भूटान के साथ
जनसत्ता 17 जून, 2014 : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार का नेतृत्व संभालते ही यह जता दिया था कि पड़ोसी देशों से रिश्ते बेहतर बनाना उनकी प्राथमिकताओं में शुमार है। मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में उनके न्योते पर मॉरीशस और सार्क देशों के प्रमुख भी शामिल हुए थे। अब अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए उन्होंने एक पड़ोसी देश को चुना। प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने पहले गंतव्य के लिए किसी और पड़ोसी देश के बजाय भूटान का ही चुनाव क्यों किया, इसके बारे में कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। भूटान शायद एकमात्र पड़ोसी देश है, जिसके साथ भारत के रिश्तों में कोई जटिलता नहीं रही है, इसलिए वहां जाने को लेकर कोई दुविधा नहीं हो सकती, न कूटनीतिक रूप से इस सवाल की कोई गुंजाइश रहती है कि यह समय वहां की यात्रा के लिए ठीक है या नहीं। पर भूटान की मोदी की यात्रा के पीछे एक कूटनीतिक पहलू भी हो सकता है। वे ऐसे समय थिंपू गए जब चीन भूटान को अपनी ओर आकर्षित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है और भूटान के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने के प्रयास उसने तेज कर दिए हैं। भूटान ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज, विदेश सचिव सुजाता सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ दो दिवसीय यात्रा पर थिंपू गए मोदी ने भी गर्मजोशी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्येल वांगचुक और वहां के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे से हुई बातचीत में मोदी ने भूटान के साथ भारत के रिश्ते को विशिष्ट और अनूठा बताते हुए इसे और प्रगाढ़ बनाने की मंशा जताई। भूटान ने स्वाभाविक ही इस पर खुशी का इजहार किया और तोबगे ने मोदी की खुलकर तारीफ की। मोदी ने अपनी इस यात्रा के दौरान भारत की मदद से बने भूटान के सर्वोच्च न्यायालय के परिसर का उद्घाटन और संसद के दोनों सदनों के विशेष संयुक्त अधिवेशन को संबोधित किया। यों भारत से हमेशा भूटान को आर्थिक मदद मिलती रही है, 2013 से 2018 की पंचवर्षीय योजना में भूटान के लिए पैंतालीस सौ करोड़ रुपए निर्धारित हैं। पर यूपीए सरकार ने भारत से भूटान को आपूर्ति की जाने वाली रसोई गैस और केरोसिन पर सबसिडी बंद कर दी थी। इस खटास को मिटाने की कोशिश करते हुए मोदी ने भारत में पढ़ने वाले भूटानी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की रकम दुगुनी करने की घोषणा की। उन्होंने एक डिजिटल पुस्तकालय की स्थापना में भी मदद का आश्वासन दिया, जिससे बीस लाख किताबों और पत्र-पत्रिकाओं तक भूटानी छात्रों-शोधार्थियों की पहुंच हो सकेगी। इस तरह भूटान से भारत के रिश्ते में शिक्षा के आयाम को उन्होंने बढ़ा दिया है। भूटान अतिरिक्त बिजली पैदा करने वाला देश है और भारत से उसके संबंध में ऊर्जा-सहयोग हमेशा एक बहुत अहम पहलू रहा है। मोदी की इस यात्रा में उसे और अहमियत मिली, जब भूटान सरकार ने मोदी के हाथों अपनी छह सौ मेगावाट की एक जलविद्युत परियोजना का शिलान्यास कराया। हिमालय की गोद में बसे इस छोटे-से देश ने पिछले कुछ वर्षो में दो वजहों से सारी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा। एक, किसी जनांदोलन का दबाव न होते हुए भी, वहां के नरेश ने खुद लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की नींव डालने की पहल की। दूसरे, भूटान ने सकल घरेलू उत्पाद को ही विकास का पैमाना मानने के दुनिया भर के चलन के विपरीत सकल प्रसन्नता सूचकांक की अवधारणा पेश की और उसे अपने लिए मापदंड बनाया। मोदी ने पड़ोसी देशों के रिश्तों के संदर्भ में इसका जिक्र करते हुए कहा कि किसी देश को अच्छा पड़ोसी मिले तो वह शांति और प्रसन्नता अनुभव करता है, वरना इसका उलटा। यह टिप्पणी अपनी जगह सही है, पर क्या विकास की बाबत भूटान का वैकल्पिक पैमाना हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रखता!
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