहभागिता वाला रिश्ता चाहते हैं। हालांकि भारत और जापान नागरिक परमाणु सहयोग को लेकर किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहे। यदि यह समझौता होता तो भारत अपने परमाणु ऊर्जा स्टेशनों के लिए जापानी तकनीक हासिल कर पाता। जापान ने आगामी पांच वषरें में भारत में निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में 35 अरब डॉलर निवेश की योजना बनाई है। मोदी की यात्रा के दौरान भारत और जापान ने 5 समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें रक्षा क्षेत्र में आदान-प्रदान और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग, सड़क और राजमार्ग एवं स्वास्थ्य शामिल है। जापान ने छह भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध हटाने की घोषणा की, जिनमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड भी है। इन कंपनियों पर 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद प्रतिबंध लगाए गए थे। इस यात्रा के दौरान मोदी ने जापानी निवेश को आमंत्रित किया और भारत को मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का केंद्र बनाने का आह्वान किया। टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज को संबोधित करते हुए मोदी ने जापानी निवेशकों को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत में अब रेड टेप यानी लाल फीताशाही नहीं, बल्कि रेड कार्पेट आपका इंतजार कर रहा है। इसी तरह क्योटो में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके मुताबिक जापान मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी का विकास क्योटो स्मार्ट सिटी की तर्ज पर करेगा। मोदी की जापान यात्रा से निश्चित ही द्विपक्षीय संबंधों में नई ऊर्जा और उत्साह आया है। हालांकि दिल्ली-टोक्यो संबंध पिछले कुछ वषरें में धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे हैं। दोनों देशों के बीच अति महत्वपूर्ण द्विपक्षीय सहभागी रिश्ता कुछ समय पूर्व ही गति पकड़ सका है। पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच नागरिक परमाणु ऊर्जा सहयोग पर चर्चा रुकी हुई है। अपने परमाणु ऊर्जा समर्थक एजेंडे के साथ शिंजो एबी सत्ता में आए तो इस मुद्दे पर समझौते को लेकर पहल की शुरुआत हुई।
वर्तमान में एशियाई सामरिक परिदृश्य में चीन का उभार सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्त्रम है। इस संदर्भ में भारत और जापान, दोनों का ही मानना है कि चीन क्षेत्रीय और वैश्रि्वक समस्याओं के समाधान में व्यापक रचनात्मक भूमिका निभाए, न कि स्वयं एक समस्या बने। चीन के आक्रामक कूटनीतिक और सैनिक रुख को लेकर दोनों ही देश अपनी चिंताएं जताते रहे हैं। चीन के अपने पड़ोसियों के साथ कूटनीतिक और सैनिक विवाद ने जापान और भारत को साथ आने में मदद की है। हालांकि टोक्यो और नई दिल्ली व्यापक पारदर्शिता के पक्ष में हैं और बीजिंग को लेकर चिंतित हैं। यह समय की आवश्यकता है कि दोनों देश एक दूसरे की अपेक्षाओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनें।
शिंजो एबी भारत-जापान संबंधों के भविष्य को लेकर सर्वाधिक उत्साहित हैं और वह इसे एक नया आयाम देना चाहते हैं। 2007 में भारतीय संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते समय एबी ने भारत और जापान के संदर्भ में प्रशांत और भारतीय महासागर को लेकर एक अधिक विशाल एशिया की बात की थी। भारत, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका आधारभूत मानवाधिकार के लिए स्वतंत्रता और परस्पर सम्मान के रूप में समान लोकतांत्रिक मूल्य साझा करते हैं। उन्होंने इन देशों के बीच अधिक सहयोग की बात कही। अपनी पुस्तक टुअ‌र्ड्स ए ब्यूटीफुल कंट्री में शिंजो एबी ने बताया है कि भारत के साथ अपने संबंधों को मजबूत करके जापान किस तरह अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा सकता है। उन्होंने कहा है कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि आगामी दशक में जापान-भारत संबंध जापान-अमेरिका संबंधों से आगे निकल जाएं। उनके पूर्ववर्ती ने वाशिंगटन, टोक्यो और कैनबरा को लेकर एक त्रिकोणीय सुरक्षा वार्ता के विचार को मजबूत करने की बात कही थी, लेकिन शिंजो एबी ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया और भारत के साथ चारपक्षीय सामरिक अथवा रणनीतिक वार्ता की इच्छा व्यक्त की है। अपने इस फ्रेमवर्क के तहत उन्होंने वैश्रि्वक मूल्यों जैसे स्वतंत्रता, लोकतंत्र, मानवाधिकार और कानून के शासन पर जोर दिया है। 2012 में पद संभालने के बाद शिंजो एबी ने एक बार फिर से न केवल अमेरिका के साथ जापान के ऐतिहासिक गठजोड़ को मजबूत करने पर जोर दिया, बल्कि भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंधों को और अधिक मजबूत बनाने की इच्छा जताई है।
मोदी सरकार के नेतृत्व में नई दिल्ली के पास टोक्यो के साथ अपने संबंधों को एक नया आयाम देने का मौका है। निर्णायक जनादेश वाली दिल्ली की नई सरकार को पुराने कठिन मसलों का समाधान निकालना ही होगा। भारत और जापान के लिए यह बिल्कुल सही समय है जब एशिया-प्रशांत परिक्षेत्र में सामरिक और रणनीतिक परिदृश्य को परिवर्तित करने के लिए नए सिरे से कदम उठाए जाएं और अवसर को लाभ में बदला जाए। इसे यदि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबी के शब्दों में कहें तो एक मजबूत भारत जापान के लिए सबसे अधिक अनुकूल अथवा उसके हित में है। इसी तरह एक मजबूत जापान भारत के अपने हित में सर्वाधिक अनुकूल बात है। इस संदर्भ में मोदी ने कहा भी है कि जापान के बिना भारत और भारत के बिना जापान अधूरा है। उन्होंने कहा कि जापान के पास हार्डवेयर है और भारत के पास सॉफ्टवेयर, इस तरह हम दोनों मिलकर चमत्कार कर सकते हैं। इसलिए वर्तमान में संबंधों को मजबूत न बनाने के लिए कोई बहाना नहीं है, विशेषकर तब जब तेजी से आगे बढ़ रहा चीन बड़ी एशियाई शक्ति के रूप में जापान और भारत के लिए चुनौती पेश कर रहा है।
[लेखक हर्ष वी. पंत, अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हैं]
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जापान से कार्यसंस्कृति भी सीखें

Thu, 18 Sep 2014

भारत की नई सरकार से जितनी अधिक अपेक्षाएं इस बार की जा रही हैं, उतनी पहले कभी किसी सरकार से नहीं की गईं। सरकार की नीतियों से आमजनों को लाभ हो रहा है। शौचालयों के निर्माण पर जोर, स्वसत्यापित हलफनामे की स्वीकृति और जन-धन योजना चर्चा में हैं। प्रधानमंत्री का सार्क राष्ट्राध्यक्षों को बुलाना, उनकी भूटान और नेपाल की सफल यात्राएं और ब्रिक्स में भारत की बढ़ती भूमिका से वैश्रि्वक जगत में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ी है। मोदी की जापान यात्रा भी सफल रही। उन्होंने जापानियों का दिल जीत लिया। जापान ने भारत में भारी निवेश का वादा किया है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और युवाओं को रोजगार मिलने के साथ ही संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे।
करीब बीस वर्ष पहले जापान के दौरे में मन में एक प्रश्न उभरा था कि द्वितीय विश्व युद्ध में बुरी तरह अपमानित और पराजित ध्वस्त जापान विश्व में फिर से अपना सम्मानजनक स्थान कैसे बना सका? जो उत्तार मिला उसका सार यही था कि अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने से पहले हर जापानी बच्चा एक बार हिरोशिमा जाता है। वहां का स्मारक देखता है। इससे उन्हें अहसास हो जाता है कि उनका देश तथा देशवासी कितने भयानक दौर से गुजरे हैं। उन्हें यह भी बताया जाता है कि वे भी आगे चलकर सबसे पहले राष्ट्र निर्माण में योगदान करें। काम कोई भी हो, उसे यह मानकर करें कि वह बड़े तंत्र का ऐसा पुर्जा है, जिसके कमजोर होने पर सारा तंत्र ठप हो सकता है। इसलिए कार्य निष्पादन में जापान में कोई कोताही नहीं की जाती। मुझे बताया गया कि समय पालन का इस देश में बहुत सम्मान किया जाता है। यदि कोई अध्यापक कक्षा में दस मिनट देर से आता है और 50 बच्चे उसकी प्रतीक्षा करते हैं तो अध्यापक को स्वयं ही ग्लानि होती है कि उसने राष्ट्र की प्रगति में से 500 मिनट की चोरी कर ली। इसी सोच के कारण जापान में रेलगाड़ियों के समय से चलने की पूरी दुनिया में चर्चा होती है। भारत में भी आपातकाल में रेलगाड़ियों ने समय पालन के नए आयाम सामने रखे थे। आपातकाल हटा और हमारी रेलगाड़ियां फिर से पुराने ढर्रे पर आ गईं। लोग वही थे, क्षमता भी वही थी मगर उत्तारदायी लोगों में राष्ट्र के प्रति निष्ठा, अपने काम के महत्व का अहसास तथा मुसाफिरों को सुख देने का जच्बा उतना विकसित नहीं है, जितना जापानी अपने बच्चों के मन में प्रारंभ से ही बैठा देते हैं। यही बच्चे आगे जब रेलवे प्रशासन या अन्य कोई कार्य संभालते हैं तो समय पालन का विशेष ध्यान रखते हैं। जापानी रेलों के देरी से आने का औसत केवल सात सेकंड है। यही कार्यसंस्कृति कारखानों, सरकारी दफ्तरों तथा अन्य सेवाओं में भी देखने को मिलती है। प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के भाषण में जब कहा कि यदि आप बारह घंटे काम करेंगे तो मैं तेरह घंटे काम करूंगा' तो वह भारतीय कार्यसंस्कृति को लेकर ही अपनी चिंता प्रकट कर रहे थे। इसी तरह अध्यापक दिवस के अवसर पर जब बच्चों की देशव्यापी क्लास में उन्होंने कहा कि 'मैं हेडमास्टर तो नहीं, मगर टास्क मास्टर जरूर हूं।' उनके इन दोनों वाक्यों का प्रभाव देशवासियों पर अवश्य पड़ेगा।
एक दूसरा पक्ष निराशा का कारण बनता है। यहां जन-धन योजना में खाता खोलना आसान नहीं है। कुछ बैंक कर्मचारी इसे नई मुसीबत मान रहे हैं। हजारों की संख्या में अन्य प्रांतों से आए श्रमिकों तथा कामगारों को कहा जा रहा है कि जहां का वोटर आइडी कार्ड है वहीं जाकर खाता खोलो, फॉर्म नहीं है, अगले हफ्ते आना, रेजीडेंस पू्रफ लाओ, जाति प्रमाणपत्र लाओ इत्यादि। इस वर्ग को वोटर आइडी कार्ड या आधार कार्ड बनवाने में भी अनेक कठिनाइयां झेलनी पड़ती हैं। इनकी मदद करना बैंकों की कार्यसंस्कृति का हिस्सा अभी तक नहीं बन पाया है। आशा करनी चािहए कि भविष्य में इसका समाधान ढूंढ़ लिया जाएगा। स्वच्छता को लेकर जो देशव्यापी विमर्श चल रहा है उसके मद्देनजर शौचालयों के निर्माण के क्रियान्वयन को विस्तृत पटल पर देखना होगा। ऐसा कौन-सा शहर या मोहल्ला है जहां कूड़े के ढेर न हों? मुंबई की मेयर को लालबत्ताी की गाड़ी चाहिए, क्योंकि उन्हें महत्वपूर्ण लोगों की आगवानी करनी होती है। मगर उन्हें इसकी चिंता नहीं है कि वर्षा के समय पूरा शहर जलमग्न हो जाता है, क्योंकि पानी के निकास के रास्ते बंद हैं। ऐसा संबंधित विभाग की अक्षमता तथा कामचोरी के कारण होता है। आज कश्मीर में जो आपदा आई वह कूड़े, अतिक्रमण तथा भ्रष्टाचार का मानव आमंत्रित प्राकृतिक आक्रोश है। यही उत्ताराखंड में हुआ था। मेरा देश तो तभी सराहा जाएगा जब मेरा गांव, मेरा शहर गंदगी तथा कचरे से मुक्त होगा। यहां स्वच्छता की संस्कृति भी आमजन में तभी फैलेगी जब जन-शिक्षा उन्हें इसकी आवश्यकता बताएगी। इसकी शुरुआत हमें स्कूलों से करनी होगी। एक तरफ जापान है जहां पहले आधे घंटे तक अध्यापक तथा विद्यार्थी एकसाथ मिलकर स्कूल की प्रतिदिन सफाई करते हैं और इस काम में कोई भेदभाव नहीं होता। जापान में हाइजीन कार्यकर्ताओं को 'स्वास्थ्य अभियंता' कहा जाता है। उनका वेतन पांच से आठ हजार डॉलर प्रतिमाह होता है, क्योंकि उनका काम लोगों को बीमारी से बचाता है, बच्चों को सही वातावरण देता है, प्रदूषण रोकता है और पूरे शहर को सुंदर बनाता है। भारत में अनेक लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुत्तो को टहलाने के लिए बाहर निकले मालिक को एक थैली साथ लेकर जानी होती है। ऐसा अनुशासन ही राष्ट्र को महान बनाता है।
भारत हजारों सालों से अपने विचारों, सेवा भावना तथा गहन आध्यात्मिकता के 'निर्यात' के लिए जाना जाता है। हर जापानी नागरिक भारत का विशेष सम्मान करता है। वह भले ही कुछ कहता नहीं है, मगर भारतीय कार्यसंस्कृति की कमियों और गंदगी को देखकर दुखी होता है। उसके लिए गौतम बुद्ध का यह देश सदैव आदरणीय रहा है। भारत को अपनी प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त करने के लिए बिना हिचक जापान से 'कार्यसंस्कृति तथा राष्ट्र प्रेम' का आयात करना चाहिए। सक्षम, कर्मठ, राष्ट्रसेवी नागरिक ही देश को ऊंचा उठा सकेंगे और ऐसे नागरिक उन स्कूलों में तैयार करने होंगे जहां बच्चों को राष्ट्र का भविष्य और सबसे महत्वपूर्ण नागरिक माना जाएगा।
[लेखक जगमोहन सिंह राजपूत, एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं]
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