पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का यह कथन उल्लेखनीय है कि पड़ोसी देश भारत से संबंध नहीं सुधारे जा सके। चूंकि उन्होंने यह बात उस राष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन में कही जिसमें सभी बड़े दलों के नेताओं के साथ सेनाध्यक्ष और खुफिया एजेंसी आइएसआइ के प्रमुख भी उपस्थित थे इसलिए उसका महत्व और बढ़ जाता है। उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के साथ भारत से भी संबंध सुधारने की इच्छा जताई, लेकिन उन्हें इसका अहसास भी होगा कि यह आसान काम नहीं। इसका मुख्य कारण यह है कि कंट्टरपंथी तत्वों के साथ-साथ सेना और आइएसआइ इस मत के नहीं कि भारत से संबंध सुधरें। इसका सबसे बड़ा प्रमाण सीमा पार से घुसपैठ की लगातार कोशिश के अलावा संघर्ष विराम का उल्लंघन भी है। नवाज शरीफ के बहुमत के साथ सत्ता में आने से भारत को यह जो उम्मीद बंधी थी कि अब संबंध सुधार का सिलसिला गति पकड़ेगा वह रह-रह टूटती रही है। यह समझना कठिन है कि जब पाकिस्तान सरकार भारत से संबंध सुधारने की इच्छुक है तब उसकी सेना सीमा पर शांति क्यों नहीं कायम होने दे रही है? कोई भी देश हो उसकी सीमा रेखा पर तो सेना की ही चलती है, लेकिन भारत से लगी पाकिस्तानी सीमा पर उन आतंकियों की हलचल रहती है जो घुसपैठ की ताक में रहते हैं। वे घुसपैठ की कोशिश से बाज इसलिए नहीं आते, क्योंकि पाकिस्तानी सेना उनका साथ देती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान यह समझने के लिए तैयार नहीं कि संघर्ष विराम के उल्लंघन की हर घटना उसके प्रति भरोसे को कम करती है।
पाकिस्तान अपने स्तर पर वह सब कुछ करने से लगातार बचता चला आ रहा है जिससे उसके प्रति भारत का भरोसा बढ़ सके। भारत एक ओर जहां सीमा पर शांति चाहता है वहीं दूसरी ओर वह यह भी देखना चाहता है कि मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो। यह घोर निराशाजनक है कि ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ जारी कानूनी कार्रवाई जिस तरह आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही है उससे इसी अंदेशे की पुष्टि होती है कि पाकिस्तान उन्हें सजा देने के लिए तैयार नहीं। उसका ऐसा रवैया तब है जब उस तक यह संदेश अच्छी तरह पहुंच चुका है कि भारत मुंबई हमले को भूल नहीं सकता। यह ठीक है कि इसी माह दोनों देशों के विदेश सचिवों की बातचीत होने जा रही है, लेकिन अगर पाकिस्तान की ओर से संबंधों में सुधार के वास्तविक संकेत नहीं दिए जाते तो फिर इस बातचीत से भी बात बनने वाली नहीं है। पाकिस्तान के साथ संबंधों के मामले में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह तमाम वायदों के बावजूद भारत को व्यापार के मामले में अनुकूल राष्ट्र का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं। यह निराशाजनक है कि नवाज शरीफ अभी भी दुनिया को यह संदेश देने में सफल नहीं हो सके हैं कि पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ उनकी सरकार के नियंत्रण में है। यदि वह भारत और अन्य पड़ोसी देशों से वास्तव में संबंध सुधारने की इच्छा रखते हैं तो फिर उन्हें खुद को एक सक्षम शासक के रूप में उभारना होगा और इसके लिए उन्हें यदि कुछ जोखिम भी लेना पड़ा तो उससे हिचकना नहीं चाहिए।
जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की ओर से की गई गोलीबारी में सीमा सुरक्षा बल के एक जवान का शहीद होना यही बता रहा है कि सीमा पार की उन शक्तियों का दुस्साहस पहले की ही तरह कायम है जो दोनों देशों के संबंधों में खलल डालने पर आमादा हैं। चिंताजनक यह है कि इन शक्तियों में खुद पाकिस्तानी सेना भी शामिल है। यह संभव ही नहीं कि उसके सहयोग-समर्थन अर्थात मिलीभगत के बगैर सीमा पर गोलीबारी अथवा घुसपैठ की कोशिश हो। पाकिस्तानी सेना की ओर से नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संघर्ष विराम का जिस तरह आए-दिन उल्लंघन किया जाता है उससे इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि वह तब तक अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला जब तक उसे वास्तव में करारा जवाब न दिया जाए। पाकिस्तान की ओर से संघर्ष विराम का उल्लंघन होने पर भारतीय जवानों की ओर से जवाबी गोलीबारी सहज-स्वाभाविक है, लेकिन ऐसा लगता है कि इससे न तो पाकिस्तान की सेना पर कोई असर पड़ता है और न ही वहां की सरकार पर। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि भारतीय सेना के साथ-साथ भारत सरकार इस पर विचार करे कि पाकिस्तान को सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए कैसे विवश किया जाए? यह इसलिए और आवश्यक है, क्योंकि एक तो शांति एवं मित्रता की बातें बेअसर साबित हो रही हैं और दूसरे मौजूदा तौर-तरीके नाकाम दिखते हैं। एक ओर जहां सीमा पर भारतीय सेना को अपनी रीति-नीति बदलने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर यह भी आवश्यक है कि भारत सरकार पाकिस्तान पर दबाव बनाने के कुछ नए उपाय खोजे।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से यह पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर वह कैसे शासन प्रमुख हैं जो अपनी सेना को नियंत्रित नहीं रख पा रहे हैं? उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन हालात में उनकी अमन और दोस्ती की बातों का क्या मतलब जब किस्म-किस्म के आतंकी संगठन आए-दिन घुसपैठ की कोशिश करते रहते हैं। यह सही समय है जब संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह से भी जवाब-तलब किया जाना चाहिए। एक तो यह समूह अपनी प्रासंगिकता खो चुका है और दूसरे बिल्कुल नाकारा साबित हो रहा है। आखिर यह कैसा सैन्य पर्यवेक्षक समूह है जिसे यह नहीं दिखता कि पाकिस्तानी सेना संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के साथ किस तरह आतंकियों की घुसपैठ कराने में जुटी रहती है? यह सैन्य समूह कश्मीर समस्या के समाधान में बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत का आभास कराने का जो बेजा काम कर रहा है उससे पाकिस्तान को दुष्प्रचार करने का अतिरिक्त मौका मिलता है। पाकिस्तान सरकार के साथ-साथ तमाम आतंकी संगठन भी जब-तब इस मौके का इस्तेमाल करते हैं। यह ठीक नहीं कि संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह के जरिये आतंकी संगठनों को भारत पर निगाहें गड़ाने का बहाना मिले। भारत सरकार और साथ ही जम्मू-कश्मीर सरकार को इससे परिचित होना चाहिए कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों के साथ-साथ किस तरह पश्चिम एशिया के लिए खतरा बन गए जेहादी संगठन आइएसआइएस के समर्थक कश्मीर में सिर उठा रहे हैं। इन तत्वों पर लगाम लगाने के लिए सीमा पर शांति कायम करना आवश्यक है। यह एक ऐसा काम है जिससे समझौता नहीं किया जा सकता।
दस दिनों के भीतर पाकिस्तानी सीमा पर एक और भारतीय जवान की शहादत से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान के रुख-रवैये में कहीं कोई तब्दीली नहीं आई है। माना यह जा रहा था कि भारत में नई सरकार की स्थापना और उसके शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की शिरकत से हालात कुछ बदलेंगे, लेकिन स्थितियां कुल मिलाकर जस की तस हैं। अब तो यह भी लगता है कि पाकिस्तान स्थितियों को बिगाड़ने पर ही तुला है, क्योंकि नई सरकार के गठन के बाद से सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन की यह 19वीं घटना है। इस तरह की घटनाओं में दो जवान शहीद हुए हैं और कई घायल हुए हैं। संघर्ष विराम का उल्लंघन न केवल नियंत्रण रेखा पर किया जा रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर भी। प्रत्येक घटना के बाद चौकसी बढ़ाए जाने और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की बातें सुनने को मिलती हैं, लेकिन देश जानना चाहेगा कि वस्तुत: ऐसा कब होगा और ऐसी स्थितियां क्यों नहीं बन पा रही हैं जिससे पाकिस्तान इस तरह की हरकतों से बाज आए? पाकिस्तानी सेना या तो भारत को उकसाने के लिए संघर्ष विराम का उल्लंघन करती है या फिर आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए। गत दिवस की घटना में भी यह सामने आया कि आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तान सेना की ओर से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया। इससे यह भी पता चलता है कि पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों को पहले की तरह सहयोग और समर्थन हासिल है। आतंकी संगठनों को यह सहयोग-समर्थन पाकिस्तान सेना की ओर से भी मिल रहा है और वहां की सरकार की ओर से भी। यह तर्क दिया जा सकता है कि पाकिस्तान सरकार का अपनी सेना पर कोई जोर नहीं, लेकिन आखिर क्या कारण है कि वह उन आतंकी संगठनों पर भी कोई कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं जिनके प्रशिक्षण शिविर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे हैं और जिनकी संख्या भी दर्जनों में है। यह विचित्र है कि जब पाकिस्तानी सेना का सवाल आता है तो वहां की सरकार ऐसा जाहिर करती है कि उसका अपनी सेना पर जोर नहीं और जब मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को सजा दिलाने के मामले में सुस्त कानूनी प्रक्रिया का मामला आता है तो वहां की सरकार की ओर से ऐसा जाहिर किया जाता है कि वह कुछ करने की स्थिति में नहीं। यह तब है जब मुंबई हमले से जुड़े मामले की सुनवाई लगातार टल रही है और इस स्थिति के बावजूद दलील यह दी जाती है कि पाकिस्तानी न्याय प्रक्रिया बहुत ही स्वतंत्र है। इन स्थितियों में यह जरूरी हो जाता है कि भारत सरकार पाकिस्तान के संदर्भ में वास्तव में कोई नई रीति-नीति अपनाए अन्यथा मोदी सरकार के उन दावों की खिल्ली उड़ेगी जो पाकिस्तान को सबक सिखाए जाने के संदर्भ में किए जा रहे थे। चुनाव प्रचार के दौरान खुद मोदी की ओर से बार-बार यह कहा जा रहा था कि पाकिस्तान को सबक सिखाया जाएगा। सीमा पर संघर्ष विराम के लगातार उल्लंघन को लेकर राज्यसभा में रक्षामंत्री अरुण जेटली ने यह जो कहा कि सरकार ऐसे मामलों में कोई ढिलाई नहीं बरतेगी उसकी सार्थकता तभी है जब पाकिस्तान को यह अहसास कराया जा सके कि सीमा पर अशांति उसे महंगी पड़ेगी।
गंभीर हो सरकार
Wed, 20 Aug 2014
संघर्ष विराम का उल्लंघन कर पाकिस्तान की ओर से जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्रों में कई चौकियों पर गोलीबारी से वहां पर रह रहे लोगों का चिंतित होना स्वभाविक है। बीच-बीच में कुछ दिनों को छोड़ दिया जाए तो विगत कुछ सप्ताह से आए दिन गोलीबारी हो रही है। इन क्षेत्रों से पलायन जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। स्थिति यह हो गई है कि अब्दुल्लियां, कोरोटना खुर्द, गोपड़ सहित कई गांवों में तो बच्चे स्कूलों में भी नहीं आ रहे हैं। एक ओर जहां बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है तो वहीं खेतीबाड़ी पर निर्भर सीमांत किसानों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। करीब एक महीने पहले भी जब सीमावर्ती क्षेत्रों में सैकड़ों किसान व श्रमिक खेतों में धान की रोपाई कर रहे थे तो पाक की ओर से इसी तरह संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया था। गोलीबारी की वजह से किसान खेतों का रुख नहीं कर पाए थे। गोलीबारी से लोग इतने भयभीत हैं कि वे जान बचाने के लिए घरों में बैठे हुए हैं। विडंबना यह है कि घरों में भी वे सुरक्षित नहीं हैं और पाकिस्तान की ओर से फेंके जा रहे शेल उनके घरों पर गिर रहे हैं। सीमांत गांवों जेरड़ा, दग छन्नी, चमलियाल, कंदराल, नारायण पुर, कठाड़, पिण्ड़ी, काकू दे कोठे, अरनिया, जोईयां, नंदपुर टिव्वा, अवताल, भांमू चक, बल्लड़ सहित हर गांवों का यही हाल है। यह वे गांव हैं, जहां की हजारों एकड़ भूमि पर कारगिल युद्ध के दौरान भी कई वर्ष तक खेती नहीं हो सकी थी। वषरें बंजर रहे खेतों के मालिक कितने दर्द में हैं यह न तो सरकार समझ पाई और ही अन्य राजनीतिक दल। होना तो यह चाहिए था कि कारगिल युद्ध के बाद ही केंद्र व राज्य सरकार को सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की समस्या का स्थायी समाधान करने के लिए कोई पुख्ता नीति बनानी चाहिए थी, लेकिन इसके बाद की किसी भी सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार नहीं किया। सरकार को आए दिन सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रही गोलीबारी को देखते हुए वहां पर रहने वाले हजारों लोगों के सुरक्षित भविष्य के लिए पुख्ता नीति बनानी होगी ताकि उन्हें हर दिन मौत के साये में न गुजारना पड़े। इसके लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है और वहां पर रहने वालों को विश्वास में लेने की जरूरत है।
[स्थानीय संपादकीय: जम्मू-कश्मीर]
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स्वाभाविक अंजाम
Tue, 19 Aug 2014
विदेश सचिव वार्ता से पहले पाकिस्तान जैसे माहौल का निर्माण करने में लगा हुआ था उसे देखते हुए वैसी कोई नौबत आनी ही थी जैसी भारत सरकार की ओर से इस वार्ता को रद करने की घोषणा के रूप में आई। भारत के इस फैसले से दोनों देश फिर वहीं आ खड़े हुए हैं जहां जनवरी 2013 में खड़े थे। तब सीमा पर भारतीय जवान का सिर काटे जाने की खौफनाक घटना के बाद भारत-पाक के बीच वार्ता का सिलसिला थम गया था। उम्मीद की जा रही थी कि भारत से दोस्ती की बातें करने वाले नवाज शरीफ के फिर से सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंध सुधरेंगे। इन उम्मीदों को तब और बल मिला जब नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने नवाज शरीफ भी आए। उनके नई दिल्ली आगमन के कुछ ही दिनों बाद विदेश सचिव स्तर की वार्ता की तिथि तय हो गई, लेकिन ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने इस बातचीत के पहले माहौल को खराब करने की ठान ली थी। उसकी ओर से नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं यकायक बढ़ गई थीं। पिछले कुछ दिनों से तो सीमा पार से कुछ ज्यादा ही गोलीबारी हो रही थी। शायद पाकिस्तान को इतने भर से चैन नहीं था। नई दिल्ली स्थित उसके उच्चायुक्त ने जिस तरह यकायक कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बातचीत करने का फैसला किया उसे उकसावे वाली हरकत के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। हालांकि भारत ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त को इसके लिए चेताया भी कि हुर्रियत नेताओं से उनकी बातचीत उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है, लेकिन वह बाज नहीं आए। इन स्थितियों में भारत के पास विदेश सचिव स्तर की वार्ता को रद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया था।
यह समझ आता है कि सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं को पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ की शह पर अंजाम दिया जा रहा होगा, लेकिन क्या यह भी मान लिया जाए कि नई दिल्ली में बैठे पाकिस्तानी उच्चायुक्त भी अपने प्रधानमंत्री के बजाय अपनी सेना के इशारे पर काम कर रहे हैं? अगर नवाज शरीफ का अपने उच्चायुक्त पर भी नियंत्रण नहीं रह गया है तो फिर उनके विदेश सचिव से बातचीत करने का मतलब ही क्या रह जाता है? नि:संदेह अब इस पर यकीन करना और कठिन है कि नवाज शरीफ वास्तव में भारत से संबंध सुधार के इच्छुक हैं। वह या तो भारत से संबंध सुधारने का दिखावा कर रहे हैं या फिर उनकी विदेश नीति पर भी सेना और खुफिया एजेंसी हावी हो गई है। पिछले कुछ समय में पाकिस्तान की ओर से भारत के संदर्भ में जैसी परिस्थितियां निर्मित की गईं और खुद इस्लामाबाद में जैसे हालात पैदा हो गए हैं उससे तो यही लगता है कि नवाज शरीफ घरेलू-बाहरी, दोनों मोचरें पर दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे हैं। यह एक तथ्य है कि पाकिस्तान में एक तबका ऐसा है जो भारत से वैरभाव बनाए रखना चाहता है। इसमें सेना खास तौर पर शामिल है, लेकिन यह समझना कठिन है कि नवाज शरीफ अपनी सेना के इतने अधिक दबाव में क्यों हैं? यदि पाकिस्तान यह समझने के लिए तैयार नहीं कि भारत से संबंधों में सुधार उसके अपने हित में ही है तो फिर भारत चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता।
[मुख्य संपादकीय]
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चिढ़ाने वाली हरकत
Mon, 18 Aug 2014
पाकिस्तान के उच्चायुक्त की ओर से जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को बातचीत के लिए निमंत्रण दिया जाना हैरान करने वाला भी है और परेशान करने वाला भी। पाकिस्तान के उच्चायुक्त अर्थात पाकिस्तान की यह हरकत एक तरह से भारत के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। यह सही है कि पाकिस्तानी उच्चायोग की ओर से इस तरह की गतिविधि पहले भी हो चुकी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि एक गलत काम बार-बार होता रहे। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि पाकिस्तान के उच्चायुक्त के इस कदम पर केंद्र सरकार की ओर से निराशा व्यक्त की गई है। यदि भारत सरकार यह समझ रही है कि इस तरह की बातचीत और आमंत्रण अनुचित है तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा न होने पाए। पाकिस्तानी उच्चायोग की ओर से कश्मीर के अलगाववादियों को वार्ता के लिए निमंत्रित करने से यह स्पष्ट हो रहा है कि पाकिस्तान भारत से संबंध सुधार का दिखावा भर कर रहा है और उसका असली मकसद कुछ और है। इससे अधिक विचित्र और कुछ नहीं हो सकता है कि जब पाकिस्तान सरकार के लिए अपनी साख बचाना मुश्किल हो रहा हो तब वह नई दिल्ली स्थित अपने उच्चायोग की ओर से भारत को उकसाने और चिढ़ाने वाली हरकत को मंजूरी दे रही है। हो सकता है कि उसका इरादा पाकिस्तान की जनता का ध्यान बंटाना हो, लेकिन उसे यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि इससे भारत की जनता के बीच बहुत गलत संदेश गया है।
यह निराशाजनक है कि भारत से दोस्ती और संबंध सुधार की बातें करने वाले नवाज शरीफ जब से सत्ता में आए हैं तब से वह भारतीय नेतृत्व और भारतीयों को निराश करने का ही काम कर रहे हैं। एक ओर वह भारत से संबंध सुधारने की बातें कर रहे हैं और दूसरी ओर सीमा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन भी होने दे रहे हैं। जम्मू-कश्मीर सीमा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन अब रोजमर्रा की बात हो गई है। यदि इस उल्लंघन के लिए पाकिस्तान सरकार जवाबदेह नहीं है तो फिर इसका मतलब है कि उसका अपनी सेना पर कोई अधिकार नहीं रह गया है और यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर पाकिस्तान सरकार पर भरोसा करने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। जिस तरह से आए दिन सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ की कोशिश हो रही है और इस कोशिश में पाकिस्तानी सेना अपना योगदान दे रही है उसे देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि भारतीय सेना पाकिस्तान को वास्तव में मुंहतोड़ जवाब देने के बारे में सोचे। यह ठीक नहीं कि जब पाकिस्तान की ओर से संघर्ष विराम का उल्लंघन होता है तब भारतीय सेना की ओर से जवाबी कार्रवाई किए जाने की सूचना आती है। भारतीय सेना को इतना सक्षम होना ही चाहिए कि पाकिस्तानी सेना संघर्ष विराम का उल्लंघन करने की हिम्मत न जुटा सके। पाकिस्तान ने जिस तरह विदेश सचिवों की वार्ता के ठीक पहले नई दिल्ली स्थित अपने उच्चायुक्त के जरिये कश्मीर के अलगाववादियों को निमंत्रित किया उस पर भारत को केवल प्रतिक्रिया व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उचित यह होगा कि वह पाकिस्तान को दो टूक संदेश दे कि इस तरह की हरकतें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। यदि पाकिस्तान अपने रुख-रवैये में परिवर्तन नहीं करता तो फिर भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पाकिस्तानी उच्चायुक्त अलगाववादियों से सलाह-मशविरा न कर सकें।
[मुख्य संपादकीय]
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पाकिस्तान का संकट
Sat, 23 Aug 2014
पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर से लगी सीमा पर जैसे हालात पैदा कर रखे हैं वे तो भारत के लिए चिंताजनक हैं ही, इस्लामाबाद की स्थितियां भी परेशान करने वाली हैं। पिछले वर्ष चुनावों के बाद एक सशक्त शासक के रूप में उभरे नवाज शरीफ इन दिनों चौतरफा संकट से घिरे नजर आ रहे हैं। इस संकट की जड़ में क्त्रिकेटर से नेता बने इमरान खान भी हैं और मौलाना से एक समाज सुधारक नेता के तौर पर तब्दील हुए ताहिर उल कादरी भी। हालांकि इन दोनों ने ही नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ जो अभियान छेड़ा हुआ है वह अपने आप में अलोकतांत्रिक और अतार्किक है, लेकिन नवाज शरीफ उनसे निपटने में नाकाम साबित होते दिख रहे हैं। उनकी नाकामी उन्हें एक कमजोर शासक ही सिद्ध कर रही है। यह तब है जब पाकिस्तानी संसद ने उनकी तरफदारी करते हुए साफ तौर पर कहा है कि उन्हें इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है। भले ही मौजूदा संकट में सेना खुद को तटस्थ दिखाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन उसने प्रदर्शनकारियों को जिस तरह सघन सुरक्षा वाले क्षेत्र में जाने की इजाजत दी उससे तो यही लगता है कि वह नवाज शरीफ को कुछ संदेश देने की कोशिश कर रही है। सेना के साथ पाकिस्तान की न्यायपालिका की भूमिका भी नीर-क्षीर नहीं नजर आ रही है, क्योंकि उसने एक तरह से यही कहा है कि प्रदर्शनकारियों को संसद और उसके आसपास डटे रहने से रोका नहीं जाना चाहिए। नवाज शरीफ की मुश्किलें इसलिए और बढ़ती दिख रही हैं, क्योंकि इमरान खान सरकार से बातचीत से पीछे हट गए हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने सांसदों से त्यागपत्र देने और इस्लामाबाद की तरह से देश भर में शरीफ सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने को कहा है। 1यह सही है कि इमरान खान ने अच्छे-खासे समर्थक जुटा लिए हैं, लेकिन वे जिन मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं उनका कहीं कोई औचित्य नहीं। यह आश्चर्यजनक है कि करीब एक साल बाद उन्हें यह याद आया कि चुनावों के दौरान धांधली हुई थी और इसका सबसे अधिक खामियाजा उनकी पार्टी को भुगतना पड़ा। एक तो चुनावों के वक्त नवाज शरीफ सत्ता में नहीं थे और दूसरे यदि मान भी लिया जाए कि कहीं कोई गड़बड़ी हुई थी तो फिर उसे लेकर एक साल बाद आंदोलन छेड़ने का क्या मतलब? आश्चर्यजनक है कि वह नवाज शरीफ के इस्तीफे से कम के लिए राजी नहीं हैं। हालांकि वह अपने ऐसे रवैये के कारण एक घोर अतार्किक नेता के रूप में उभरे हैं, लेकिन पाकिस्तानी सेना और वहां की न्यायपालिका परोक्ष रूप से उनकी तरफदारी करती दिख रही है। यह संभव है कि नवाज शरीफ इस संकट से पार पाने में सफल रहें, लेकिन फिलहाल वह एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में उभर आए हैं। उन्होंने कमजोर नेता की अपनी छवि से भारत को भी निराश करने का काम किया है, क्योंकि वह न तो सीमा पर शांति बनाए रखने में सक्षम हो पा रहे हैं और न ही भारत से रिश्ते सुधारने की अपनी कोशिश में। नई दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने जिस तरह भारत सरकार की आपत्ति के बावजूद हुर्रियत नेताओं से वार्ता की उससे यही स्पष्ट हुआ कि या तो शरीफ यह वार्ता होने देना चाहते थे या फिर उनका अपने ही उच्चायुक्त पर कोई वश नहीं था।
[मुख्य संपादकीय]
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एक ही नतीजे की नियति
Sat, 23 Aug 2014
यह होना ही था, लेकिन कुछ पहले हो गया। कुछ लोगों ने इस बात की घोषणा उसी समय कर दी थी जब मई में नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए नवाज शरीफ नई दिल्ली आए थे। शरीफ को आमंत्रित करने के चौंकाने वाले घटनाक्त्रम से कुछ लोगों को उम्मीद बंधी थी कि इससे भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों की नई शुरुआत होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह को पाकिस्तान में अपने समकक्ष अजीज अहमद चौधरी से 25 अगस्त को वार्ता करने के लिए इस्लामाबाद जाना था। सितंबर 2012 के बाद इस तरह की यह पहली बैठक होनी थी, लेकिन भारत ने पाकिस्तान के साथ होने वाली इस वार्ता को तब रोकने का निर्णय लिया जब भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से मुलाकात की। 1इस पर भारत ने तीव्र प्रत्युत्तर दिया और पाकिस्तान को अवगत कराया कि भारत के आंतरिक मामलों में उसके लगातार हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान का तर्क है कि उच्चायुक्त ने भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के मुताबिक कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। इस तरह की प्रतिक्त्रियाओं की आशंका पहले से थी। प्रस्तावित वार्ता को स्थगित किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए भाजपा ने कहा है कि यद्यपि भारत अपने पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध चाहता है, लेकिन वह किसी के भी द्वारा देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को सहन नहीं करेगा। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने जानबूझकर खुद को इस संकट में धकेला। इस घटनाक्त्रम को लेकर कश्मीर के राजनीतिक दलों ने नाखुशी जाहिर करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। आजादी के पक्षधर यासीन मलिक के मुताबिक शांतिपूर्ण समाधान के विकल्प को रोक करके केंद्र सरकार ने युवाओं को आतंकवाद की तरफ धकेलने का काम किया है। जो कुछ हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है। कुछ वर्षो के अंतराल पर ऐसा सदैव होता है जब भारत-पाकिस्तान परस्पर वार्ता का निर्णय करते हैं। यदि वार्ता होती भी है तो कोई परिणाम नहीं आता अथवा जब वार्ता शुरू होनी होती है तो कुछ ऐसा हो जाता है जिससे यह रुक जाती है अथवा पटरी से उतर जाती है। क्या हम यह उम्मीद करें कि कुछ महीनों बाद भारत और पाकिस्तान फिर से वार्ता के लिए तैयार होंगे। यदि यह वार्ता वास्तविक मुद्दों पर होती है तो फिर चिंता की कोई बात ही नहीं है। पूरी दुनिया भारत-पाकिस्तान के बीच किसी ठोस नतीजे की उम्मीद कर रही है, लेकिन बातचीत की सड़क कहीं नहीं जा रही अथवा इसकी दिशा का पता नहीं। इसे भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए कि तकरीबन छह दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी अपने आकार से आठ गुना छोटे पड़ोसी देश के साथ मामले को हल नहीं किया जा सका। हाल के वर्षो में पाकिस्तान के प्रति भारतीय नीति सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सीमा पार व्यापार को लेकर उलझी रही। पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके भेजता रहा है और भारत की कूटनीतिक व सैन्य ताकत को बेकार साबित करता रहा है। इस बात को लेकर भी चर्चा होती रही है कि पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में प्रवेश करने की अनुमति दी जाए या नहीं। 1भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की हकीकत इस्लामाबाद की स्पष्ट रणनीतिक प्राथमिकताओं और नई दिल्ली के अल्पकालिक दृष्टिकोण को उजागर करने वाली है। ऐसा यदि लंबे समय तक चला तो भारत पाकिस्तान के प्रति कुछ अलग हटकर सोचने और अपनी प्राथमिकताओं को बदलने के लिए विवश होगा। यद्यपि संप्रग सरकार के कार्यकाल में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अधिक व्यापक रणनीतिक सोच रखते थे और इसके लिए उन्होंने कई बार पाकिस्तान से संबंध सुधार की कोशिश की, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी सरकार ने समझ लिया कि पाकिस्तान के साथ वार्ता के सिवा और दूसरा कोई रास्ता नहीं है। भारत का रणनीतिक धरातल पिछले कुछ वर्षो में आश्चर्यजनक रूप से संकुचित हुआ है। नई दिल्ली का मानना है कि आतंकवाद को रोकने और इस्लामाबाद से संपर्क के लिए बेहतर यही होगा कि अमेरिका से समन्वय स्थापित किया जाए। मुंबई आतंकी हमले की घटना पर पाकिस्तान की निष्कि्त्रयता को देखते आम जनता भी पाकिस्तान से वार्ता के पक्ष में नहीं है और भारत भी अंतरराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान से वार्ता नहीं चाहता। कुछ ऐसी ही स्थिति पाकिस्तान के असली सत्ता केंद्र यानी वहां की सेना की भी है। वह भी भारत से वार्ता के लिए गंभीर नहीं।1भारत की विशाल आर्थिक, सैन्य और भौगोलिक बढ़त को देखते हुए पाकिस्तान भारत के खिलाफ गैर-पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहता है। भारत को रोकने के लिए ही उसने परमाणु हथियार बनाए हैं ताकि बराबरी कायम रखी जा सके। परमाणु हथियारों की छतरी के सहारे पाकिस्तान अपनी विदेश नीति के तौर पर आतंकवाद का सहारा लेता है, विशेषकर जम्मू एवं कश्मीर के मामले में। पाकिस्तान कश्मीर मामले में यथास्थिति बदलने के पक्ष में है, जबकि भारत का रुख इसके विपरीत है। भारत के विचार से शांति प्रयासों से पाकिस्तान भारत में आतंकवादियों को भेजना बंद करेगा और पड़ोसी देशों से अच्छे संबंधों के लिए प्रेरित होगा। इसके उलट पाकिस्तान का मानना है कि वार्ता के माध्यम से कश्मीर मसले पर भारत से कुछ छूट हासिल की जा सकती है। पाकिस्तान का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, लेकिन कोई नहीं जानता कि भारत का लक्ष्य क्या है? हालांकि यह स्वाभाविक है कि भारत कश्मीर घाटी पर अपना नियंत्रण छोड़ने वाला नहीं। भारत को वार्ता अनिवार्य रूप से जारी रखनी चाहिए- फिर भले ही कुछ अलग तरीकों से पाकिस्तान को नियंत्रित करना पड़े। नई दिल्ली और शेष विश्व समुदाय को कुछ कठिन सच्चाइयों को स्वीकार करने के लिए अथवा उनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो भारत-पाकिस्तान के बीच वार्ता प्रक्त्रिया सदैव ही हमें निराश करती रहेगी। 1(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं) 11ी2स्त्रल्ल2ीन्ॠ1ंल्ल.ङ्घे1यह होना ही था, लेकिन कुछ पहले हो गया। कुछ लोगों ने इस बात की घोषणा उसी समय कर दी थी जब मई में नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए नवाज शरीफ नई दिल्ली आए थे। शरीफ को आमंत्रित करने के चौंकाने वाले घटनाक्त्रम से कुछ लोगों को उम्मीद बंधी थी कि इससे भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों की नई शुरुआत होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह को पाकिस्तान में अपने समकक्ष अजीज अहमद चौधरी से 25 अगस्त को वार्ता करने के लिए इस्लामाबाद जाना था। सितंबर 2012 के बाद इस तरह की यह पहली बैठक होनी थी, लेकिन भारत ने पाकिस्तान के साथ होने वाली इस वार्ता को तब रोकने का निर्णय लिया जब भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से मुलाकात की। 1इस पर भारत ने तीव्र प्रत्युत्तर दिया और पाकिस्तान को अवगत कराया कि भारत के आंतरिक मामलों में उसके लगातार हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान का तर्क है कि उच्चायुक्त ने भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के मुताबिक कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। इस तरह की प्रतिक्त्रियाओं की आशंका पहले से थी। प्रस्तावित वार्ता को स्थगित किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए भाजपा ने कहा है कि यद्यपि भारत अपने पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध चाहता है, लेकिन वह किसी के भी द्वारा देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को सहन नहीं करेगा। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने जानबूझकर खुद को इस संकट में धकेला। इस घटनाक्त्रम को लेकर कश्मीर के राजनीतिक दलों ने नाखुशी जाहिर करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। आजादी के पक्षधर यासीन मलिक के मुताबिक शांतिपूर्ण समाधान के विकल्प को रोक करके केंद्र सरकार ने युवाओं को आतंकवाद की तरफ धकेलने का काम किया है। जो कुछ हो रहा है उसमें कुछ भी नया नहीं है। कुछ वर्षो के अंतराल पर ऐसा सदैव होता है जब भारत-पाकिस्तान परस्पर वार्ता का निर्णय करते हैं। यदि वार्ता होती भी है तो कोई परिणाम नहीं आता अथवा जब वार्ता शुरू होनी होती है तो कुछ ऐसा हो जाता है जिससे यह रुक जाती है अथवा पटरी से उतर जाती है। क्या हम यह उम्मीद करें कि कुछ महीनों बाद भारत और पाकिस्तान फिर से वार्ता के लिए तैयार होंगे। यदि यह वार्ता वास्तविक मुद्दों पर होती है तो फिर चिंता की कोई बात ही नहीं है। पूरी दुनिया भारत-पाकिस्तान के बीच किसी ठोस नतीजे की उम्मीद कर रही है, लेकिन बातचीत की सड़क कहीं नहीं जा रही अथवा इसकी दिशा का पता नहीं। इसे भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी रणनीतिक विफलता के तौर पर देखा जाना चाहिए कि तकरीबन छह दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी अपने आकार से आठ गुना छोटे पड़ोसी देश के साथ मामले को हल नहीं किया जा सका। हाल के वर्षो में पाकिस्तान के प्रति भारतीय नीति सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सीमा पार व्यापार को लेकर उलझी रही। पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके भेजता रहा है और भारत की कूटनीतिक व सैन्य ताकत को बेकार साबित करता रहा है। इस बात को लेकर भी चर्चा होती रही है कि पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में प्रवेश करने की अनुमति दी जाए या नहीं। 1भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की हकीकत इस्लामाबाद की स्पष्ट रणनीतिक प्राथमिकताओं और नई दिल्ली के अल्पकालिक दृष्टिकोण को उजागर करने वाली है। ऐसा यदि लंबे समय तक चला तो भारत पाकिस्तान के प्रति कुछ अलग हटकर सोचने और अपनी प्राथमिकताओं को बदलने के लिए विवश होगा। यद्यपि संप्रग सरकार के कार्यकाल में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अधिक व्यापक रणनीतिक सोच रखते थे और इसके लिए उन्होंने कई बार पाकिस्तान से संबंध सुधार की कोशिश की, लेकिन सच्चाई यही है कि उनकी सरकार ने समझ लिया कि पाकिस्तान के साथ वार्ता के सिवा और दूसरा कोई रास्ता नहीं है। भारत का रणनीतिक धरातल पिछले कुछ वर्षो में आश्चर्यजनक रूप से संकुचित हुआ है। नई दिल्ली का मानना है कि आतंकवाद को रोकने और इस्लामाबाद से संपर्क के लिए बेहतर यही होगा कि अमेरिका से समन्वय स्थापित किया जाए। मुंबई आतंकी हमले की घटना पर पाकिस्तान की निष्कि्त्रयता को देखते आम जनता भी पाकिस्तान से वार्ता के पक्ष में नहीं है और भारत भी अंतरराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार करते हुए पाकिस्तान से वार्ता नहीं चाहता। कुछ ऐसी ही स्थिति पाकिस्तान के असली सत्ता केंद्र यानी वहां की सेना की भी है। वह भी भारत से वार्ता के लिए गंभीर नहीं।1भारत की विशाल आर्थिक, सैन्य और भौगोलिक बढ़त को देखते हुए पाकिस्तान भारत के खिलाफ गैर-पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहता है। भारत को रोकने के लिए ही उसने परमाणु हथियार बनाए हैं ताकि बराबरी कायम रखी जा सके। परमाणु हथियारों की छतरी के सहारे पाकिस्तान अपनी विदेश नीति के तौर पर आतंकवाद का सहारा लेता है, विशेषकर जम्मू एवं कश्मीर के मामले में। पाकिस्तान कश्मीर मामले में यथास्थिति बदलने के पक्ष में है, जबकि भारत का रुख इसके विपरीत है। भारत के विचार से शांति प्रयासों से पाकिस्तान भारत में आतंकवादियों को भेजना बंद करेगा और पड़ोसी देशों से अच्छे संबंधों के लिए प्रेरित होगा। इसके उलट पाकिस्तान का मानना है कि वार्ता के माध्यम से कश्मीर मसले पर भारत से कुछ छूट हासिल की जा सकती है। पाकिस्तान का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, लेकिन कोई नहीं जानता कि भारत का लक्ष्य क्या है? हालांकि यह स्वाभाविक है कि भारत कश्मीर घाटी पर अपना नियंत्रण छोड़ने वाला नहीं। भारत को वार्ता अनिवार्य रूप से जारी रखनी चाहिए- फिर भले ही कुछ अलग तरीकों से पाकिस्तान को नियंत्रित करना पड़े। नई दिल्ली और शेष विश्व समुदाय को कुछ कठिन सच्चाइयों को स्वीकार करने के लिए अथवा उनका सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो भारत-पाकिस्तान के बीच वार्ता प्रक्त्रिया सदैव ही हमें निराश करती रहेगी। (हर्ष वी पंत: लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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इस्लामाबाद की गहमागहमी
नवभारत टाइम्स | Aug 22, 2014
अरब स्प्रिंग के नाम से कई अरब देशों में चली बदलाव की बयार अपना असर खो चुकी है। भारत में भी तीन साल पहले चला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन टुकड़ों में बंट कर पस्त हो चुका है। लेकिन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हजारों लोग वहां के प्रधानमंत्री निवास को कुछ इस अंदाज में घेरे हुए हैं कि नवाज शरीफ का इस्तीफा लिए बगैर मानेंगे नहीं। इस प्रदर्शन के पीछे पूर्व क्रिकेटर और तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के प्रमुख इमरान खान और मौलाना ताहिर उल कादरी दोनों की साझा ताकत है, हालांकि दोनों की मांगों की प्रकृति अलग-अलग है। इमरान खान की मुख्य आपत्ति पिछले साल आम चुनावों में हुई कथित धांधली पर है, जबकि मौलाना कादरी का मुख्य निशाना देश में फैला करप्शन है। इसीलिए दोनों के रवैये में भी बुनियादी फर्क दिख रहा है। इमरान खान का दावा है कि पिछले साल चुनावों में धांधली नहीं होती तो जीत उनकी ही होती। चुनाव नतीजों के मुताबिक कुल 342 सीटों में से नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-(एन) को 190 और इमरान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ को मात्र 34 सीटें मिली थीं। लेकिन वह नवाज शरीफ को दिल से प्रधानमंत्री मान ही नहीं पा रहे और उनके इस्तीफे से कम पर बात करने को तैयार नहीं। बुधवार को जब सेना की अपील के बाद सरकार की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव आया तो मौलाना कादरी ने इसे यह कहते हुए स्वीकार कर लिया कि वह कभी बातचीत के विरोधी नहीं रहे। इसके विपरीत इमरान खान ने कहा कि नवाज के इस्तीफे के बाद ही उनसे बातचीत हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अदालत का आदेश वह हर हाल में मानेंगे। मौजूदा हालात में प्रदर्शनों के असली उद्देश्य को लेकर अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। जहां तक इमरान खान की बात है तो पिछले साल मई महीने में हुए चुनाव के इतने दिन बाद उनका इस तरह अचानक इस्तीफे की मांग को लेकर सड़क पर उतरना स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अगर उन्हें चुनाव नतीजों को लेकर आपत्ति थी तो यह आंदोलन उसी समय होना चाहिए था। पिछले साल जून-जुलाई में अगर वह इस तरह 'करो या मरो' की स्थिति में दिखते तो इसे तर्कसंगत माना जा सकता था। मौलाना कादरी भी दिसंबर 2012 में इन्हीं सवालों पर लॉन्ग मार्च आयोजित कर चुके हैं। तब उनके जुलूस में लोगों की मौजूदगी को लेकर उनके दावों पर सवाल जरूर उठे थे, लेकिन सरकार ने तब भी उनके साथ एक समझौतापत्र पर दस्तखत किए थे। दो साल के अंदर फिर उन्हीं सवालों पर इस तरह के प्रदर्शन कई ऐसे सवाल खड़े करते हैं, जिनके जवाब नहीं मिल पा रहे। पाकिस्तान के लिए यह अच्छी बात है कि सेना ने अभी तक खुद को सत्ता-निरपेक्ष भूमिका में बनाए रखा है। उम्मीद करें कि सभी पक्ष समझदारी का परिचय देंगे और और कट्टरपंथी बगावतों से घिरे पाकिस्तान को राजनीतिक अस्थिरता का नया दौर नहीं झेलना होगा।
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दूरंदेशी से दूर
जनसत्ता 20 अगस्त, 2014 : पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने हुर्रियत के नुमाइंदों को मुलाकात का न्योता ऐसे वक्त क्यों दिया, जब कुछ ही दिन बाद दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत तय थी? जाहिर है यह भारत सरकार को रास नहीं आ सकता था। मगर नाराजगी में उसने जैसी प्रतिक्रिया की, उसे अतिरंजित ही कहना होगा। उसने दोनों तरफ के विदेश सचिवों की वह बैठक रद््द कर दी, जो इस्लामाबाद में 25 अगस्त को होनी थी। भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की प्रक्रिया कई बार मुल्तवी हुई है। मसलन, नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने समग्र वार्ता के सिलसिले को जहां का तहां रोक दिया था। वह बहुत असाधारण परिस्थिति थी। ताजा फैसले के पीछे वैसा कोई ठोस आधार नहीं दिखता। ऐसा पहले कई बार हुआ है जब पाकिस्तानी उच्चायुक्त या पाकिस्तान से आए नेताओं और प्रतिनिधिमंडल ने हुर्रियत के लोगों से मुलाकात की। उनकी भेंट उस दौरान भी हुई जब दोनों देशों के बीच काफी अहम बातचीत की प्रक्रिया चल रही थी। 1995 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फारूक लेघारी सार्क की बैठक के लिए दिल्ली आए तो हुर्रियत नेताओं से भी मिले थे। तब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान भी यह सिलसिला जारी रहा। जुलाई 2001 में पाकिस्तान के तब के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने शिखर वार्ता के लिए आगरा रवाना होने से पहले हुर्रियत नेताओं से भेंट की थी। वाजपेयी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विभिन्न समूहों से बातचीत का दौर भी चलाया, जिसमें हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने भी शिरकत की थी। पाकिस्तान जाकर भी हुर्रियत के प्रतिनिधि वहां की सरकार के मंत्रियों और अन्य राजनीतिकों से मिलते रहे हैं। मोदी सरकार इन तथ्यों से अनजान नहीं होगी। अगर उसे पाकिस्तानी उच्चायुक्त से हुर्रियत की मुलाकात पर नाराजगी जतानी ही थी, तो विदेश सचिवों की बैठक में यह मसला उठाया जा सकता था। पर बैठक रद्द कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल उस नीति की निरंतरता को चोट पहुंचाई है जो वाजपेयी सरकार के समय भी जारी रही, बल्कि उस पहल को भी पलीता लगाया है जो उन्होंने पदभार संभालते ही की थी। उनके शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ भी शरीक हुए थे। विदेश सचिव स्तर की वार्ता की सहमति तभी बन गई थी। अलबत्ता तब से पाकिस्तान के अंदरूनी हालात में फर्क आया है। शरीफ अपने खिलाफ इमरान खान और ताहिर उल-कादरी के विरोध-प्रदर्शनों से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थितियों को पाकिस्तान की सेना सरकार के फैसलों में दखल देने के लिए ज्यादा अनुकूल पाती है और मनमानी से बाज नहीं आती। संघर्ष विराम के उल्लंघन की ताजा घटनाओं से भी यह जाहिर होता है। पर बातचीत का दरवाजा बंद करना किसी समस्या का समाधान नही है। बैठक से कुछ हासिल होता या नहीं, बातचीत का क्रम चलने से पाकिस्तान की लोकतांत्रिक शक्तियों और कूटनीतिक प्रकियाओं को बल मिलता है। कम विवादास्पद मसलों पर कुछ प्रगति होती है और ज्यादा संवेदनशील मामलों के भी बातचीत से सुलझने की उम्मीद जगती है। जबकि बातचीत बंद कर देने से कट््टरपंथी ताकतों को ही बल मिलता है। यह बात दोनों तरफ लागू होती है। नवाज शरीफ की मां के लिए मोदी की तरफ से भेजे गए उपहार पर शिवसेना ने कैसा तंज कसा था! क्या बैठक रद््द करने के पीछे संघ परिवार को खुश करने की मंशा रही होगी? क्या पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आने की मुद्रा अख्तियार कर आगामी विधानसभा चुनावों में उसे भुनाने का गणित भी काम कर रहा होगा? भाजपा की रणनीति जो हो, बैठक रद््द करना दूरंदेशी भरा कदम नहीं है।
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शरीफ का संकट
Mon, 01 Sep 2014
राजनीति के जरिये जब उन्माद को हवा दी जाती है तो वैसा ही कुछ होता है जैसा इन दिनों पाकिस्तान में हो रहा है। इमरान खान और मौलाना ताहिर उल कादरी जिन मांगों को लेकर संसद की घेरेबंदी किए हुए हैं उनका समर्थन नहीं किया जा सकता। यह आश्चर्यजनक है कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मौलाना कादरी और इमरान खान की अतार्किक मांगों के समक्ष असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं। यह समझना कठिन है कि यदि चुनावों में धांधली हुई थी तो उसके लिए नवाज शरीफ को जिम्मेदार क्यों ठहराया जा रहा है? सवाल यह भी है कि इमरान खान को एक साल बाद यह याद क्यों आया कि चुनाव में धांधली हुई थी और उसके चलते उन्हें नुकसान उठाना पड़ा? अगर यह मान भी लिया जाए कि धांधली हुई थी तो उसके लिए तत्कालीन सरकार को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। इमरान खान की तरह से ताहिर उल कादरी की ओर से यह जो दलील दी जा रही है कि नवाज शरीफ के इस्तीफा देने से देश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा उसका भी औचित्य समझना कठिन है। मौजूदा हालात में पाकिस्तानी सेना जिस तरह सक्त्रिय और प्रभावी नजर आ रही है उससे न केवल नवाज शरीफ एक कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में उभर आए हैं, बल्कि पाकिस्तान में लोकतंत्र भी डांवाडोल दिखने लगा है। यह आश्चर्यजनक है कि संसद में पर्याप्त समर्थन के बावजूद नवाज शरीफ संकट से निपटने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इससे अधिक विचित्र और क्या होगा कि जो नवाज शरीफ यह कह रहे थे कि उनके सत्ता में आने के बाद हुकूमत नागरिक सत्ता की ओर से संचालित होगी वह सेना की सहायता लेने के लिए मजबूर हैं। उन्होंने दावा किया था कि मौजूदा संकट को हल करने में सेना ने अपने स्तर पर हस्तक्षेप किया है, लेकिन सेना ने यह स्पष्ट किया कि उसने प्रधानमंत्री के कहने पर ही हस्तक्षेप किया है।
फिलहाल यह कहना कठिन है कि नवाज शरीफ सरकार के समक्ष जो संकट उत्पन्न हो गया है उसका समाधान किस तरह से होगा और समाधान के बाद नवाज शरीफ राजनीतिक तौर पर पहले जितने सक्षम नजर आएंगे या नहीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पाकिस्तान में जब-जब सेना प्रभावी होती है तब-तब भारत की समस्याएं बढ़ जाती हैं। सीमा पर इन दिनों जैसे हालात हैं वे बिगड़ी हुई स्थितियों को ही बयान कर रहे हैं। इस संदर्भ में रक्षामंत्री अरुण जेटली ने यह बिल्कुल सही कहा कि पाकिस्तान की ओर से भड़काने वाली हरकतों को लगातार अंजाम दिया जा रहा है और सीमा पर हालात गंभीर हैं, लेकिन केवल पाकिस्तान के रवैये और उसके चलते सीमा पर बिगड़ी स्थिति को लेकर चिंता जताने से काम चलने वाला नहीं है। भारत का इस पर कोई जोर नहीं कि पाकिस्तान में स्थितियां कैसे सामान्य होंगी, लेकिन उसे सीमा पर हालात सामान्य करने में सक्षम होना ही चाहिए। यह ठीक नहीं कि तमाम प्रयासों के बाद भी सीमा पर अशांति और अराजकता की स्थिति बनी हुई है। मोदी सरकार कई मामलों में नए तरीके से काम करती दिख रही है। बेहतर होगा कि वह सीमा पर अशांति के मामले में भी नए दृष्टिकोण के आधार पर काम करे।
[मुख्य संपादकीय]
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विश्वास बहाली जरूरी
Mon, 01 Sep 2014
पिछले कई दिनों से सीमा पार पाकिस्तान से अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे करीब दो दर्जन गांवों में गोलाबारी के कारण पलायन कर गए हजारों ग्रामीणों का अब धीरे-धीरे अपने घरों को लौटना अच्छी बात है। दोनों मुल्कों के कमांडर स्तर की बैठक के दौरान शुक्रवार को हुई वार्ता के बाद सीमा पर हालात सामान्य होने से लोगों ने राहत की सांस ली है। हालांकि लोगों को अभी भी पाकिस्तान की कथनी और करनी पर भरोसा नहीं है, लेकिन पिछले दो दिनों से सीमा पर बनी शांति से आरएसपुरा सेक्टर के अब्दुल्लिया, कोरोटाना, बस्ती, कोरोटाना बस्ती, विधि पुर सहित दर्जनों सीमांत क्षेत्रों में पिछले कई हफ्तों से बंद पड़े स्कूल और बाजार अब खुल गए हैं। इतना ही नहीं, धान की फसल के लिए मशहूर आरएसपुरा सेक्टर के किसानों के लिए कमांडर स्तर की बैठक के बाद बनी शांति से किसानों पर छा रहे आर्थिक संकट के बादल अब छंटने लगे हैं क्योंकि अब वह खेतीबाड़ी में जुट गए हैं। गोलाबारी से प्रभावित यह किसान लंबे समय तक खेतों में नहीं जा पा रहे थे, जिससे उनकी फसल खाद-पानी के लिए तरस गई थी। गोलाबारी से माल-मवेशी को भी काफी नुकसान हुआ था, लेकिन सरकार की ओर से किसानों को इसका कोई मुआवजा न देना सरकारी उदासीनता को ही दर्शाता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किसानों की रोजी रोटी खेतीबाड़ी व माल मवेशियों पर ही निर्भर है। हाल ही में विधानसभा में सीमांत क्षेत्र के लोगों को पांच-पांच मरले जमीन सुरक्षित स्थानों पर दिए जाने का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है। कारण, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि कब वह संघर्ष विराम का उल्लघंन कर गोलीबारी शुरू कर दे। अगर लोगों को सुरक्षित जगहों पर घर होंगे तो नि:संदेह वे शिविरों में ठहरने की बजाय अपने सुरक्षित घरों में रह सकेंगे। यही नहीं, केंद्र सरकार ने भी सीमांत क्षेत्रों में पक्के बंकर बनाए जाने की घोषणा की है, जिससे कम से कम जानमाल का नुकसान होगा। ये लोग आपातकाल स्थिति में घरों में दुबके रहने के बजाय बंकरों में शरण ले सकेंगे। सरकार को चाहिए कि सीमा पर पिछले कुछ माह से जो हालात बने हैं, उन्हें देखते हुए की गई घोषणाओं को जल्द मूर्त रूप दे जिससे किसानों में विश्वास कायम हो सके।
[स्थानीय संपादकीय: जम्मू-कश्मीर]
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साफ-सख्त जवाब
Sun, 31 Aug 2014
देर से ही सही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद करने को लेकर जो प्रतिक्रिया दी उससे यह और अच्छे से स्पष्ट हो गया कि विदेश नीति के मोर्चे पर अब भारत सरकार का रुख-रवैया पहले जैसा नहीं रहने वाला। प्रधानमंत्री की दो टूक प्रतिक्रिया के बाद पाकिस्तान को यह समझ आ जाए तो बेहतर है कि कश्मीर समस्या के संदर्भ में दो ही पक्ष हैं-एक भारत और दूसरा वह खुद। नि:संदेह इस समस्या का समाधान खोजते समय कश्मीरी जनता की अपेक्षाओं पर ध्यान देना होगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि पाकिस्तानपरस्त हुर्रियत नेताओं को कश्मीरी जनता का प्रतिनिधि मान लिया जाए। कश्मीरी जनता का मतलब केवल कश्मीर घाटी के लोगों से नहीं हो सकता। इस समस्या का समाधान खोजने में घाटी के साथ-साथ जम्मू और लद्दाख के लोगों की भावनाओं का भी ध्यान रखना होगा। इतना ही नहीं उस कश्मीर के लोगों की अपेक्षाएं भी जाननी होंगी जो पाकिस्तान के कब्जे में है। हालांकि पाकिस्तान ने एक बार फिर यह कहा है कि वह आगे भी हुर्रियत के नेताओं से बात करता रहेगा, लेकिन इसमें संदेह है कि उसे ऐसा करने का अवसर दिया जाएगा और यदि वह अपने रुख पर अड़ा रहेगा तो उससे कोई सार्थक बातचीत संभव हो सकेगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह ठीक कहा कि पाकिस्तान ने संबंध सुधारने की कोशिश को तमाशे में तब्दील कर दिया था, लेकिन विदेश सचिव स्तर की वार्ता कश्मीर समस्या के समाधान पर केंद्रित नहीं थी। विदेश सचिव स्तर की वार्ता तो दोनों देशों के बीच बातचीत शुरू करने की प्रक्रिया का एक पहला कदम भर थी। पता नहीं कैसे पाकिस्तान ने यह समझ लिया कि इस वार्ता के जरिये ही सभी गंभीर मामलों और यहां तक कि कश्मीर समस्या के समाधान पर चर्चा होने वाली है? उसकी इस गलतफहमी को दूर किया जाना आवश्यक हो गया था। पाकिस्तान जिस तरह हुर्रियत नेताओं से बातचीत पर जोर दे रहा है उसे देखते हुए उससे यह पूछा ही जाना चाहिए कि क्या वह भारत सरकार को अपने कब्जे वाले कश्मीर के नेताओं से बातचीत करने की अनुमति देने के लिए तैयार है? यदि नहीं तो वह किस अधिकार से हुर्रियत नेताओं से वार्ता करने में लगा हुआ था? हालांकि प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि वह पाकिस्तान से संबंध सुधार की कोशिश जारी रखेंगे, लेकिन इसमें संदेह है कि पाकिस्तान ऐसे माहौल का निर्माण करने में सक्षम होगा जिससे दोनों देशों के बीच कोई सकारात्मक बातचीत हो सके। अब ऐसे माहौल के आसार और भी धूमिल पड़ गए हैं, क्योंकि नवाज शरीफ बेहद कमजोर नजर आने लगे हैं। वह अपनी खुद की कुर्सी बचाने के लिए एक तरह से सेना की शरण में हैं। इन स्थितियों में भारत सरकार के लिए यह और अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह सीमा पर शांति कायम रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करे, क्योंकि पिछले कुछ समय से नियंत्रण रेखा और साथ ही अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर जैसे हालात उत्पन्न हो गए हैं उनसे यह नहीं लगता कि पाकिस्तान भारत से संबंध सुधारने के लिए इच्छुक है।
[मुख्य संपादकीय]
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अशांति का सिलसिला
Sun, 24 Aug 2014
जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जारी गोलीबारी अगर किसी साजिश का हिस्सा नहीं तो फिर पागलपन का परिचायक ही कही जाएगी। आखिर यह पागलपन नहीं तो और क्या है कि सीमांत क्षेत्रों के आबादी वाले इलाकों में रात-रात भर फायरिंग की जाए और लोगों को पलायन के लिए मजबूर किया जाए? यदि पाकिस्तानी सेना यह समझ रही है कि इस तरह की हरकतों से वह भारत सरकार पर दबाव बनाने अथवा अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने में सफल हो जाएगी तो ऐसा कुछ भी होने वाला नहीं। सीमा पर अशांति और अराजकता की स्थिति बनाए रखकर पाकिस्तान भारत को यही संदेश दे रहा है कि वह सही रास्ते पर आने के लिए तैयार नहीं। सीमा पर जैसी गोलीबारी हो रही है उसे देखते हुए यही कहा जाएगा कि यह अच्छा ही हुआ कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ होने वाली विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद कर दी। यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के बीच वार्ता के पहले पाकिस्तान की ओर से सीमा पर अशांति कायम की जाती हो अथवा किसी बड़ी वारदात को अंजाम दिया जाता हो। पिछले एक-डेढ़ दशक का अनुभव यही बताता है कि वार्ता के पहले सीमा पर कोई न कोई ऐसी स्थिति बन जाती है जो पाकिस्तान के प्रति भारत के भरोसे को तोड़ने वाली होती है। चूंकि भारत सरकार ने विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद कर दी इसलिए पाकिस्तान के पास शिकायत करते रहने के अलावा और कुछ नहीं बचा है।
फिलहाल यह कहना कठिन है कि सीमा पर युद्ध जैसे जो हालात पैदा कर दिए गए हैं वे सामान्य होंगे या नहीं, लेकिन पाकिस्तान को यह बताने की जरूरत है कि इस तरह की हरकतों से भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला और जहां तक सीमांत क्षेत्रों में संघर्ष विराम उल्लंघन की बात है तो उनका हल तभी संभव हो सकता है जब पाकिस्तान को वास्तव में मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। पाकिस्तान संघर्ष विराम का उल्लंघन कर सीमांत क्षेत्रों के लोगों और साथ ही सीमा की सुरक्षा के लिए डटे भारतीय जवानों के सामने कोई जोखिम न पैदा कर सके इसके लिए किसी ठोस रणनीति पर काम करने की जरूरत है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसके आसार कम ही नजर आते हैं कि संघर्ष विराम के आए दिन उल्लंघन की घटनाओं पर रोक लगेगी। संघर्ष विराम का उल्लंघन पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी रवैये को रेखांकित करने के साथ ही यह भी बताता है कि नवाज शरीफ सरकार दिन-प्रतिदिन निष्प्रभावी होती चली जा रही है। यह तो पहले ही स्पष्ट था कि नवाज शरीफ सरकार सेना के दबाव में है, लेकिन हाल की घटनाएं तो यही बताती हैं कि उसका अपनी ही सेना पर कोई जोर नहीं रह गया है। चूंकि भारत सरकार पाकिस्तान सेना से बात कर नहीं सकती और नवाज शरीफ सरकार से बात करने का कोई मतलब नहीं इसलिए भारत सरकार को यह देखना होगा कि सीमा पर शांति कैसे कायम रहे? संघर्ष विराम के उल्लंघन की लगातार घटनाओं के बाद नवाज शरीफ सरकार पर भरोसा करने का कोई आधार नहीं रह गया है। यह स्पष्ट है कि भारत सरकार को पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी रणनीति नए सिरे से निर्धारित करनी होगी।
[मुख्य संपादकीय]
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सुरक्षा सर्वोपरि
Sun, 24 Aug 2014
सीमा पार से भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करवाने की कोशिशों से पाकिस्तान बाज नहीं आ रहा है। उसका एक ही मकसद है कि आगामी विधानसभा चुनावों में खलल डालकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय में यह संकेत दिए जाए कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र महज एक दिखावा है। पाकिस्तान के नापाक मंसूबों की मिसाल विगत दिवस अखनूर तहसील के खौड़ ब्लाक में नियंत्रण रेखा पर स्थित भारतीय अग्रिम चौकी में खोदी गई सुरंग से लग जाती है। पाकिस्तान द्वारा सुरंग खोदे जाने की यह पहली कोशिश नहीं है। इससे पहले वर्ष 2012 में भी सांबा सेक्टर की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की ओर से सौ मीटर बारूदी सुरंग खोद दी गई थी। विडंबना यह है कि सीमा पर इस तरह की घटनाओं के वजूद में आने का सुरक्षा एजेंसियों को पता नहीं चल पाता कि दुश्मन घुसपैठ के क्या नए तरीके अपना रहा है। दुखद पहलू यह है कि एक तरफ सुरंग खोदकर घुसपैठ करवाने के प्रयास किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर आरएसपुरा, पुंछ सेक्टरों में गोलाबारी कर पाकिस्तान पिछले दो माह में दर्जनों बारी संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है। नतीजतन आरएसपुरा सेक्टर में तो आलम यह है कि करीब एक दर्जन गांव के लोग सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर चुके हैं। अगर यही हालात रहे तो किसानों की खरीफ की फसल तबाह होकर रह जाएगी, क्योंकि पाकिस्तान की ओर से यह गोलाबारी रिहायशी इलाकों में हो रही है और ये लोग भी अब वहां से पलायन करने को मजबूर हैं। आलम यह है कि वे खेतीबाड़ी और अपने मवेशियों को राम भरोसे छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर आ गए हैं। ऐसे में हजारों एकड़ भूमि पर लगी धान की फसल चौपट हो सकती है। सरकार को भी चाहिए कि वे स्थिति को देखते हुए पलायन कर रहे लोगों को तमाम सुविधाएं उपलब्ध करवाए। संबंधित इलाकों के नेताओं को भी चाहिए कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर गोलाबारी से प्रभावित लोगों की सुध लें क्योंकि सीमा से सैकड़ों लोग सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए हैं। सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह सीमा पर रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर रहने के लिए स्थायी रूप से जगह उपलब्ध करवाए ताकि वे सुरक्षित रह सकें।
[स्थानीय संपादकीय: जम्मू-कश्मीर]
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तमाशे का सही जवाब
Mon, 01 Sep 2014
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर पर होने वाली बैठक को रद करने का निर्णय लिया, क्योंकि पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने इस बैठक से पूर्व दिल्ली में हुर्रियत के नेताओं से मना किए जाने के बाद भी मुलाकात की। मोदी सरकार के इस कदम की कुछ राजनीतिक दलों और विदेश नीति के जानकारों के साथ ही लेखकों-स्तंभकारों के एक समूह ने आलोचना की है। यह दुखद है कि जम्मू-कश्मीर विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से वार्ता को बहाल किए जाने की बात कही। नेशनल कांफ्रेंस ने गलत तरीके से यह कहा है कि जम्मू- कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी बढ़ने का कारण मोदी द्वारा वार्ता को रोकने का निर्णय था। कुछ विपक्षी दलों ने कहा कि यदि हुर्रियत नेताओं के साथ पाकिस्तानी उच्चायुक्त की बैठक अनावश्यक थी तो उन्हें इसे नजरंदाज करना चाहिए था। इस बारे में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से यह कहा है कि हुर्रियत के साथ बैठक करके पाकिस्तान ने संबंधों में सुधार की प्रक्रिया को बाधित करने का काम किया है। आखिर देश की जनता को इन घटनाक्त्रमों को किस रूप में देखना चाहिए?
मोदी के निर्णय के प्रभावों को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम संक्षेप में इतिहास पर भी नजर डालें और जम्मू-कश्मीर में समस्याओं की प्रकृति को समझने की कोशिश करें ताकि पाकिस्तान और गलत जानकारी रखने वाले भारतीय समूह और लेखक बिरादरी अपने भ्रमों को दूर कर सके। जम्मू-कश्मीर ने अक्टूबर 1947 में भारत में विलय का निर्णय किया। यह तब हुआ जब पाकिस्तान द्वारा प्रेरित और संचालित कुछ जनजातीय आक्रांताओं ने इस राच्य पर हमला कर दिया। भारत में विलय के समझौते पर महाराजा हरी सिंह ने हस्ताक्षर किए, जैसा कि भारत में शामिल हुए अन्य राच्यों ने पूर्व में किया था। हालांकि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पृथक से यह भी स्वीकार किया कि महाराजा के निर्णय की पुष्टि के लिए राच्य में जनमत संग्रह कराया जाएगा। यह एक गलती थी। एक और बड़ी गलती नेहरू ने तब की जब उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन के सुझाव से प्रेरित होकर पाकिस्तानी अतिक्रमण का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में ले जाने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप इस अतिक्रमण के माध्यम से पाकिस्तान ने इस राच्य के एक तिहाई भूभाग को बलपूर्वक अपने हिस्से में मिला लिया। 1950 में स्वीकार किए गए भारतीय संविधान में इसे भारतीय राच्य का दर्जा दिया गया, लेकिन अनुच्छेद 370 के माध्यम से इसे एक विशेष राच्य का दर्जा दिया गया।
1951 में इस विशेष राच्य के लिए अलग संविधान सभा का गठन हुआ, जिसने 1956 में अलग संविधान का निर्माण किया। इसमें कहा गया कि यह राच्य भारत का एकीकृत हिस्सा होगा। इस विशेष दर्जे के साथ मसले को हल कर लिया गया। हालांकि पाकिस्तान इस बात पर अड़ा रहा कि राच्य के दर्जे का मसला अभी भी विवादित है। यह सही है कि कश्मीर मसला भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय बना हुआ है, लेकिन यह वैसा नहीं है जैसा कि पाकिस्तान कहता है। यह राच्य के उस भूक्षेत्र के संदर्भ में है, जिसे अवैध रूप से बलपूर्वक पाकिस्तान ने अपने कब्जे में ले रखा है। यह एक द्विपक्षीय समस्या है, जिसे शिमला समझौते और लाहौर घोषणा के तहत भारत को पाकिस्तान के साथ हल करना है। इसी तरह शिमला समझौते पर हस्ताक्षर के साथ ही इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका समय के साथ खत्म हो चुकी है। इसके अलावा राच्य के अंदर तथा केंद्र के साथ कुछ आंतरिक समस्याएं हैं। राच्य में कुछ राजनीतिक लोग स्वायत्तता चाहते हैं तो हुर्रियत जैसे कुछ लोग इसे भारत से अलग करने के पक्ष में हैं तो कुछ अन्य संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने के पक्ष में हैं। इन मुद्दों को भारत की आंतरिक राजनीतिक प्रक्रिया के तहत हल करना है। दुर्भाग्य से 1989 से कश्मीर में हिंसा और आतंकवाद शुरू हो गया, जिसके आंतरिक और वाह्य, दोनों पहलू हैं।
एक गलती यह भी हुई कि अलगाववादी संगठन हुर्रियत को पाकिस्तानी नेताओं और प्रतिनिधियों से भारत में मिलने दिया गया, पाकिस्तान और दूसरे अन्य देशों में जाने की अनुमति दी गई और उसे इस्लामिक देशों के संगठन ओआइसी को संबोधित करने दिया गया। नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि उन्होंने न केवल इस गलती को समझा, बल्कि घोषित किया कि यह देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है और भारत पाकिस्तान के साथ तब तक बातचीत नहीं करेगा जब तक कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ता के आधारभूत सिद्धांतों का पालन नहीं किया जाता है। कोई भी देश किसी विदेशी शक्ति को अलगाववादियों के साथ वार्ता की अनुमति नहीं देगा, लेकिन भारत यह गलती करता आया है। यदि कोई गलती पिछले 20 वषरें से होती आ रही है तो लोग इसे सामान्य बात समझने लगेंगे और इसमें सुधार पर सवाल उठाए जाएंगे तथा इसकी आलोचना होगी। यह आश्चर्यजनक है कि भारत की इस नरमी अथवा लचीलेपन का कोई परिणाम नहीं निकला, लेकिन सरकार की आलोचना करने वाले सदैव इसकी उपेक्षा करते रहे। यहां तक कि विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद होने के बाद भी पाकिस्तानी ने उच्चायुक्त हुर्रियत नेताओं से मुलाकात की। यदि पाकिस्तानी नेता और प्रतिनिधि लगातार ऐसा करते हैं तो भारत को पाकिस्तान से वार्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। इस निर्णय का यह मतलब नहीं है कि कूटनीतिक नियमों के तहत लंबे समय से चली आ रही वार्ता की प्रक्त्रिया को अलविदा कह दिया गया है। मोदी ने यह साफ किया है कि भारत वार्ता के पक्ष में है, लेकिन आतंकवाद और हिंसा मुक्त वातावरण जरूरी है।
मोदी की यह बात भी महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान ने दोस्ती की प्रक्रिया को तमाशे में तब्दील कर दिया। तमाशे की प्रवृत्ति रुकनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का यह कहना भी गलत है कि वार्ता रद करने के कारण राच्य की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी तेज हुई है। पाकिस्तान ऐसा करके आतंकवादियों को भारतीय सीमा में धकेलता है और विश्व समुदाय को संदेश देता है कि कश्मीर का मुद्दा अभी खत्म नहीं हुआ है और यह दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के साथ-साथ शेष दुनिया के लिए भी खतरनाक है। पिछले 20 वषरें में भारत की सरकारों ने ऐसा कोई भी निर्णय नहीं लिया, फिर भी गोलाबारी जारी रही। भारत की सरकारें यह तो कहती रहीं कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते, लेकिन उन्हें समय-समय पर बातचीत के दरवाजे भी खोले। मोदी ने इस नीतिगत कमजोरी को त्यागने के संकेत दिए हैं। विदेश सचिव की बातचीत रद करने का सख्त फैसला लेने के बाद उम्मीद की जाती है कि मोदी सरकार आगे भी ऐसे ही रुख का परिचय देगी। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह सरकार भारतीय जनता के साथ ही पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से भी सम्मान हासिल कर पाने में समर्थ नहीं हो सकेगी।
[लेखक विवेक काटजू, पाकिस्तान मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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पुराने दौर में पाकिस्तान
Mon, 25 Aug 2014
जून 2013 में पाकिस्तान ने घरेलू संदर्भ में एक राजनीतिक इतिहास रचा जब नवाज शरीफ ने चुनाव जीतने के बाद अपने मुख्य विरोधी और तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ जरदारी के जरिये प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इस तरह एक सरकार से दूसरे सरकार के हाथ में सत्ता का हस्तांतरण चुनाव के माध्यम से संपन्न हुआ, न कि पाकिस्तानी सेना की ताकत अथवा प्रभाव से। इस घटनाक्रम का बहुत उत्साहपूर्वक स्वागत किया गया और सामान्य रूप से इसकी व्याख्या यही की गई कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती की शुरुआत है। इससे अनुमान यही लगाया गया था कि पाकिस्तानी सेना अपनी बैरकों में वापस लौट जाएगी और वह बदली हुई परिस्थिति को स्वीकार करेगी।
हालांकि नवाज शरीफ सरकार के लिए पिछला वर्ष तमाम रूप में उथल-पुथल भरा रहा और चुनाव में मिली जीत के 14 महीने बाद अगस्त 2014 में पाकिस्तान एक बार फिर से राजनीतिक गतिरोध में घिर गया। राजधानी इस्लामाबाद में दो मार्च निकाले गए और इसका घेराव किया गया और वह भी दो नई राजनीतिक पार्टियों द्वारा। इसमें से एक पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी पीटीआइ है, जिसका नेतृत्व करिश्माई क्रिकेटर इमरान खान कर रहे हैं और दूसरी पार्टी पाकिस्तान अवामी तहरीक है, जिसका नेतृत्व कनाडाई मूल के मौलवी तारिक कादरी कर रहे हैं। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और पाकिस्तान अवामी तहरीक ने अपने हजारों प्रदर्शनकारियों के साथ 14 अगस्त को इस्लामाबाद में मार्च निकाला और मांग रखी कि चुनावों में धांधली और अप्रभावी शासन के कारण प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने पद से इस्तीफा दें। इस संदर्भ में मान्यता यह भी है कि पीटीआइ और पीएटी को रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय से अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन हासिल है। शरीफ सरकार जब से सत्ता में आई है, नागरिक सरकार और सेना प्रतिष्ठान के बीच तनाव गहराता गया, जिससे प्रधानमंत्री शरीफ की चुनौतियां बढ़ीं। शरीफ को समर्थन दे रहीं अन्य सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों, जिनमें जरदारी के नेतृत्व वाली पीपीपी भी शामिल है, ने उनके इस्तीफे की संभावनाओं को खारिज कर दिया है। पूर्व राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच मुलाकात पिछले दो दिनों की बड़ी राजनीतिक गतिविधि है। जरदारी अब राजनीतिक मध्यस्थ की भूमिका में हैं। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जारी रहने और विधायिका की पवित्रता के लिए अपनी पार्टी के समर्थन का इजहार किया। इस सबसे यही लगता है कि पाकिस्तान का समूचा राजनीतिक परिदृश्य पीटीआइ और पीएटी के खिलाफ है और इमरान खान के अल्टीमेटम को दरकिनार कर दिया गया है। 23 अगस्त की रात तक कोई भी सहमति नहीं बन सकी और असहज गतिरोध की स्थिति बरकरार है। प्रदर्शनकारी अभी भी राजधानी इस्लामाबाद में धरना-प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।
पिछले तीन वषरें में पाकिस्तान के सत्ता ढांचे में एक अन्य स्तंभ के रूप प्रासंगिकता रखने वाली पाक सेना और न्यायपालिका ने अभी तक कोई निश्चित रुख अख्तियार नहीं किया है। इन्होंने यही सलाह दी है कि राजनीतिक पार्टियों को विभिन्न आरोपों और शिकायतों के संदर्भ में पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान खुद तलाशना चाहिए। संकट में घिरे राष्ट्र को बचाने के लिए पाक सेना के प्रमुख जनरल शरीफ सबसे महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं। एक बात यह भी कि मौजूदा परिस्थितियों में सेना सत्ता पर नियंत्रण करने के पक्ष में संभवत: नहीं है। पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य नेतृत्व के मध्य किसी भी तरह की खींचतान अथवा उथल-पुथल का असर भारत पर पड़ेगा। पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति रह चुके जनरल मुशर्रफ पर विभिन्न मामलों, विशेषकर उत्तारी वजीरिस्तान में तालिबान के खिलाफ चलाए गए आपरेशन को लेकर अदालत में मुकदमा चल रहा है, लेकिन वर्तमान में दोनों शरीफ-प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख एक जैसे नहीं हैं। परंपरागत तौर पर पाकिस्तानी सेना भारत के संबंध में सरकार की नीतियों की संरक्षक अथवा सर्वेसर्वा होती है। इसका मतलब यही है कि परमाणु हथियारों का संचालन पाकिस्तानी सेना करती है और वह आतंकवाद का समर्थन भी करती है, जिससे नागरिक नेतृत्व को अलग-थलग रखा जाता है। बहुत थोड़े समय तक 1990 की शुरुआत में जब नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला तो सेना नागरिक नेतृत्व से हर वाह्य जानकारी को साझा करने लगी थी, लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक नहीं चली।
अपनी चुनावी जीत से उत्साहित और देश में बने माहौल को देखते हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जून के अंत में कहा था कि वह अपने कार्यकाल में नागरिक व सैन्य प्रतिष्ठान के बीच संतुलन कायम करने की पुरजोर कोशिश करेंगे। एक लिहाज से उनका इशारा यह था कि वह शासन के मामलों में सिविलियन सरकार की श्रेष्ठता कायम करेंगे, जैसा कि लोकतांत्रिक देशों में होता है। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने जनरल मुशर्रफ को अदालत से किसी तरह की छूट दिलाने से मना कर दिया और आइएसआइ के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर पत्रकार हामिद मीर का खुलकर समर्थन किया। पाकिस्तान सेना के लिए यह उसका अपमान था, लेकिन जनरल कयानी से लेकर जनरल शरीफ तक के समय में एक बड़ा बदलाव आ चुका था। एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद फौज को लेकर लोगों की धारणा बदल चुकी थी और रावलपिंडी सेना मुख्यालय बचाव की मुद्रा में खड़ा था। 26 मई को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को निमंत्रित किया। इस दौरान कोई भी विवादित मुद्दा नहीं उठाया गया। यहां तक कि हुर्रियत नेताओं से भी मुलाकात नहीं की गई। साफ था कि पाकिस्तान का नागरिक नेतृत्व भारत के प्रति अपने देश की नीतियों को तय करने की स्थिति में था। हालंकि यह सब अल्पकालिक साबित हुआ और 25 अगस्त को दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच होने वाली बैठक को रद कर दिया गया। हुर्रियत और कश्मीर मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया। नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी तेज हो गई और द्विपक्षीय तनाव बढ़ गया।
भारत के लिए पाकिस्तान को लेकर मुश्किल यही है कि वहां सत्ता के कई केंद्र हैं। इस प्रकार भारत के लिए सच्चाई यही है कि पाकिस्तान में इमरान खान और तारिक कादरी की तरफ से लोकतंत्र के लिए चुनौती अभी भी बनी हुई है। इससे पाकिस्तानी सेना का भारत विरोधी रुख और गहरा हुआ है और नागरिक सरकार की स्थिति बदल रही है। इस सबको देखते हुए मोदी सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती संप्रग सरकार की नीतियों को छोड़ने का संकेत दिया है। अब सरकार अधिक कठोर रुख अपनाएगी, जिसका परिणाम हमें आगे के कुछ महीनों में दिखेगा। जब तक इस्लामाबाद में उथल-पुथल बनी हुई है और नियंत्रण रेखा पर स्थिति तनावपूर्ण है, हमें ध्यानपूर्वक घटनाक्रम की सतत निगरानी करनी होगी।
[लेखक सी. उदयभाष्कर, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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पड़ोस का अफसोस
Sun, 24 Aug 2014
नीति
खुशहाल, अमन और तरक्की पसंद पड़ोस हर देश की जरूरत रहा है। इतिहास गवाह है कि जिनके पड़ोसी में ये सारी खूबियां रहीं हैं उन्होंने न केवल समृद्धि के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं बल्कि सौहार्द्र और भाई-चारे की मिसाल कायम की है। आधुनिक युग के विदेश नीति की आधारशिला ऐसे पड़ोसी को तलाशने और बनाने पर टिकी है। सभी जानते हैं कि पड़ोसी को मनमाफिक चुना नहीं जा सकता लिहाजा हमें उसे अपने अनुरूप बनाने और उसकी पसंद की तरह बनने की हर संभव कोशिश करनी होती है। इन्हीं गुणों वाले पड़ोसी को पाने के लिए पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंधों की खातिर शुरू से ही हम अपना बहुत कुछ दांव पर लगाते चले आ रहे हैं। अपनी फितरत के अनुसार विश्वासबहाली की हमारी हर पहल का जबाव वह विश्वासघात से देता चला आ रहा है।
नीयत
बड़े भाई के दायित्व को निभाने की नेक मंशा के साथ हम उसकी हर कारगुजारियों को माफ करके आगे बढ़ने की सोचते रहे हैं। शायद हर चीज की हद होती है। अब हमारा भी धैर्य जवाब दे चुका है। भारत के लाख मना करने के बावजूद दोनों देश के विदेश सचिव वार्ता से ठीक पहले पाकिस्तान ने कश्मीरी अलगाववादियों से बातचीत करके द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन किया। लिहाजा वार्ता को रद करके पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने के सिवा भारत के पास कोई चारा नहीं बचा। भारतीय संदर्भ में पुरानी कहावत है कि विनय न मानत जलधि जड़..।
नेमत
विदेश नीति और कूटनीति के कई जानकार भारत के इस कड़े कदम को सही ठहरा रहे हैं। उनका मानना है कि पाकिस्तान की नीयत को देखते हुए भारत का परंपरागत नरम और लचीला रवैया उचित नहीं है। कड़ा कदम उठाना तर्कसंगत है, लेकिन अंतत: विचार तो बड़े भाई को ही करना होता है। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होते और ऐसा भी नहीं किया जा सकता कि हर लिहाज से भारत के प्रतिकृति वाले पड़ोसी देश से कोई संबंध ही न रखे जाएं। ऐसे में जब दोनों देशों की अवाम रिश्तों में बेहतरी की पक्षधर है। बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान बातचीत के माध्यम से ही संभव हो सका है। लिहाजा पाकिस्तान को भी साफ नीयत और स्पष्ट मंशा के साथ आगे बढ़ना होगा। ऐसे में घरेलू और वाह्य मोर्चो पर एक समान संकट से घिरे पड़ोसी से रिश्ते बहाल करने की जुगत निकालना आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।
सियासी मजबूरी
पाकिस्तान से वार्ता को रद करना भारत की भी घरेलू राजनीतिक मजबूरी है। हालिया लोकसभा चुनावों में जम्मू में बेहतर प्रदर्शन करने वाली भारतीय जनता पार्टी की नजरें अब कश्मीर घाटी की चार से पांच उन सीटों पर लगी हैं जहां विस्थापित कश्मीरी पंडित मतदाताओं का रसूख है। 87 सदस्यों वाली विधानसभा में 44 से अधिक सीटों के लक्ष्य पर पार्टी ने बढ़ना शुरू कर दिया है। प्रवासी मतदाताओं पर आंख टिकाए इस पार्टी ने संसद के अंदर और बाहर कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी और उनके पुनर्वास का मसला जोरशोर से उठाया। भाजपा की इस रणनीति को प्रदेश की चार से पांच अहम सीटों पर पार्टी की मौजूदगी दर्ज कराने की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। अलगाववादियों द्वारा चुनाव का बहिष्कार करने की रीति पर अमल करने की दशा में कश्मीरी पंडितों के वोट कुछ चुनाव क्षेत्रों में पार्टी को बढ़त हासिल कराएंगे। अभी तक भाजपा को कश्मीर से किसी भी चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली है। इस तरह से प्रदेश और केंद्र में बहुमत की सरकार के लिए करने को बहुत कुछ होगा।
मसला और मिशन
कश्मीर का एक पक्षकार होने के बावजूद इस मसले पर पाकिस्तान की कोई संगठित नीति नहीं है। कम लोग जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघ की विवादों की सूची से जम्मू-कश्मीर को हटा दिया गया है। यह भारत की एक बड़ी जीत है, वहीं पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका। हालांकि पाकिस्तान इससे अन्जान होने का बहाना करता है और वैश्विक समुदाय को इस मसले में हस्तक्षेप करने के लिए कहता रहता है। हालांकि सात फरवरी, 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के कार्यालय ने स्पष्टतौर पर यह स्वीकार किया है कि इस मसले में उनकी बहुत सीमित भूमिका है। उन्होंने दोहराते हुए कहा है कि यदि हमारी जरूरत भी होगी तो इसके लिए दोनों तरफ से अनुरोध होनी चाहिए। द्विपक्षीय रूप से ही संयुक्त राष्ट्र इस मसले में दखल कर सकता है। भारत शुरू से ही ऐसी किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज करता आया है।
जनमत
क्या पाकिस्तान से प्रस्तावित वार्ता को रद करना मोदी सरकार का सही फैसला है?
हां 95 फीसद
नहीं 5 फीसद
क्या पाकिस्तान की नीयत को देखते हुए भारत का परंपरागत नरम रवैया उचित है?
हां 14 फीसद
नहीं 86 फीसद
आपकी आवाज
पाकिस्तान से बातचीत का सिलसिला खत्म कर अब भारत को आक्रामक तेवर दिखाने होंगे, क्योंकि पाक किसी शांति वार्ता से समझने वाला नहीं है। -सुमन भट्टाचार्या
वह किसी वार्ता से समझने वाला नहीं है। हमें सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने के साथ सार्थक प्रयास करने होंगे। -अमिताभ श्रीवास्तव
आजादी के बाद भी हम पाक की मनोदशा को समझने मे विफल रहे जब पाक का वजूद ही भारत विरोधी है तो उससे मित्रवत व्यवहार की कल्पना करना ही मूर्खता है। -परवेजअंसारी@जीमेल.कॉम
पाकिस्तान से तय वार्ता को रद करना मोदी सरकार का पाकिस्तान के गाल पर करारा तमाचा है। -कुणालराज@जीमेल.कॉम
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पाकिस्तान पर भारतीय पैंतरे में बड़ा बदलाव
Sun, 24 Aug 2014
भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त और कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के बीच बातचीत होने के परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच तय विदेश सचिव स्तरीय वार्ता रद हो चुकी है। भारत सरकार ने अपने इस कदम से पड़ोसी देश को यह कड़ा संदेश दिया है कि या तो आप अलगाववादियों से बात करें या फिर हमसे। अभी तक राजग सरकार की आलोचना करने वाले कई लोग यह दलील दे रहे हैं कि बातचीत रद करके भारत ने नवाज शरीफ के पद को पूरी तरह से कमजोर किया है। इससे पाकिस्तान के उन राजनीतिक तत्वों को नवाज पर हमला करने का हथियार मिल गया है जिन्हें भारत-पाक वार्ता में बहुत रुचि नहीं है। बहरहाल, भारत के इस कदम का द्विपक्षीय कूटनीतिक संबंधों पर बहुत गहरा असर पडे़गा जो हमेशा से ही घटना प्रवृत्त रहे हैं। भारत पाकिस्तान को यह संदेश देने में सफल रहा है कि एक साथ भारत और भारत विरोधी अलगाववादियों से खेल नहीं खेला जा सकता है। घरेलू मोर्चे पर अभी शरीफ की हालत पतली है। भ्रष्टाचार, खराब वित्तीय प्रबंधन और कई सारे अन्य कारणों से उनके खिलाफ लोग आंदोलित हैं। भारत के साथ कूटनीतिक बातचीत इन चुनौतियों से निपटने में बहुत अधिक योगदान करने वाली नहीं है।
इस सप्ताह भारत-पाकिस्तान संबंधों के बीच जो कुछ भी हुआ है, कम से कम उससे पाकिस्तान को यह कड़ा संदेश गया है कि भारत सरकार द्वारा कमजोरी और नरम रुख अख्तियार करने वाला दौर खत्म हो गया है। ज्यादा विस्तृत रूप में इस घटना को एक नए नजरिए से देखा जा सकता है। इस कदम से भारत ने एक ही झटके में तुष्टीकरण के उस दौर को खत्म कर दिया है जिसके चलते घरेलू मोर्चे पर बेहाल पाकिस्तानी नेताओं को हम अपनाते रहे हैं। पिछले सप्ताह कश्मीर पर मोदी के बयान में भी यह झलकता है। भारत के खिलाफ पाकिस्तान के छद्म युद्ध की भर्त्सना करने वाले इस बयान से स्पष्ट है कि भारतीय सीमा के भीतर अलगाववाद और आतंकवाद को बढ़ाने में सक्रिय पाकिस्तान से बातचीत नहीं हो सकती। 2013 में जब नवाज शरीफ सत्ता में आए थे तो उन्होंने भारत से बेहतर संबंधों की बात कही थी। व्यापक विरोध के बावजूद उन्होंने भारत को एमएफएन दर्जा दिए जाने की पहल की थी। आज उनकी विफलता पाकिस्तान के उन नेताओं के लिए एक इशारा होगी जो भारत के साथ गर्मजोशी भरे रिश्तों को देखना पसंद करते हैं। इससे कहीं न कहीं उनके मन में यह ख्याल आएगा कि अगर भारत के साथ संबंधों को आगे बढ़ना है तो अलगाववादियों के साथ संबंधों को खत्म करना होगा।
दोनों देशों के बीच संबंधों की बेहतरी के लिए ऐसी स्थिति में भारत को सीधे पाकिस्तानी सेना से बातचीत के क्रम को आगे बढ़ाना चाहिए जो इस्लामाबाद की भारत नीति को तय करती है। उल्लेखनीय है कि परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान दोनों देश कश्मीर पर एक तरह से बहुत आगे बढ़ चुके थे। लिहाजा रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय से बातचीत भारत को बेहतर फायदा पहुंचा सकती है।
अब यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की नीति ज्यादा से ज्यादा वास्तविकता की जमीन और सौदेबाजी पर केंद्रित होगी। बातचीत में समय गंवाने का उपक्रम नहीं होगा। इसके लिए जरूरी है कि भारत सरकार पाकिस्तान को लेकर अपने चिर-परिचित रुख में तब्दीली करे। पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा अलगाववादी नेताओं से न मिलने संबंधी भारत की हुक्मउदूली यह सर्वविदित तथ्य बताती है कि वे पाकिस्तान की चुनी सरकार की बात न मानकर पाकिस्तानी सेना के इशारों पर नाच रहे हैं। यह इस तथ्य का स्पष्ट द्योतक है कि सत्ता पर नवाज शरीफ की पकड़ कमजोर हो रही है और उनका भविष्य अनिश्चित है।
-प्रो उमा सिंह [पाकिस्तान विशेषज्ञ]
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खत्म नहीं होगी दोनों पक्षों के
दिलों की गर्मजोशी
Sun, 24 Aug 2014
मोदी के शपथ लेने के समय सचमुच यह आशा बंधने लगी थी कि शायद अब भारत-पाकिस्तान रिश्ते सामान्य हो जायेंगे। सारी दुनिया में मोदी की पहल की सराहना हुई थी। हालांकि पाकिस्तानी कट्टरपंथी हलकों में नवाज शरीफ की भारत यात्रा का विरोध हुआ था और बाद में यह भी सवाल उठाया गया कि पाकिस्तान को इस यात्रा से क्या मिला? लेकिन कुल मिलाकर पाकिस्तान और भारत के अवाम ने इसका खुले दिल से स्वागत किया। अपने पड़ोसियों को तवज्जो देने की मोदी की नीति की सराहना होने लगी। पाकिस्तानी जनता ने भी अपनी तमाम आशंकाओं को भुलाकर मोदी की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से की, जिन्होंने दिल्ली-लाहौर के बीच बस चलाई थी। दोनों देशों की जनता के मन में आपसी रिश्तों के दिन बहुरने की आशाएं-आकांक्षाएं छलांगें मारने लगीं, लेकिन अब वार्ता टूटने से तमाम आशाएं धरी की धरी रह गयी हैं।
दोनों तरफ की जनता की निराशा की वजह भी है। सबसे बड़ी वजह तो यही है कि दोनों देशों का विभाजन निहायत कृत्रिम है। हजारों वर्षो से एक साथ रही जनता को एक दिन अचानक मजहब के आधार पर आप दो देशों में बांट देंगे तो ऐसा ही होगा। बंटवारे के वक्त हुए खूनखराबे और चार-चार बार युद्धों में हजारों लोगों के मारे जाने के बावजूद दोनों देशों की जनता के आपस में एक-दूसरे के प्रति नफरत का भाव उतना नहीं है, जितना कि होना चाहिए। मसलन चीन और भारत के बीच 1962 में हुई लड़ाई के बाद आपसी रिश्तों की बर्फ 1978 में जाकर पिघलनी शुरू हुई लेकिन 1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध के तत्काल बाद वार्ता शुरू हो गयी थी और 2001 में मुशर्रफ आगरा भी आ गए थे। यानी दोनों देशों के रिश्ते वैसे हैं ही नहीं जैसे दो दुश्मन देशों के बीच होते हैं। सरकारों के स्तर पर भले ही पाकिस्तान हमारा दुश्मन हो लेकिन जनता के स्तर पर वह हमारा सहोदर है और रहेगा।
इसलिए जब भी भारत और पाकिस्तान के अवाम के आपसी रिश्तों की बात आती है, सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह की याद आती है, जिसके नायक पागल बिशन सिंह को अचानक बताया जाता है कि उसका गांव अब पाकिस्तान के हिस्से में चला गया है, इसलिए उसे हिन्दुस्तान जाना होगा क्योंकि वह मुसलमान नहीं है। तब वह नासमझ देश के बंटवारे पर एक अजीब-सी गाली निकालता है, जिसका कोई अर्थ नहीं है, और अंत में वह दोनों देशों की सरहद के बीचों-बीच प्राण त्याग देता है। बिशन सिंह की मौत वास्तव में भारत के बंटवारे पर एक करारा तमाचा है। इसलिए जब बर्लिन की दीवार गिरी और दोनों जर्मनियों को एक हो जाना पड़ा तो भारत-पाकिस्तान में भी यह आशा जगी कि एक दिन हम भी एक होंगे। यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी तक को यह कहते सुना गया कि एक दिन भारत और पाक भी एक हो सकते हैं।
जिन्ना ने जिस द्वि राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर सवार होकर पाकिस्तान का निर्माण करवाया था, वह अब ध्वस्त हो चुका है। खुद पाकिस्तान के भीतर अनेक तरह की राष्ट्रीयताएं सिर उठाती रहती हैं। उसे एक रखने के लिए कुछ न कुछ मुद्दा तो चाहिए। इसलिए वहां के कट्टरपंथियों को, वहां की फौज को इसी में अपना भला दिखता है कि भारत के साथ हमेशा एक तनातनी बनी रहे। कश्मीर ही वह मसला है, जिसके जरिये वे अमन की तमाम कोशिशों पर पानी फेर सकते हैं। यही वे बार-बार करते भी हैं। वरना जब दोनों देश कश्मीर को द्विपक्षीय मसला मान चुके हैं तो हुर्रियत नेताओं को बीच में लाने का क्या औचित्य है?
लेकिन दोनों देशों की सरकारें, फौजें और कट्टरपंथी जमातें चाहे जितनी कोशिश कर लें, अवाम की आशाओं पर पानी नहीं फेर सकतीं। हर साल वाघा बॉर्डर पर मोमबत्ती जलाने वाले, एक-दूसरे देश में जाकर नाटक करने वाले, गीत-संगीत की महफिल सजाने वाले, मुशायरे जमाने वाले, मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में आकर हंसने-हंसाने वाले, फिल्मों में काम करने वाले अदाकारों के हौंसले कभी कम न होंगे। साहित्य-संस्कृति ही है जो देश-काल से ऊपर उठकर जनता की आवाज को बुलंद करती है। इसलिए सरकारों के स्तर पर भले ही बातचीत ठहर गयी हो, लेकिन जनता के दिलों में गर्मजोशी हमेशा बनी रहेगी।
-डॉ गोविन्द सिंह [निदेशक, मानविकी स्कूल, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी]
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बातचीत का रास्ता
26-08-14
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेद बातचीत से सुलझाने चाहिए। बान की मून की टिप्पणी का संदर्भ भारत और पाकिस्तान के बीच विदेश सचिवों की बातचीत का रद्द होना है। इस बात में कोई शक नहीं है कि दोनों पड़ोसियों के पास आपसी मसले हल करने के लिए बातचीत के अलावा कोई विकल्प नहीं है। परमाणु हथियारों से लैस दो देश आपस में लड़ने की सोच नहीं सकते और वैसे भी दोनों के पास इतनी बड़ी और सुसज्जित सेनाएं हैं कि कोई देश दूसरे को किसी निर्णायक युद्ध में हराने की नहीं सोचेगा। दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला इसीलिए चलाया गया था कि संवाद का कोई सूत्र बना रहे और थोड़ी-बहुत ही सही, लेकिन संबंधों में सुधार की गुंजाइश भी रहे। दोनों देशों के समझदार और परिपक्व लोग यह मानते हैं कि दोनों देशों को व्यापार, संस्कृति और आम जनता के बीच संपर्क के रास्ते ज्यादा से ज्यादा खोलने चाहिए, ताकि परस्पर अविश्वास घटे और एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़े। इससे दुश्मनी और टकराव की आशंका कम होगी। भारत ने पाकिस्तान की शत्रुतापूर्ण नीतियों की वजह से काफी नुकसान उठाए हैं। सीधे युद्धों को छोड़ भी दिया जाए, तो पाकिस्तान आतंकवाद के जरिये जो अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ता रहा है, उससे ज्यादा बड़ा नुकसान हुआ है। भारत के विभिन्न इलाकों में अलगाववाद और हिंसा भड़काने में भी पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। हमारी रक्षा तैयारियों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की ओर से होने वाली हरकतों से बचाव के मद्देनजर होता है। इसके अलावा अगर पड़ोसी देश से संबंध अच्छे हों, तो आर्थिक तरक्की की रफ्तार तेजी से बढ़ सकती है। भारत ने जितना खोया है, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान ने भारत से दुश्मनी में नुकसान उठाया है। पाकिस्तान की तमाम नीतियों का केंद्र भारत विरोध है, नतीजतन पाकिस्तान में न तो स्थिर राजनीतिक व्यवस्था बन पाई, और न ही कायदे की अर्थव्यवस्था की नींव पड़ पाई। आजादी के बाद से पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है और उसकी अर्थव्यवस्था दिवालियेपन के कगार पर है। समस्या यह है कि इस सबके बावजूद पाकिस्तान में ऐसे तत्वों का वर्चस्व है, जिनके निहित स्वार्थ भारत विरोध से जुड़े हैं और वे भारत के साथ अच्छे संबंध नहीं चाहते। सेना, कुछ राजनेता और कट्टरवादी समूहों की यह कोशिश होती है कि भारत के साथ रिश्ते हमेशा खराब रहें और इसीलिए जब भी भारत के साथ संबंध सुधारने की पहल होती है, वे ऐसा कुछ कर देते हैं कि स्थिति फिर खराब हो जाती है। इनके दबाव की वजह से ही भारत-पाकिस्तान बातचीत अक्सर दिशाविहीन हो जाती है। कुछ समस्या भारत की ओर से भी होती है कि कभी-कभार घरेलू राजनीतिक दबावों या नीति में कुछ भ्रम या रुकावटें होने से बातचीत भटक जाती है। इसके बावजूद बातचीत का सूत्र बने रहना महत्वपूर्ण है और बातचीत बिल्कुल बंद हो जाना कई मायनों में अच्छा नहीं है। बातचीत का रास्ता बंद हो जाने का सबसे बड़ा संकट यह है कि फिर उसे शुरू करने में काफी समस्याएं आती हैं। फिलहाल हम नहीं जानते कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत कब और कैसे शुरू हो पाएगी। जिस मुद्दे पर बातचीत बंद की गई है, वह मुद्दा तो इतनी जल्दी हल होने वाला नहीं है। हालांकि यह भी तय है कि फिलहाल पाकिस्तान सरकार खुद इस हाल में नहीं है कि कोई स्पष्ट फैसला या नीति-निर्धारण कर सके। भारत सरकार ने बातचीत न करने का फैसला करके एक बड़ा कदम उठाया है, देखना यह है कि इसके बाद वह क्या कदम उठाती है।
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कश्मीर समस्या और अतीत की भूलें
प्रभु जोशी
जनसत्ता 16 अगस्त, 2014 : जब भी इतिहास से मुठभेड़ होती है, हम हमेशा उसको दुरुस्त करने की कोशिश में भिड़ जाते हैं। अब जबकि देश में फिर से कश्मीर विवाद को बहस में लाया जा रहा है, हमें उसके अतीत कोे एक बार खंगाल लेना जरूरी है। खासकर तब तो यह और जरूरी हो जाता है, जब वहां के मुख्यमंत्री इतिहास और निकट अतीत को भुला कर भारतीय संविधान को एक फटी-पुरानी पोथी की तरह खारिज करने वाले अंदाज में अपना भाषण दे रहे हों।
अमूमन मान लिया जाता है कि जम्मू-कश्मीर की समस्या 1947 के बाद शुरू हुई, जबकि हकीकत यह नहीं है। उसकी शुरुआत तो उसी समय हो गई थी, जब ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ ने जम्मू के महाराजा गुलाबसिंह के दरबार में एक ‘अंगरेज रेजीमेंट’ को दाखिल कराने की कूटनीतिक कोशिश की। लेकिन कंपनी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद इसमें विफल रही। पर जब कश्मीर के दूसरे राजा रणवीर सिंह की मृत्यु हुई तो अंगरेज फिर सक्रिय हुए और आखिरकार उन्होंने 1885 में अपना मंसूबा पूरा कर ही लिया। क्योंकि उन्हें किसी भी तरह गिलगित क्षेत्र को अपने अधीन करना था, ताकि वहां भविष्य में अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के लिए एक मुकम्मल और सर्वाधिक सुविधाजनक क्षेत्र उपलब्ध हो सके। अमेरिका के लिए सोवियत संघ को घेरने में इस क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेना बहुत कारगर युक्ति मानी जा रही थी। नतीजतन उन्होंने अपनी कूटनीतिक चालाकियों से गिलगित क्षेत्र को गिलगित एजेंसी के नाम पर सन 1889 में ‘प्रशासनिक नियंत्रण’ में ले लिया। क्योंकि इससे सिंधु नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिम तट का संपूर्ण पर्वतीय प्रदेश उनके अधीन आ गया।
इस सफलता पर वे प्रसन्न थे, लेकिन 1925 में प्रतापसिंह के उत्तराधिकारी के रूप में जब महाराजा हरिसिंह को षड्यंत्र की हकीकत समझ में आई तो उन्होंने अविलंब गिलगित क्षेत्र से अंगरेज सैनिकों को हटाया और अपने सैनिक तैनात कर दिए। यह उनकी समझ और सामर्थ्य भी थी कि उन्होंने यूनियन जैक उतार दिया।
इसी के समांतर 1930 में, जबकि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन देशव्यापी हो चुका था, भारत की राजनीतिक समस्या के संदर्भ में लंदन में गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया था। उसमें भारतीय नरेशों के प्रवक्ता और प्रतिनिधि के रूप में महाराजा हरिसिंह ने शिरकत की। उन्होंने जो वक्तव्य दिया, उसमें प्रस्तावित संघीय शासन में जम्मू-कश्मीर को शामिल किए जाने की पुरजोर वकालत की गई थी। जबकि अंगरेज यह चाहते ही नहीं थे, क्योंकि कश्मीर का गिलगित और उससे जुड़ा समूचा पर्वतीय क्षेत्र उन्हें अपने नियंत्रण में लेना था। परिणामस्वरूप वे क्रुद्ध हो गए। उन्होंने महाराजा हरिसिंह के खिलाफ व्यापक षड्यंत्र शुरू किया। औपनिवेशक कूटनीति के चलते शेख अब्दुल्ला की छवि उस समय कश्मीर में एक जन-आंदोलन के नेता की बना दी गई। अंगरेजों ने महाराजा हरिसिंह का मनोबल तोड़ने के लिए कुछेक विद्रोह भी करवाए, लेकिन वे हर बार विफल रहे। बाद में 1935 के मार्च में अंगरेजों ने गिलगित क्षेत्र के ‘प्रशासनिक सुधार’ की आड़ में उसे साठ वर्षों के पट्टे पर हथिया लिया। इसमें निश्चय ही शेख अब्दुल्ला का उपयोग एक शिखंडी की तरह किया गया था, क्योंकि उन्हें जन-आंदोलन का अग्रणी नेता बताया और बनाया जा रहा था। जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की खतरनाक चालाकियों को समझा ही नहीं, कि वे अंगरेजों का इस्तेमाल करते हुए अपनी आंखों में ‘स्वतंत्र कश्मीर का सुल्तान’ बनने का ख्वाब पाले हुए हैं। उन्होंने महाराजा हरिसिंह को कश्मीर से सत्ता छोड़ कर भागने को मजबूर करने के लिए ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ चलाया और जब महाराजा हरिसिंह के सामने इसके पीछे छिपी पूरी साजिश का नक्शा साफ हो गया, तो उन्होंने शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया। तभी नेहरू, जो शेख अब्दुल्ला के अभिन्न मित्र थे, कश्मीर पहुंचे और उन्होंने राजा हरिसिंह के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ की घोषणा कर दी। यह नेहरू की शेख अब्दुल्ला के समर्थन में राजनीतिक भविष्य की तरफ आंख मूंदकर चलने वाली ऐतिहासिक भूल थी। वे मैत्री के मुगालते में जी रहे थे। हालांकि महाराजा हरिसिंह ने नेहरू को बहुत स्पष्ट सलाह भी दी थी कि वे शेख अब्दुल्ला के पक्ष में सत्याग्रह करने के मंसूबे के साथ कश्मीर कतई न आएं, लेकिन नेहरू तब तक स्वतंत्रता सेनानी की एक राष्ट्रव्यापी छवि अर्जित कर चुके थे। और जिद पहले से ही उनके स्वभाव का हिस्सा रही आई थी। अत: उन्होंने महाराजा की सलाह को सामंतवादी तानाशाही धमकी मान कर एक सिरे से ठुकरा दिया और तत्काल कश्मीर में ‘सत्याग्रह’ करने पहुंच गए। महाराजा ने उन्हें गिरफ्तार करवाया और कश्मीर की सीमा से बाहर ले जाकर रिहा कर दिया। नेहरू ने अपने साथ किए गए इस व्यवहार के लिए, महाराजा के विरुद्ध मन में एक अमिट गांठ बांध ली और वे जीवन भर उस ग्रंथि से मुक्त नहीं हुए। और इसी ग्रंथि के चलते आजादी के बाद कश्मीर मसले को हल करने के लिए तैयार वल्लभ भाई को उन्होंने बरज दिया। वे इस उलझे हुए मसले को स्वयं निपटाने की जिद में थे। यह अपने उस अपमान की स्मृति ही थी, जो महाराजा ने उन्हें बंदी बना कर किया था। बाद इसके, 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, तो महाराजा हरिसिंह को यह स्पष्ट हो गया था कि गिलगित क्षेत्र को बचाए रखने के लिए हिंदुस्तान के साथ रहना जरूरी होगा। वैसे इसके पूर्व वे गोलमेज सम्मेलन में भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट कर चुके थे। लेकिन जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र काक हुआ करते थे, जिनकी पत्नी यूरोपियन थी और इसी वजह से काक के बहुत सूक्ष्म ताने-बाने अंगरेजों से मजबूत हो पाए थे। अंगरेजों ने काक को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया और महाराजा हरिसिंह को यह विकल्प गले उतारने के लिए तैयार कर लिया कि उन्हें न तो भारत में रहना चाहिए और न ही पाकिस्तान में। कश्मीर तो बस स्वतंत्र ही रहेगा। स्मरण रहे, ब्रिटिश सरकार ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के राजनीतिक हालात देख कर इस विकल्प के लिए महाराजा हरिसिंह को तैयार करने का एजेंडा रामचंद्र काक को सौंप रखा था। लेकिन नेहरू ने अपनी उसी पुरानी घटना की रोशनी में देखते हुए इसका अभिप्राय यह निकाला कि महाराजा हरिसिंह के अंदर उनके प्रति कोई स्थायी घृणा है और वही उनके ऐसे विकल्प की आधारभूमि बन रही है। उन्हें यह भी याद था कि उन्हें शेख अब्दुल्ला के समर्थन में ‘सत्याग्रह’ करने से न केवल रोका गया था, बल्कि बंदी बना लिया गया था। यह उन्हें स्वयं और शेख अब्दुल्ला के द्वारा किए जा रहे आंदोलन का अपमान लगा था। इसलिए जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया और मेहरचंद महाजन की मध्यस्थता से महाराजा हरिसिंह ने पाकिस्तान के आक्रमण के विरुद्ध भारत से मदद मांगी, जिसमें भारत में जम्मू-कश्मीर के विलय की बात थी तो नेहरू को अपनी तरफ से शेख अब्दुल्ला की मैत्री याद आई और उन्होंने प्रस्ताव किया कि इस विलय पत्र पर शेख अब्दुल्ला की भी स्वीकृति होनी चाहिए। वे जनप्रतिनिधि हैं। जबकि वल्लभभाई पटेल ने आजादी के बाद जितनी भी रियासतों का भारत में विलीनीकरण करवाया था, वहां किसी में भी किसी स्थानीय जननेता के हस्ताक्षर का कोई प्रावधान नहीं था। केवल रियासत के शासक के हस्ताक्षर होते थे, मगर शेख अब्दुल्ला के प्रति नेहरू के मोह ने कश्मीर को भारत के भविष्य की एक निरंतर सालने वाली फांस बनाने के बीज बो दिए। दरअसल, माउंटबेटन चाहते थे कि कश्मीर मसले को नेहरू द्वारा राष्ट्रसंघ वाली उलझन में डालने की वजह से भारतीय ‘सैनिक गतिविधि’ ढीली पड़ेगी और तब तक पाकिस्तान पूरा गिलगित क्षेत्र हथिया चुकेगा। नेहरू ने तब वहां तैनात सेना के ‘संचालन सूत्रों’ को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंप दिया। नेहरू को इसका तनिक भी पूर्वानुमान नहीं था कि यही इतिहास की सबसे बड़ी भूल साबित होगी। शेख अब्दुल्ला की मैत्री पर उन्हें अटूट विश्वास था। लेकिन सैन्य सूत्र के अपने हाथ में आते ही शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर की घाटी हमलावरों से खाली हो चुकने के बाद भी मीरपुर, कोटली, पुंछ और गिलगित क्षेत्र में भारतीय सेना को आगे नहीं बढ़ने दिया। चूंकि माउंटबेटन के साथ शेख अब्दुल्ला की चुपचाप एक दूसरी ही खिचड़ी पक रही थी। दरअसल, ब्रिटिश उस क्षेत्र को एक दूरगामी कूटनीतिक संभावना की तरह देख रहे थे। नतीजतन पहले मीरपुर फिर कोटली, मिम्बर, देवा, बुराला आदि का पतन हो गया और जम्मू क्षेत्र की सुरक्षा के सामने खतरा खड़ा हो गया। नेहरू शेख अब्दुल्ला और माउंटबेटन के बीच की इस ‘दुरभि-संधि’ को तब समझ ही नहीं पाए और संयुक्त राष्ट्रसंघ के निर्देश पर भारत ने 2 जनवरी 1949 को इकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर दी। यहां याद दिलाना जरूरी होगा कि तत्कालीन राजनीतिक टिप्पणीकारों ने कश्मीर मसले को राष्ट्रसंघ में ले जाने की नेहरू की इस तत्परता को स्वयं को ‘शांतिदूत की छवि’ में देखने का व्यामोह कहा था। इसके कारण गिलगित जैसे सामरिक महत्त्व के क्षेत्र का एक तिहाई से कुछ अधिक भाग पाकिस्तान के कब्जे में रह गया; जो हमारे हलक का कांटा बन गया। शेख अब्दुल्ला ने नेहरू से अपनी तथाकथित मैत्री को भुनाते हुए भारतीय संविधान सभा से जम्मू-कश्मीर को ‘विशेष दर्जा’ देने वाला घातक अनुच्छेद पारित करवाया, जबकि एक गहरे राजनीतिक भविष्यद्रष्टा की तरह इस अनुच्छेद को देखते हुए आंबेडकर इसके विरुद्ध थे। शेख अब्दुल्ला इस अनुच्छेद के चलते भविष्य में कश्मीर के सर्वेसर्वा बन गए और बाद में ‘स्वतंत्र कश्मीर’ का स्वप्न साकार करने की कुटिल योजना अपने जेहन में पालते रहे। कहना न होगा कि इस अनुच्छेद ने कश्मीर में एक स्थायी अनिश्चितता को जन्म दिया, जो कि शेख अब्दुल्ला चाहते ही थे। याद कीजिए कि इसे एक ‘अस्थायी और संक्रमणकालीन व्यवस्था’ घोषित करके पारित करवाया गया था। दरअसल, नेहरू की आंखें तो तब खुलीं, जब डॉ कैलाशनाथ काटजू- जो भारत के तत्कालीन गृहमंत्री थे- और जीके हांडू ने शेख अब्दुल्ला के ब्रिटिश एजेंट होने संबंधी दस्तावेज और नेहरू का एक महत्त्वपूर्ण गोपनीय पत्र, जिसे दिल्ली पुलिस ने बरामद किया था, उनके समक्ष रखा, तो उन्होंने 9 अगस्त 1957 को शेख अब्दुल्ला को अपदस्थ करके राष्ट्रद्रोह के अपराध में बंदी बना लिया। इससे घाटी में शेख अब्दुल्ला की साख पर बट््टा लग गया। इसके बाद इतिहास को दुरुस्त किया जा सकता था, लेकिन नवस्वतंत्र राष्ट्र की एक किस्म की जनतांत्रिक भीरुता ने उस अनिश्चितता को खत्म करने में लगातार जो हिचकिचाहट प्रदर्शित थी, वह नासूर की तरह आज भी मौजूद है।
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नसीब नहीं बदल सकते हम
Sun, 07 Sep 2014
इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि हर देश अपने पड़ोस में अमन चैन चाहता है। अगर पड़ोसी देश अशांत और अस्थिर हो तो अराजकता का लावा बहकर सरहद पार देर-सबेर उसे भी अपनी चपेट में ले लेगा। अत: यह सुझाना तर्कसंगत है कि भारत का राष्ट्रहित इसी में है कि पाकिस्तान टूटे नहीं, कमजोर न होता जाए और उसकी पहचान एक असफल राज्य के रूप में स्थापित न हो। कड़वा सच यह है कि अब तक यह साफ हो चुका है कि एक राष्ट्र-राज्य के रूप में पाकिस्तान पूरी तरह असफल है। एक मजहबी राज्य के रूप में उसका गठन भारत को विभाजित कर किया गया था पर महज मजहब उसे एक रखने में असमर्थ रहा। पूर्वी पाकिस्तान नाम से जाने जाना वाला भूभाग हमेशा बहुसंख्यक आबादी वाला होने के बावजूद एक उपनिवेश जैसा शोषित, उत्पीड़ित और उपेक्षित रहा। 1971 में एक रक्तरंजित मुक्ति संघर्ष के बाद वह अलग हो गया। पख्तूनों, बलूचों और सिंधियों में सुगबुगाते हिंसक अलगाववाद के विस्फोट खतरनाक ढंग से होते रहे हैं। पाकिस्तान में तख्तानशीन फौजी तानाशाही बचे खुचे क्षेत्र की एकता को बरकरार रखने के लिए निर्मम बल प्रयोग का सहारा बरसों से लेती आ रही है। हालात न जाने कब से काबू से बाहर हो चुके हैं। पाकिस्तान की सरकार को यह सबसे आसान लगता है कि अपनी लाचारी छुपाने के लिए देश के बाहे दुश्मन तलाश उसकी तरफ अंगुली उठाए। इसीलिए भारत उसके निशाने पर रहता है। कई बरस पहले ही यह जगजाहिर हो चुका था कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नाकाम और जर्जर हैं। इसमें सुधार असंभव है। परजीवी पाकिस्तान सिर्फ अमेरिका और कुछ तेल संपदा संपन्न इस्लामी देशों की मेहरबानी से जीवनयापन करता रहा है। कभी 'बाईस खानदान' पाकिस्तान के तमाम संसाधनों पर काबिज समझे जाते थे तो बाद में सेना के जनरल और बड़े जमीदारों- गिने चुने कारोबारियों के गठजोड़ ने उनकी जगह ले ली। शीत युद्ध के वर्षो में अमेरिकी आर्थिक सहायता की बैसाखी ने पाकिस्तान के शासक वर्ग को बेफिक्र रखा तो बाद में लीबिया से पहुंचने वाले पैट्रो डॉलरों ने! सबसे चिंताजनक बात जनरल जिया के शासनकाल से आरंभ कट्टरपंथी इस्लामीकरण है। अफगानिस्तान से 'नास्तिक' साम्यवादियों को खदेड़ने के लिए अमेरिका ने तालिबान की जो फसल पाकिस्तान की जमीन पर उगाई वह आज रक्तबीजी बन चुकी है। कभी सर्वशक्तिमान समझी जाने वाली पाकिस्तानी फौज तथा गुप्तचर संस्था आइएसआइ तक उसके सामने घुटने टेक चुके हैं। यह नजर आ रहा है कि वह उग्र हमलावर जिहादी उपद्रवियों के साथ 'जियो और जीने दो' की नीति अपनाने को मजबूर हैं। अफगानिस्तान से बहकर आने वाले लावे ने पाकिस्तान का कायाकल्प कर डाला है। पेशावर, रावलपिंडी में विदेशी शरणार्थियों की मलिन बस्तियों में मादक पदार्थो और हथियारों की तस्करी बेकाबू हो चुकी है। संगठित अपराध माफियाओं पर अंकुश लगाने में पाकिस्तानी असमर्थ हैं। सेना के जिहादी मानसिकता वाले सिपाहियों और अफसरों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाले पाकिस्तानी तत्वों ने इस बात का पर्दाफाश अनायास कर दिया था कि पाकिस्तान सरकार कितना लाचार है। उसके बाद से अमेरिका चालक रहित ड्रोन विमानों के लगातार हमलों से पाकिस्तानी संप्रभुता की धच्जियां उड़ाता रहा है। जरा सोचिए कि क्या संप्रभुताविहीन कोई भी राज्य अपने अस्तित्व को बरकरार रख सकता है? बस अब तक भारत की सरकार ही यह भरम पाले रही है कि पाकिस्तान के साथ संवाद सार्थक है। लिहाजा किसी भी कीमत पर इसे जारी रखना चाहिए क्योंकि स्थिर, शांत, खुशहाल पाकिस्तान हमारे अपने हित में है। उसकी असफलता हमारे लिए बड़ा जोखिम खड़ा कर सकती है। दस साल तक संप्रग सरकार यही रट लगाए रही। भाव विह्वल पंजाबी शरणार्थी मानसिकता की नुमाइश करते मनमोहन सिंह यही रट लगाए रहे कि 'हम अपने पड़ोसी चुन नहीं सकते!' उन्हें यह बात समझ नहीं आ सकी कि भारत लाख चाहे वह ना तो पाकिस्तान की खुशहाली की गारंटी ले सकता है न उसकी एकता-अखंडता की। इकतरफा रियारतों वाली पहल के नतीजे सामने आ चुके हैं। लगातार आतंकवादी हमलों और सीमा पर पर घुसपैठ की शक्ल में। चीन के साथ मिलकर भारत की घेराबंदी में पाकिस्तान कभी चूकता नहीं और न ही अपनी जमीन ने भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले आतंकवादियों को पनाह देने में कसर करता है। हाल में अरब दुनिया-पश्चिम एशिया में कट्टरपंथी इस्लाम के उफान और गाजा पट्टी में सैनिक संघर्ष ने हालात और खराब कर दिए हैं। 'खिलाफत' की स्थापना के एलान के बाद यह लगभग असंभव लगता है कि पाकिस्तान कभी संभल, सुधर सकता है। आसार यही नजर आते हैं कि क्रमश: उसका विखंडन और बिखराव तेज होता जाएगा। शहरों तक सीमित मुखर नागरिक समाज और 'निर्वाचित' सरकार या 'स्वाधीन' न्यायपालिका की बात करना आज के पाकिस्तान के संदर्भ में बेकार है। इसे आत्मघातक नादानी से इतर कुछ नहीं समझा जा सकता। हमारी राय में हमारी चाहत से पाकिस्तान के नसीब बदल नहीं सकते। हमारा यह पड़ोसी लाइलाज बीमारी का शिकार है। समझदारी इसी में है कि राष्ट्र-राज्य के रूप में उसे असफल मानते हुए, वहां की अराजकता, उथल-पुथल का आकलन कर हम अपने राष्ट्रहित निरापद रखने के लिए कमर कसें। यह भी बेहद जरूरी है कि भारत की पाकिस्तान नीति स्वदेश में चुनावों-उपचुनावों में वोटबैंक को भुनाने की मानसिकता से तत्काल छुटकारा पाए।
-प्रो पुष्पेश पंत [स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू]
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राहत और सरहद
08-09-14
प्रकृति के लिए इंसान की बनाई हुई सरहदें कोई मायने नहीं रखतीं। जब भी कोई प्राकृतिक घटना घटती है या आपदा आती है, तो वह याद दिलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप एक भौगोलिक इकाई है। जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ ने भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य और पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर, दोनों को एक साथ प्रभावित किया है, बल्कि भारी बारिश और कश्मीर से निकलने वाली नदियों में पानी बढ़ जाने से पाकिस्तान के पंजाब सूबे में भी भारी बाढ़ आई है। भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर की बाढ़ को राष्ट्रीय स्तर की आपदा घोषित कर दिया है और सेना को राहत-कार्यों में लगा दिया है। कश्मीर में श्रीनगर शहर के कई इलाकों में इतना पानी घुस गया है कि डल झील और शहर में फर्क करना मुश्किल हो गया है। पहाड़ी इलाकों में राहत-कार्य करना यों भी मुश्किल होता है, भू-स्खलन की वजह से सड़क संपर्क टूट जाता है और पहाड़ों पर पानी के तेज बहाव की वजह से जान-माल की हानि को रोकना बहुत मुश्किल और जोखिम भरा हो जाता है। जम्मू-कश्मीर में लगभग 200 लोगों के मरने की आशंका है और पाक अधिकृत कश्मीर से जो खबरें मिल रही हैं, उनके मुताबिक वहां भी काफी लोग मारे गए हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने भारत और पाकिस्तान के बीच टूटे हुए संवाद के सूत्र को फिर से जोड़ने का काम किया है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को चिट्ठी लिखकर उन्हें अपनी ओर से हर संभव सहायता का प्रस्ताव किया है। जवाब में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारतीय प्रधानमंत्री से अपनी ओर से जम्मू-कश्मीर में सहायता का प्रस्ताव भेजा है। जाहिर है, ये दोनों ही प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाएंगे। पाकिस्तान में कितनी ही बड़ी आपदा आ जाए, वहां की सरकार भारत सरकार की सहायता नहीं स्वीकार करेगी, क्योंकि उससे उसके अलोकप्रिय होने का खतरा होगा। जब कुछ साल पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में जबर्दस्त भूकंप की वजह से बड़े पैमाने पर तबाही मची थी, तब भी पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार का सहायता का प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया था। पाकिस्तान सरकार भूकंप प्रभावित लोगों को मदद देने में नाकाम रही थी, और जो कुछ सहायता लोगों को मिल रही थी, वह कुछ कट्टरवादी-आतंकवादी गुटों से जुड़े स्वयंसेवी संगठनों से आ रही थी। पाकिस्तान को यह भी डर होता है कि अगर भारतीय राहत सामग्री और कार्यकर्ता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पहुंच गए, तो वे काफी ऐसी जानकारी पा जाएंगे, जो पाकिस्तान नहीं चाहता कि भारत के पास पहुंच जाए। अगर दोनों देशों के संबंधों के पेच छोड़ भी दिए जाएं, तो पाकिस्तान के मुकाबले भारत बहुत बड़ा देश है और उसकी अर्थव्यवस्था भी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था से कई गुना बड़ी है। भारत के पास इतने संसाधन हैं कि वह पाकिस्तान की मदद कर सके, जबकि पाकिस्तान के पास संसाधनों का अभाव है। लेकिन राजनीति मदद स्वीकारने नहीं देती। अगर दोनों देश मिल-जुलकर राहत का काम करें, तो वह काफी आसान हो जाएगा और जनता को मदद भी ज्यादा व जल्दी मिलेगी। भारत के प्रशासनिक तंत्र में काफी कमियां हैं, किंतु यहां व्यवस्था काम करती है। पाकिस्तान का प्रशासनिक तंत्र लगभग ध्वस्त स्थिति में है, ऐसी परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर की ओर से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर तक राहत पहुंचाना ज्यादा व्यावहारिक और फायदेमंद होगा। प्रकृति तो राजनीति की फिक्र नहीं करती, लेकिन राहत के रास्ते में तो राजनीति का आना तय है, खासकर अगर भारत-पाकिस्तान का सवाल हो।
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नापाक नीति
Tue, 16 Sep 2014
ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने संबंध सुधारने की दुहाई के साथ ही भारत को चिढ़ाने वाली हरकतों को अपनी नीति का स्थायी अंग बना लिया है। अगर ऐसा नहीं होता तो नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित की ओर से यह नहीं कहा जाता कि हाफिज सईद के खिलाफ अदालतों में कोई मामला नहीं है और वह आजाद नागरिक की तरह घूमने को स्वतंत्र है। यह वही अब्दुल बासित हैं जो दो दिन पहले बातचीत के दरवाजे खुले रखने की वकालत कर रहे थे। इसके पहले वह हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं से बातचीत को अपना अधिकार बता रहे थे। इस पर हैरत नहीं कि भारत सरकार ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त के बयान पर आपत्तिदर्ज कराई और हाफिज सईद को मुंबई हमले का षड्यंत्रकारी बताते हुए उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की, लेकिन यह काम पहले भी हो चुका है और सब जानते हैं कि नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। भारत सरकार को अब यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान न तो आतंकी सरगना हाफिज सईद के खिलाफ कोई कार्रवाई करने वाला है और न ही उन आतंकियों के खिलाफ जिन पर मुंबई हमले की साजिश में शामिल होने का आरोप है, क्योंकि उनके खिलाफ चल रहे मामले की सुनवाई लगातार टल रही है। अब तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में किसी की भी इसमें दिलचस्पी नहीं कि इन आतंकियों के खिलाफ चल रहा मामला आगे बढ़े। दिलचस्पी का अभाव पाकिस्तान की न्यायपालिका में भी नजर आता है, क्योंकि बार-बार उन्हीं घिसे-पिटे बहानों की आड़ में अदालती कार्यवाही टाल दी जाती है जो न जाने कितनी बार दोहराए जा चुके हैं। यह भी जगजाहिर है कि इन आतंकियों और साथ ही हाफिज सईद के खिलाफ पाकिस्तान को जो तमाम सुबूत उपलब्ध कराए गए उन्हें भी मान्यता देने से इन्कार किया जा रहा है। इन सबके अतिरिक्त मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों के खिलाफ कार्रवाई में आनाकानी का एक प्रमाण यह भी है कि पाकिस्तान की ओर से उन संदिग्ध तत्वों की आवाज के नमूने नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं जिन्हें लेकर भारत को यकीन है कि उन्होंने मुंबई हमले की साजिश को अंजाम दिया। इसका कोई मतलब नहीं कि पाकिस्तान मुंबई हमले के षड्यंत्रकारियों को लेकर अपने रवैये को बार-बार दोहराता रहे और भारत भी उस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहे। पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत को कुछ नए उपाय करने ही होंगे, क्योंकि वह हर उस मामले में इन्कार भरे रवैये के साथ सामने आ रहा है जिनमें भारत कोई कार्रवाई होते हुए देखना चाहता है। पाकिस्तान जिस तरह हाफिज सईद को एक शरीफ नागरिक के तौर पर पेश करता है उसी तरह यह भी दलील देता है कि दाऊद इब्राहीम तो उसके यहां है ही नहीं। वह उन तत्वों के खिलाफ भी कोई कार्रवाई करने की इच्छा जाहिर नहीं करता जो अफगानिस्तान में भारतीय ठिकानों पर जब-तब हमला करते रहते हैं। यह ठीक है कि भारत ने यह तय किया है कि उपयुक्त माहौल का निर्माण न होने तक पाकिस्तान से बातचीत नहीं की जाएगी, लेकिन अब समय आ गया है कि इस पर ध्यान दिया जाए कि पाकिस्तान अपने अड़ियल रुख-रवैये का परित्याग करने के लिए विवश हो।
[मुख्य संपादकीय]
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कश्मीर का रुख समझने की जरूरत
मधु किश्वर
जनसत्ता 5 सितंबर, 2014: जब भाजपा सरकार ने नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के लिए पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों को न्योता देकर एक नए वार्तालाप की शुरुआत की तो उसमें नरेंद्र मोदी ने अपने बड़प्पन की पहचान बनाई। पर हाल ही में पाकिस्तानी राजदूत की हुर्रियत और अन्य कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ मुलाकात के मुद्दे को लेकर जिस तरह विदेश सचिवों के बीच होने वाली बातचीत को नरेंद्र मोदी सरकार ने एक झटके से रद्द कर दिया उससे भाजपा ने बेवजह दुनिया को यह संदेश दे दिया कि हुर्रियत के नेता कश्मीर की राजनीति में इतना वजन रखते हैं कि भारत सरकार उनकी हर छोटी-बड़ी हरकत से घबरा जाती है। इसमें दो राय नहीं कि पाकिस्तान ने विदेश सचिवों के स्तर पर होने वाली बातचीत के बीच अलगाववादी और आतंक की राजनीति खेलने वाले स्वयंभू नेताओं को बुला कर भारत को ठेंगा दिखाने का काम किया है। पर यह ठेंगा पाकिस्तान की अंदरूनी बीमार राजनीति की मजबूरी है। वहां की भारत-विरोधी उपद्रवी ताकतें नवाज शरीफ के ऊपर पहले से हावी रही हैं कि उन्होंने भारत के प्रति ‘नरमी’ दिखाने के साथ-साथ कश्मीरी मुसलमानों के अलगाववादी तबके को धोखा दिया है। इसलिए पाकिस्तानी हुकूमत के लिए ‘पाक समर्थक’ नेताओं से मशविरा करने का आडंबर मजबूरी था। यह जग-जाहिर है कि पाकिस्तान में चुनावी प्रक्रिया से गठित सरकार की हैसियत पाक फौज और आइएसआइ की तुलना में बहुत हल्की है। इन दोनों ताकतों द्वारा खड़े किए आतंकवादी संगठनों की दहशत पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार को हमेशा घेरे रहती है। न फौज, न आइएसआइ और न ही आतंकवादी संगठन भारत से वार्तालाप के हक में हैं। पर पाकिस्तान की उदारवादी सोच रखने वाली जनता भारत से मैत्री का रिश्ता चाहती है। यह तबका समझने लगा है कि भारत के प्रति नफरत और द्वेष की राजनीति पाकिस्तान के लिए गले का पत्थर बन चुकी है, जिसके बोझ तले पाकिस्तान खुद भयानक दलदल में धंसता जा रहा है। बदकिस्मती से जिन्ना साहब ने इस नफरत और द्वेष को पाकिस्तान की आधारशिला बना दिया था। भारत में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि दिग्गज नेताओं के विचारों और कार्यकलापों के बखिए खुलेआम बिना किसी डर के उधेड़े जा सकते हैं, पर आज भी पाकिस्तान में खुलेआम जिन्ना साहब की राजनीतिक समझ और विचारधारा को चुनौती देना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन फिर भी इस बात की समझ उदारवादी सोच रखने वाले पाकिस्तानियों में आ चुकी है कि अगर उनका मुल्क भारत से शांति का रिश्ता नहीं रख सकता तो पाकिस्तान खुद से भी शांत रिश्ता बनाने में सफल नहीं होगा। ऐसे में वार्तालाप को झटके से बंद करके भारत सरकार ने एक तरफ पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों को बड़ी जीत तोहफे में दे दी, तो दूसरी ओर बिल्कुल हाशिये पर पहुंचे कश्मीरी अलगाववादियों को बेवजह केंद्र में ला खड़ा किया। खुद के इरादे डगमगाने लगते हैं तो इंसान अपने विरोधी को और मजबूत कर देता है। इससे बेवजह यह संदेशा गया कि पाकिस्तान कश्मीरियों के प्रति संवेदनशील है और भारत सरकार उनसे खौफ खाती है, उनकी मौजूदगी भारत के गले में फंसी हड्डी की तरह है। इसके बजाय, इन बैठकों को यह कह कर भी हंस कर टाल दिया जा सकता था कि बेचारे हुर्रियत के नेता इसीलिए पाकिस्तान का दरवाजा बार-बार खटखटाते हैं, पाकिस्तान को सरपरस्त इसलिए मानते हैं कि कश्मीर की जनता इनकी सुनती नहीं, इनको कोई भाव नहीं देती। यह बात छिपी नहीं है कि कश्मीर में अलगाववादी ताकतें तभी मजबूत होती हैं जब चुनावों में केंद्र सरकार घपलेबाजी होने देती है और राज्य सरकार प्रशासन के नाम पर अंधेरगर्दी मचा कर रखती है। उमर अब्दुल्ला सरकार ने पिछले पांच वर्षों में बेइंतहा कहर ढाया और कांग्रेस की शह पर बहुत तानाशाही राज किया है। इसी वजह से वहां की जनता अलगाववादी मंच के जरिए अपनी भड़ास निकाल रही है। मुफ्ती मोहम्मद सईद की संवेदनशील पीडीपी की हुकूमत के चलते अलगाववाद से अधिकतर कश्मीरियों ने मुंह फेर लिया था। कश्मीर में केवल आम जनता नहीं, ज्यादातर हुर्रियत नेताओं को भी मैंने दर्जनों बार यह कहते सुना है कि कश्मीर समस्या का हल होगा तो केवल भाजपा के हाथों। नरेंद्र मोदी के प्रति वैसा ही उत्साह कश्मीरियों में है, जैसा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय था। कश्मीरी अवाम वाजपेयी की तीन बातों का कायल है। एक, उन्होंने 2000 के चुनाव में धांधली नहीं होने दी। दो, कश्मीर मसले के हल की बात ‘इंसानियत के दायरे’ में होगी- कह कर कश्मीरियों को विश्वास दिलाया कि मसला केवल सीमा का नहीं, इंसानी है। तीन, कांग्रेस की तरह वहां के मुख्यमंत्री को कठपुतली की तरह नहीं नचाया, बल्कि मुफ्ती मोहम्मद सईद को कश्मीर की राजनीति का एजेंडा तय करने की खुली छूट दी थी। नरेंद्र मोदी भी बार-बार दोहरा चुके हैं कि भाजपा सरकार राज्यों के प्रति केंद्र का सुल्तानी रवैया नहीं अपनाने जा रही। यह कश्मीर के इतिहास में पहली बार हो रहा है कि सज्जाद लोन जैसी मुसलिम समुदाय की जानी-मानी हस्तियां और आम नौजवान खुल कर भाजपा से हाथ मिला रहे हैं। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जैसे शहरों में भी कश्मीरी नौजवान खुल कर भाजपा की सदस्यता ले रहे हैं। यह अपने आप में ऐतिहासिक बदलाव है। जम्मू के चुनावी भाषण में कश्मीरियों को संबोधित कर नरेंद्र मोदी ने कश्मीर के अवाम की दुखती रगों पर संवेदनशील हाथ रख कर जब कश्मीर के लिए भी ‘अच्छे दिन’ आने का आश्वासन दिया था, तो भाजपा के प्रति उत्साह की लहर घाटी में भी साफ नजर आई। पर न जाने क्यों नरेंद्र मोदी कश्मीर के अवाम से जुड़ने से कतरा रहे हैं। यह तो समझ आता है कि चुनावी सभा जम्मू में की, कश्मीर में नहीं। पर उसके बाद श्रीनगर गए भी तो केवल बदामीबाग कैंटोनमेंट क्षेत्र तक खुद को सीमित रखा। उसके बाद लद्दाख गए- जो जरूरी भी था- पर कश्मीर घाटी का कहीं जिक्र तक नहीं। ज्यादा फोकस जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में है। कश्मीर को जम्मू और लद्दाख से जोड़ना जरूरी है, जो काम नरेंद्र मोदी बखूबी कर सकते हैं। उनमें आपसी अलगाव पैदा करने की राजनीति के बहुत घातक अंजाम होंगे। पिछले तीस वर्षों में कश्मीरियों ने अलगाववादी राजनीति के खतरनाक अंजाम और अंदरूनी खामियां बहुत करीब से देखी हैं। अलगाववादी संगठनों और नेताओं के आपसी द्वंद्व और द्वेष को भी कश्मीरी अवाम बहुत बारीकी से पहचानने लगा है। यह भी सब जानते हैं कि अलगाववादी विचारधारा केवल बंदूक और पाकिस्तान द्वारा दिए पैसों के बलबूते चल रही है। अलगाववादी नेता पाक समर्थक राजनीति इसीलिए खेल रहे हैं कि एक तरफ पाकिस्तान उन्हें बेइंतहा पैसा देता है और दूसरी ओर हर वक्त उनके सिर पर तलवार ही नहीं, बंदूकें ताने बैठा है। जो भी जरा बिदका उसको आर-पार करवा देना पाकिस्तान के लिए बाएं हाथ का खेल है। कई अलगाववादी नेता भारत सरकार द्वारा प्रदान सुरक्षाकर्मियों की देख-रेख में रहते हैं। उस पर निर्भर रहते हुए भी भारत को कोसते नहीं थकते। बावजूद इसके भारत सरकार से ही उम्मीद करते हैं कि वह उन्हें दुश्मन की बंदूकों से बचाए रखे। और यह दुश्मन है कौन। जाहिर है, भारत सरकार का खौफ तो है नहीं, क्योंकि फिर भारत सरकार द्वारा दी गई सुरक्षा को स्वीकार करने का कोई औचित्य नहीं बनता। कश्मीर का बच्चा-बच्चा जानता है कि उन्हें डर है तो पाकिस्तान की आइएसआइ द्वारा पाले आतंकवादी संगठनों से। उदारवादी हुर्रियत के उमर मीरवाइज ने तो हाल में खुलेआम गिलानी साहब को अपने पिता का कातिल कहा और यह इल्जाम लगाया कि उनकी जान को भी गिलानी साहब से ताल्लुक रखने वाले पाक समर्थक उग्रवादियों से खतरा है। अगर गलती से कभी कश्मीर को आजादी मिल भी गई तो ये सब एक-दूसरे का वही हाल करेंगे, जो हमास या अल कायदा अपने हमवतनों का कर रहे हैं। सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि कश्मीरी अलगाववादी नेता खुद भी अपने पैरों और जेबों से अपना वोट भारत को देते आए हैं, भले चुनाव में वोट का बहिष्कार जोरों-शोरों से करें। पाकिस्तान से बेइंतहा पैसा लेकर अलगाववादी अपनी राजनीतिक रोटियां जरूर सेंकते हैं, पर यह पैसा कराची, पेशावर या लाहौर में निवेश नहीं करते। यह पैसा भारत के छोटे-बड़े शहरों में फ्लैट और बंगले खरीद और अन्य प्रकार के निवेश में जा रहा है। दिल्ली में ही लाजपतनगर, जंगपुरा, मालवीय नगर जैसी अनेक कॉलोनियां हैं, जहां कश्मीरियों ने भारी मात्रा में फ्लैट और बंगले खरीदे हैं। हुर्रियत के गिलानी साहब ने भी मालवीय नगर में घर खरीदा है। इसी प्रकार हुर्रियत के नेता गरीब परिवार के कश्मीरी नौजवानों को सरहद पार हथियारों और आतंकी हमलों के प्रशिक्षण के लिए भले भेजते हों, पर उनके अपने बेटे-बेटियां पढ़ने या व्यापार के लिए दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु, पुणे, हैदराबाद जैसे शहरों में दिखेंगे। हुर्रियत के जाने-माने नेताओं के कुछेक बच्चे तो हमारे देश की अदालतों में वकील भी बने घूमते हैं। अपने बेटे-बेटियों को हुर्रियत के नेता पाकिस्तान में पढ़ने या नौकरी करने नहीं भेजते। क्या यह हिंदुस्तान के हक में वोट नहीं है? हुर्रियत के उदारवादी धड़े का भाजपा की तरफ झुकाव साफ दिख रहा है। गिलानी साहब के बहुत से साथी भी पाकिस्तान की कठपुतली बन नाच-नाच कर थक चुके हैं। उनकी चुनाव बहिष्कार की रणनीति तभी तक कामयाब रहेगी जब तक उमर अब्दुल्ला का प्रशासन कायम है। मगर नेशनल कॉन्फ्रेंस का खात्मा इसी साल के चुनाव में हो जाने वाला है। एक सशक्त जनतांत्रिक हुकूमत आते ही जेकेएलएफ के यासीन मलिक भी दर-दर भटकते दिखेंगे, जैसा कि 2002 के चुनाव के बाद के पीडीपी शासन में हुआ। कश्मीर भी मोदी के मूलमंत्र- सुशासन और आर्थिक विकास- के लिए तड़प रहा है, जिससे मंत्रमुग्ध होकर सारे देश ने भाजपा को खासा बहुमत दिया। यासीन मलिक जैसे पाक समर्थक नेता बरसाती मेंढक की तरह कुशासन के दौरान ही टर्राने और कहर ढाने की क्षमता रखते हैं। इनका इलाज ईमानदार चुनावी प्रक्रिया, सुशासन और विकासशीलता है और पाकिस्तान का इलाज है कश्मीर में खुशहाल अवाम। ये दोनों नुस्खे भारत के हाथ में हैं।
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चाणक्य से पाकिस्तान ने सीखा
और हमने पृथ्वीराज से
हजारों साल पहले भारत माता को एक करने के लिये आचार्य चाणक्य ने साम दाम दंड भेद के जो तरीके अपनाये थे वही तरीका आज हमारा पडोसी देश पाकिस्तान हमारे देश को बर्बाद करने के लिये अपनाये हुये है जिसमे उसका साथ दुनिया के ज्यादातर मुस्लिम और लगभग सारे इस्लामी मुल्क दे रहे हैं, यहां तक की उसने हमारे देश के कुछ मुस्लिमो को भी इस्लाम के नाम पर अपने साथ जोड लिया है, हालांकि आचार्य चाणक्य और पाकिस्तान के उद्देश्य मे कोई समानता नही है क्योंकि आचार्य का उद्देश्य पवित्र था जो एक निरंकुश और दुष्ट शासक से मुक्ति दिलाकर प्रजा की भलाई करना था किंतु पाकिस्तान तो निर्दोष और मासूम लोगो को मौत के घाट उतार रहा है वो भी धर्म के नाम पर, इन्हे काश्मीर चाहिये क्योंकी यहाँ मुस्लिम ज्यादा हैं किंतु अपने ही मुस्लिम इलाके (बांग्लादेश) इनसे सम्भाले नही गये और उनपर अत्याचार के सारे रिकार्ड तोड दिये थे, बलूचिस्तान मे यही अत्याचार आज भी जारी हैं, इसके बावजूद भी अगर वो मुस्लिमो को इस्लाम के नाम पर एक कर लेता है तो उसके नीति निर्माता प्रशंसनीय हैं, दूसरी ओर हम बार बार चोट खाकर भी माफ करने के पृथ्वीराज चौहान वाले आदर्श रास्ते पर चल रहे हैं जो अपने हाथों अपनी कब्र खोदने जैसा है क्योंकि इकतरफा आदर्शवाद बहुत ही घातक होता है।
पाकिस्तान एक तरफ हमसे बात करता रहता है तो दूसरी तरफ उसकी अन्य नीतियां भी जारी रहती हैं जैसे आतंकवाद, सीजफायर का उलंघन, घुसपैठ, नकली नोट आदि, और दूसरी तरफ हमारा देश सब कुछ बातचीत से ही हल करने के सपने देखता है और अगर सेना कुछ अलग करना भी चाहती है तो उसे अनुमति नही दी जाती है जबकी जैसे को तैसा बने बिना कोई भी समस्या हल नही की जा सकती। भगवान राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को भी सागर सुखाने के लिये धनुष उठाना पडा था, बालि का वध छल से करना पडा, यहां तक की विजय प्राप्त करने और धर्म की रक्षा के लिये सुग्रीव वा विभीषण को अपने ही भाई से द्रोह करने के लिये प्रेरित करना पडा था, किंतु आज राम का नाम ही साम्प्रदायिक हो गया है जिसे लेने मे अब वो भी घबराते हैं जिनकी राजनीति ही राम जी ने चमकायी, वर्ना जब उनकी सरकार थी तो आतंकियो को कंधार ले जाकर ना छोडा जाता बल्कि अपने यात्रियों को छुडाने के बाद एक मिसाइल हमले से सारे के सारे आतंकियों और उनके समर्थकों को एक साथ उसी कंधार के हवाई अड्डे पर ही निपटा दिया जाता आखिर अग्नी, पृथ्वी जैसी मिसाइलें बस २६ जनवरी को प्रदर्शन करने के लिये ही हैं क्या?
पाकिस्तान खुलेआम काश्मीर मे और अब तो पूरे देश मे आतंक फैला रहा है किंतु हम उसके अशांत बलूचिस्तान मे ऐसा करने का साहस नही कर पाये जबकी आजादी के समय बलूचिस्तान के तत्कालीन शासक ने बलूचिस्तान के हिंदुस्तान मे विलय का आग्रह किया था मगर नेहरू जी ने ये प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था, नेहरू ने नेपाल के साथ भी ऐसा ही किया जो स्वयम भारत का हिस्सा बनना चाह रहा था पर नेहरू चीन और भारत के बीच मे बफर बनाने के चक्कर मे नेपाल को भारत मे नही मिलने दिया जो आज भारत विरोधियों के लिये सुगम मार्ग बन गया है.
आज की जरुरत है कि हमारे देश को ना सिर्फ बलूचिस्तान बल्कि उसके अन्य अशांत क्षेत्र के लोगों को भड्काकर तथा आर्थिक और शस्त्रों की मदद देकर पाकिस्तान को अस्थिर करने की लगातार कोशिश करनी चाहिये जिससे वो खुद को सम्भालने मे ही व्यस्त हो जायेगा और हमारा पीछा कुछ हद तक छोड देगा।
मेरा मानना है अगर १९७१ मे इंदिरा गांधी ने बंग्लादेश को अलग ना किया होता बस अपनी सीमा मे बंग्लादेशियों के घुसने पर ही पाबंदी लगायी होती तो आज हमारे पास पाकिस्तान के खिलाफ उपयोग होने के लिये तैयार मानव बमों की कमी ना रहती, किंतु बंग्लादेश को आजाद करके हमने दो दुश्मन बना लिये एक तो पाकिस्तान और दूसरा बंग्लादेश क्योंकि वहां का पाकिस्तान समर्थक गुट जेहादियों का उपयोग हमारे खिलाफ कर रहा है यदि ये अलग राष्ट्र ना होता तो अन्य इस्लामी मुल्कों की तरह यहां भी खूनी संघर्ष चल रहा होता और हम उसका इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ आसानी से कर सकते थे, हमने बांग्ला समर्थको को अलग देश बना के दिया जो शांति से रह रहे हैं वर्ना ये खुद ही पाकिस्तान को तबाह करने मे व्यस्त रहते।
इसके अतिरिक्त भी अगर हमारे देश की सरकारें अपनी रणनीति बदलें और जैसे को तैसा बनने के लिये तैयार हो जायें तो भारत मे भी देश पर मर मिटने वालों की कोई कमी नही, पाकिस्तान की आबादी के बराबर तो हमारे यहां आत्मघाती हमलावर तैयार हो सकते हैं आखिर हम क्यों भूल जाते हैं की हम सवा अरब हैं जिसमे ६५% युवा हैं।
किंतु हमारे देश की कायर सरकारें कहती हैं की वो एक जिम्मेदार देश की सरकार हैं और ऐसा नही कर सकती हद तो तब हो जाती है जब पाकिस्तान के खिलाफ कोई कदम उठाने मे ये सोच के घबराती हैं की कहीं देश का मुस्लिम वर्ग नाराज हो जाए।
किसी भी सरकार के लिये अपने देश और उसके नागरिकों की रक्षा से बडी कोई जिम्मेदारी नही होती और उसकी रक्षा के लिये उठाया गया हर कदम जायज होता है।
अगर आज सरदार पटेल, इंदिरा गांधी या लालबहादुर शास्त्री जैसा दृढ इच्छाशक्ति वाला कोई नेता हमारे बीच होता तो पाकिस्तान धरती के नक्शे से मिट चुका होता, हम नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद लगाके बैठे है की सायद वो कुछ अलग करेंगे किंतु उनके हालिया बयान से लगता है की वो भी अब सेकुलर और उदार बनने की तीव्र चाह मे अपनी दृढता खो चुके हैं अब यदि हमे कमजोर न्रेतृत्व ही मिलना है तो मनमोहन सिंह ही क्या बुरे है।
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पाकिस्तान की जिद
Fri, 03 Oct 2014
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफल अमेरिका यात्रा के बाद पाकिस्तान ने जिस तरह कश्मीर पर नए सिरे से रोना रोते हुए सियाचिन मसले को भी उठाया वह उसकी खिसियाहट का ही परिचायक है। वह शायद इसलिए और चिढ़ गया है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मांग पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इतना ही नहीं किसी प्रमुख देश ने इस पर प्रतिक्रिया जताना भी जरूरी नहीं समझा। होना तो यह चाहिए था कि पाकिस्तान विश्व समुदाय के रवैये से सबक सीखता और यह समझता कि गड़े मुर्दे उखाड़ने से उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उसे ऐसे किसी नतीजे पर इसलिए भी पहुंचना चाहिए था, क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ही दो टूक ढंग से यह स्पष्ट कर दिया था कि वह पाकिस्तान से पूरी गंभीरता से बात करने को तैयार हैं, लेकिन आतंक के साये के बिना। इससे दुनिया को जो संदेश जाना चाहिए था वह अच्छे से चला गया, लेकिन शायद पाकिस्तान किसी भी तरह के सही संदेश को ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं। वह शायद यह समझने से भी इन्कार कर रहा है कि उसके प्रति अमेरिका का रवैया भी बदल रहा है। अमेरिका और भारत जिस तरह लश्कर, जैश, हक्कानी नेटवर्क और डी कंपनी सरीखे आतंकी समूहों के सुरक्षित ठिकानों और उनके आर्थिक स्त्रोतों को नष्ट करने के लिए सहमत हुए वह पाकिस्तान के लिए एक खतरे की घंटी ही है।
भले ही उक्त आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने के संदर्भ में अमेरिका और भारत के बीच जो समझौता हुआ उसमें पाकिस्तान का उल्लेख न किया गया हो, लेकिन सारी दुनिया यह जानती-समझती है कि ये संगठन कहां फल-फूल रहे हैं। ये सारे वे आतंकी संगठन हैं जो न केवल पाकिस्तान में फल-फूल रहे हैं, बल्कि जिन्हें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ का सहयोग और समर्थन भी हासिल है। इसके एक नहीं अनेक प्रमाण सामने आ चुके हैं। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद के मामले में अमेरिका और भारत के बीच बनी समझबूझ के बाद उपजे माहौल से अपनी जनता का ध्यान हटाने के लिए नए सिरे से कश्मीर का राग अलापा है। यह व्यर्थ है। कश्मीर को लेकर कोई भी प्रमुख देश आगे आएगा, इसमें संदेह है और संदेह का नया आधार यह है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का कद बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। इस बढ़ते कद की झलक संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री के संबोधन में भी मिली थी। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान न तो अपनी गलतियों से सबक सीख रहा है और न ही विश्व समुदाय के संकेतों को समझ रहा है। पाकिस्तान को इस पर ध्यान देना चाहिए कि धीरे-धीरे विश्व समुदाय इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि अब भारत और पाकिस्तान को एक ही पलड़े में नहीं रखा जा सकता। इन स्थितियों में आने वाले दिनों में पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ना तय है। चूंकि वह अपने रवैये में सुधार के लिए तैयार नहीं दिखता इसलिए भारत के पास इसके अलावा और कोई उपाय नहीं कि वह उस पर अपना दबाव और अधिक बढ़ाए।
[मुख्य संपादकीय]
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बौखलाया पाकिस्तान
आतंकवाद के खिलाफ भारत और अमेरिका की संयुक्त आवाज ने पाकिस्तान को कितना बौखला दिया है इसकी गवाह हमारी सीमा है जहां महीने भर की शांति को भंग करते हुए फिर से गोलियों की आवाजें गूंजने लगी हैं। नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा के बीच हुई सहमति के चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि पाकिस्तान ने पुंछ के सीमावर्ती गांवों पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। जम्मू कश्मीर का यह सीमावर्ती इलाका अभूतपूर्व जलपल्रय के कहर से अभी उबर भी नहीं पाया है कि उस पर यह विपत्ति टूट पड़ी है। पाकिस्तानी सेना के मोर्टार एक बार फिर गांवों को निशाना बनाने लगे हैं जिससे इलाके में दहशत और भगदड़ वाले हालात बनने लगे हैं। हमारी सेना बेशक जवाब देने में कोई कोताही नहीं बरत रही है लेकिन निदरेष लोगों पर हमले के पीछे पाक सेना और आतंकियों की करतूत भी नहीं छिप रही है जिसका इरादा आबादी वाले इलाकों में भगदड़ के हालात बना कर घुसपैठियों का रास्ता आसान करना है। आतंकी गिरोहों के सफाए के लिए अमेरिका ने जिस प्रकार पहली बार भारत से खुली भागीदारी की है उससे न केवल पाकिस्तान बल्कि उसकी जमीन पर पनपते तमाम दहशतगदरे में व्याकुलता छा गई है। दहशतगर्दी के सीधे निशाने पर होने के बावजूद दुनिया के इन दोनों विशाल लोकतंत्रों में आतंकियों के खिलाफ असरदार एकजुटता का अभाव चिंता का सबब था। गौरतलब है कि अल कायदा ने कबूल किया है कि सितम्बर माह में कराची के नौसेना अड्डे पर हुए आतंकी हमले का असल लक्ष्य पाकिस्तान नहीं बल्कि भारत और अमेरिका थे। अल कायदा से जुड़े ‘अल शहाब’ ने बाकायदा इस सुनियोजित साजिश का खुलासा करते हुए बताया है कि हमले में दो टीमें लगाई गई थीं जिनका इरादा पाकिस्तान के दो जंगी जहाजों को कब्जे में लेकर इनके जरिए भारत और अमेरिका के जहाजों को नष्ट करना था। भारतीय जल सीमा में घुस कर हमला करने के लिए ‘पीएनएस असलत’ नामक जिस पाक जंगी जहाज को चुना गया था वह मिसाइलों, टॉरपिडो और एंटी एयरक्राफ्ट बंदूकों से लैस था। उसी प्रकार ‘पीएनएस जुल्फिकार’ को अमेरिकी ऑयल टैंकर ‘यूएसएस सप्लाई’ को निशाना बनाना था। सुरक्षाकर्मियों के हाथों विफल बना दी गई इस साजिश का नेतृत्व पाक नौसेना का एक पूर्व कमांडर कर रहा था। ‘अल शहाब’ ने भारत को धमकी भी दी है कि उसके खिलाफ शुरू ‘गजवा ए हिंद’ अभियान का यह एक उदाहरण भर था और वह भविष्य में बड़े हमलों के लिए तैयार रहे। अल कायदा ने अपने गुगरे को खास कर निर्देश दिया है कि वे समुद्र में ऐसी बड़ी कार्रवाईयों की तैयारी जोरशोर से शुरू कर दें। समुद्री मागरे पर अल कायदा जैसे कुख्यात आतंकी संगठन की नजर दुनिया के लिए बुरी खबर है। चौदह साल पहले अल कायदा अमेरिका के जंगी जहाज ‘यूएसएस कोल’ पर उस वक्त हमला कर चुका है जब वह अदन के बंदरगाह में खड़ा था। आतंकियों के हमले में सत्रह अमेरिकी नौसैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी।
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पाकिस्तान की बौखलाहट
Sat, 04 Oct 2014
पाकिस्तान ने एक बार फिर भारतीय सीमाओं पर जिस पैमाने पर गोलाबारी शुरू की है, उससे गांववासियों में दहशत व्याप्त होना स्वाभाविक है। विगत दिवस पाकिस्तान ने पुंछ जिले के साब्जियां सेक्टर में भारतीय क्षेत्र में गोलाबारी कर आतंकियों को इस ओर धकेलने की कोशिश की। इस दौरान उसने कई रिहायशी इलाकों में मोर्टार और राकेट भी दागे। इनमें तीन महिलाओं सहित छह ग्रामीण घायल हो गए।
दुख की बात यह है कि गोलाबारी से लोग अभी उबर भी नहीं पाए थे कि पाकिस्तान ने आरएसपुरा सेक्टर के अरनिया क्षेत्र में पित्तल व टैंट गार्ड पोस्टों पर गोलियां दागी, जिससे गांव वासियों में जबरदस्त दहशत व्याप्त हो गई, क्योंकि गत माह भी पाकिस्तान ने भारतीय चौकियों के अलावा रिहायशी इलाकों में फायरिंग की थी, जिससे किसानों की धान की फसल पर संकट मंडराने लगा था। अब जबकि खेतों में धान की फसल लगी हुई है और इस फसल को पानी, खाद की जरूरत है। अगर पाकिस्तान फायरिंग से बाज नहीं आया तो किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
हद तो यह है कि गोलाबारी रात को होती है, जिससे ग्रामीण न तो घरों से बाहर निकल सकते हैं और न ही अंधेरे में सुरक्षित स्थानों में शरण ले पाते हैं। गत माह भी पाकिस्तान की अरनिया सब सेक्टर के अंतर्गत 25 गांवों में गोलाबारी से लोगों को पलायन करने को मजबूर होना पड़ा था। कुल मिलाकर यही हाल अखनूर सेक्टर के परगवाल इलाके में भी था। अब फिर से गोलाबारी के चलते सबसे ज्यादा चिंता किसानों को सता रही है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सैकड़ों एकड़ भूमि में धान की फसल लगी है। किसानों की कुछ जमीन तारबंदी के आगे भी है, जहां सीमा सुरक्षाबल के जवान नहीं जाने देते क्योंकि हालात पहले जैसे नहीं है। गोलाबारी किसी मसले का समाधान नहीं है।
पाकिस्तान की कोशिश है कि किसी तरह गोलाबारी की आड़ में आतंकवादियों को भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करवाई जाए। पाकिस्तान की बौखलाहट का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अमेरिका में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कश्मीर पर बेतुका बयान दिया। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका सहित अन्य देशों को यह संदेश दिया कि आतंकवाद से किसी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता।
(स्थानीय संपादकीय: जम्मू-कश्मीर)
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बौराया पाकिस्तान
Tue, 07 Oct 2014
कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन तो क्या हमदर्दी के दो बोल के लिए भी तरसा पाकिस्तान सीमा पर जिस तरह निर्दोष-निहत्थे ग्रामीणों का खून बहाने पर उतर आया है उसके बाद भारत को इस पड़ोसी देश से निपटने के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की ओर से की गई भीषण गोलीबारी से यह साफ है कि आने वाले दिनों में संघर्ष विराम समझौता खटाई में पड़ सकता है। वैसे भी सीमा पार से जिस तरह आए दिन गोलीबारी हो रही है उससे संघर्ष विराम सिर्फ नाम का रह गया है। पिछले कुछ समय से शांत सीमा जिस तरह यकायक अशांत हो उठी है उसका एक बड़ा कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर पर पाकिस्तान को किसी तरह का समर्थन न मिलना ही नजर आता है। उसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में भारत और अमेरिका के बीच बनी समझ-बूझ से भी झटका लगा होगा। जब अमेरिका और साथ ही शेष विश्व समुदाय के रुख से पाकिस्तान को सबक सीखना चाहिए था तब वह जिहादी रवैया दिखा रहा है। सीमा पर खून बहाकर पाकिस्तान एक तरह से यह कहना चाह रहा है कि अगर उससे बात नहीं की जाएगी तो वह सीमा पर इसी तरह की हरकतें करेगा। मुश्किल यह है कि जब उसके साथ बातचीत होनी होती है तब भी सीमा पर उत्पात होता है। या तो संघर्ष विराम का उल्लंघन किया जाता है या फिर आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश की जाती है। हालांकि सीमा पर उसकी गोलीबारी के जवाब में भारतीय सेना की ओर से किए जाने वाले पलटवार में उसे भी नुकसान उठाना पड़ रहा है, लेकिन शायद उसे इसकी परवाह नहीं।
इसमें संदेह है कि भारत की कड़ी प्रतिक्रिया का पाकिस्तान पर कोई असर पड़ेगा। संदेह इसमें भी है कि वह समझाने-बुझाने से सही रास्ते पर आएगा। देश और दुनिया के लिए यह जानना भी कठिन है कि सीमा पर जो कुछ हो रहा है वह केवल पाकिस्तानी सेना की सनक का परिणाम है अथवा उसमें पाकिस्तान सरकार की भी हिस्सेदारी है? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अभी तक ऐसा कुछ नहीं कर सके हैं जिससे दुनिया को यह भरोसा हो कि वह अपनी सेना पर भी नियंत्रण रखते हैं। इन स्थितियों में भारत के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाओं पर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब कुछ इस तरह से दे कि वह इस तरह की हरकतों से बाज आए। इसके लिए जो भी उपाय हों वे किए जाने चाहिए। पाकिस्तान जब तक भारत के सीमांत क्षेत्रों में रह रहे लोगों को परेशान करने में समर्थ होता रहेगा तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि उसे मुंहतोड़ जवाब दे दिया गया है। यह सही है कि नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा में कई हिस्से ऐसे हैं जो दुर्गम हैं, लेकिन उन्हें अभेद्य बनाना ही होगा। इससे ही पाकिस्तान को व्यर्थ की उछलकूद करने से रोका जा सकता है। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना जारी रखा जाए। उसे यह समझ में आना ही चाहिए कि वह जिस रीति-नीति पर चल रहा है उससे अंतत: उसे ही नुकसान उठाना पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय सीमा पर गोलीबारी की ताजा घटनाओं के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक दल की भूमिका पर भी भारत को विचार करना होगा, क्योंकि यह समूह किसी काम का नहीं जान पड़ रहा है।
[मुख्य संपादकीय]
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गोलाबारी की आड़ में
:06-10-14
ईद के ठीक एक दिन पहले पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भारी गोलीबारी की, जिसमें पांच नागरिक मारे गए और कई जख्मी हो गए। पिछले चार दिनों में पाकिस्तान ग्यारह बार युद्ध विराम का उल्लंघन कर चुका है, जिसका खामियाजा आम नागरिक उठा रहे हैं। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने बदले में गोलाबारी की। पाकिस्तान का इल्जाम यह है कि गोलाबारी भारत की तरफ से हुई, जिसमें उसके चार नागरिक मारे गए। सीमा पर तैनात भारत और पाकिस्तान के सुरक्षा बलों ने ईद पर एक-दूसरे को मुबारकबाद भी दी, लेकिन इस बात की आशंका अब भी बनी हुई है कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी की ज्यादा घटनाएं होंगी। साल के इस वक्त में सीमा पर इस तरह की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इसकी वजह यह है कि पाकिस्तान गोलाबारी की आड़ में घुसपैठियों को सीमा पार कराने की कोशिश करता है। कुछ ही दिनों में कश्मीर में बर्फ गिरने लगेगी और घुसपैठ तकरीबन नामुमकिन हो जाएगी, इसलिए इस वक्त सीमा पर पाकिस्तानी आक्रामकता ज्यादा देखने को मिलती है। बीएसएफ का कहना यह है कि इस बार ऐसी घटनाएं ज्यादा होने की वजह यह है कि पाकिस्तान ज्यादा घुसपैठियों को भारत में घुसाने की फिराक में है। आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और शायद इन चुनावों में गड़बड़ियां फैलाने की मंशा से आतंकवादी भारत में घुसना चाहते हैं। पिछले काफी वक्त से कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां काफी कम हो गई हैं। अमेरिकी दबाव में कश्मीरी आतंकवादियों को पाकिस्तान से मिलने वाली मदद काफी घट गई है और कश्मीर में आतंकवाद की ओर कम नौजवान आकर्षित हो रहे हैं। आतंकवाद के कमजोर होने का सबसे बड़ा सबूत आतंकवादी वारदात और इनमें मरने वालों की तादाद में भारी कमी है। सन 1995 में 1,700 से ज्यादा लोग आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में मारे गए थे, जिनमें आम नागरिक, आतंकवादी और सुरक्षा बलों के जवान, सभी शामिल हैं। यह संख्या सन 2013 में 81 तक आ गई है। पिछले चार-पांच साल से यह संख्या 100 से नीचे है और यह लगातार घट रही है। ऐसे में, अगर पाकिस्तान में बैठे आतंकवाद के सरगनाओं को जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी फैलानी है, तो उन्हें इसके लिए आतंकियों को घुसपैठ कराना होगा। भारतीय सुरक्षा बल भी पाकिस्तान के इन तरीकों से वाकिफ हैं, इसलिए वे भी अपनी ओर से सतर्क रहते हैं और जवाबी कार्रवाई करके घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करते रहते हैं। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से निपट जाएंगे और जम्मू-कश्मीर के लोग इनमें पूरे उत्साह से भाग लेंगे। हमें यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में जो नई सरकार आएगी, वह केंद्र सरकार के साथ मिलकर कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए कोई नई राजनीतिक पहल करेगी, क्योंकि कश्मीर समस्या का वास्तविक हल तो राजनीतिक ही होगा। जब भी सीमा पर इस तरह की झड़प होती है, तो आम लोगों में भी गुस्सा भड़कना स्वाभाविक है। मगर इस पर उग्र राष्ट्रवादी रुख अपनाने से पहले यह याद रखना चाहिए कि भारतीय सुरक्षा बल भी हमेशा पाकिस्तान की कार्रवाइयों का करारा जवाब देते हैं। यह जवाब उकसाने की कार्रवाई से काफी ज्यादा तगड़ा होता है, लेकिन इसका प्रचार नहीं किया जाता, क्योंकि इससे समस्याएं पैदा हो सकती हैं। सीमा पर रहने वाले आम नागरिकों को इससे जो नुकसान होता है, वह जरूर दुखद है। ऐसा न जाने कब होगा कि दोनों पड़ोसी देश भाइयों की तरह शांति से एक-दूसरे के साथ रहेंगे।
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थम नहीं रहा टकराव
नवभारत टाइम्स| Oct 8, 2014
जम्मू-कश्मीर में भारत-पाक सीमा पर कई हफ्तों से बना तनाव इधर और गहरा गया है। पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी में राज्य के सीमावर्ती गांवों के पांच लोगों की मौत हुई है और करीब 50 घायल हुए हैं। मामले का दूसरा पहलू यह है कि पाकिस्तान की तरफ से भारत पर उकसावे की कार्रवाई के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। तटस्थ होकर देखें तो सीमा पर होने वाली झड़पों में खबरों के सारे स्रोत फौजी ही होते हैं, लिहाजा यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि आक्रामक गतिविधियों की पहल किस तरफ से हुई थी। ऐसे में मामले को भावुकता के बजाय व्यावहारिकता के धरातल पर देखना होगा। आरोप-प्रत्यारोप से किसी का भला नहीं होने वाला। सीमा पर हालात उसी समय से बिगड़े हुए हैं, जब 25 अगस्त को होने वाली दोनों देशों की विदेश सचिव स्तरीय बातचीत भारत ने एकतरफा तौर पर रद्द कर दी थी। भारत सरकार का आग्रह था कि बातचीत शुरू होने से ऐन पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त कश्मीरी अलगाववादियों से मुलाकात न करें, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी। अब धीरे-धीरे पाकिस्तान में भी यह समझदारी बन रही है कि भारत के एतराज के बाद पाक हाई कमिश्नर का कश्मीरी अलगाववादियों से बात करना ठीक नहीं था। पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने माना है कि हुर्रियत नेताओं से पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित की मुलाकात का मौका और वक्त दोनों ही सही नहीं थे। संभव है, ऐसा सोचने वाले लोग रुकी हुई संवाद प्रक्रिया दोबारा शुरू करने का प्रयास करें। पाकिस्तान की ओर से ऐसा कोई संकेत आता है तो हमें उसका सकारात्मक जवाब देना चाहिए। दोनों मुल्कों के बीच बातचीत टूटने से दोनों तरफ के कट्टरपंथियों को खुशी मिलती है और वे रिश्तों की दरार को चौड़ा करने में जुट जाते है। लेकिन आम जनता के हिस्से तकलीफें ही आती हैं। पाकिस्तान में कौन सा फैसला किसके असर में होता है, यह समझना भी आसान नहीं है। सरकार एक तरह से सोच रही होती है, फौज दूसरी तरह से। इनसे अलग आईएसआई का कोई तीसरा ही गेम प्लान होता है। मुमकिन है, मौजूदा स्थिति को लेकर इन तीनों के बीच मतभेद हो और वहां के आतंकवादी संगठन इस दुविधा का फायदा उठाने की कोशिश करें। ऐसे में हमें और भी सतर्क रहने की जरूरत है। दोनों देशों के सैन्य गतिविधियों के महानिदेशकों (डीजीएमओ) की बैठक टकराव टालने का एक रास्ता है। लेकिन इस तरह के उपायों की एक सीमा है। अमेरिका ने दोनों मुल्कों के तनाव पर चिंता जाहिर की है। लेकिन हमारे मामले में कोई तीसरा देश दखल दे, यह कोई सुखद स्थिति नहीं है। हमें विश्व बिरादरी के सामने अपना पक्ष रखना चाहिए ताकि हमारे रुख को लेकर किसी को संदेह न रहे। हम हर कीमत पर शांति बनाए रखने और पड़ोसियों के साथ मिलकर चलने के पक्षधर हैं। लेकिन अपनी सुरक्षा के साथ हम कोई समझौता नहीं कर सकते।
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नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा पाक
पुष्पेश पंत विश्लेषण
संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अपने भाषण में नवाज शरीफ ने जब कश्मीर ‘विवाद’ को उठा एक बार फिर इसका अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कुचेष्टा की, तभी यह साफ हो गया था कि पाकिस्तान का कोई इरादा भारत के साथ रिश्ते सुधारने का नहीं। वह सिर्फ इकतरफा रियायतों का लाभ उठाने को आतुर रहता है। दुर्भाग्यवश पिछली यूपीए सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों ने उसका दुस्साहस निरंतर बढ़ाया। इसी का नतीजा है कि जम्मू कश्मीर राज्य में वास्तविक नियंतण्ररेखा तथा युद्ध विराम का हिंसक उल्लंघन लगातार बढ़ता जा रहा है। सरहद पार से पाकिस्तान द्वारा पठाए अलगाववादी दहशतगर्त राज्य में बगावत और सांप्रदायिक तनाव फैलाने में लगे हुए हैं और इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की रत्ती भर कोशिश पाकिस्तानी सरकार नहीं करती। भारत लंबे समय से इसकी अनदेखी करता रहा है, इस भरोसे कि संभवत: संवाद जारी रखना महत्वपूर्ण है और देर-सवेर पाकिस्तानी पक्ष दूरदर्शी समझदारी दिखलाएगा। हाल की घटनाओं ने यह भ्रम बुरी तरह तोड़ डाला है। ईद के दिन पाकिस्तान की गोलाबारी से सीमावर्ती क्षेत्र में पांच मासूम जानें गई और इस पावन दिन भी इस्लाम पर आधारित पाकिस्तान के पाशविक आचरण में कोई अंतर नहीं दिखा। पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तानी निहत्थे नागरिकों को अपना निशाना बनाते रहे हैं। सीमा की पहरेदारी के लिए तैनात भारतीय जवान लगातार शहीद होते रहे हैं, पर निहत्थे गांव वालों की नृशंस हत्या से व्यापक असंतोष फैलना स्वभाविक है। विडंबना यह है कि पाकिस्तान की हरकतों का यथोचित जवाब देने की बात करने वाली हमारी सरकार इस तरह की हरकतों का मुकाबला नहीं कर सकती। यह कल्पना करना कठिन है कि जवाबी कार्रवाई में हम सरहद पार के पाकिस्तानी नागरिक ठिकानों पर गोलाबारी करेंगे! जो चुनौती हमारे सामने खड़ी है वह काफी उलझी है। पाकिस्तान में सक्रिय तालिबानी तबके यह घोषणा कर चुके हैं कि वह उग्र असहिष्णु, अतिवादी इस्लामी कट्टरपंथी आईएसआईएस के रंग में रंग चुके हैं। याद रहे कि अल कायदा की यह क्रूर नाजायज संतान पहले ही मध्य-पूर्व को बुरी तरह अराजकता के भंवर में फंसा चुकी है। इसका मकसद 21वीं सदी में इस्लामी खिलाफत स्थापित करना है। दकियानूसी बर्बरता और हिंसक राजनीति के नए ‘मानक’ इसने पेश किए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अफगानिस्तान से क्रमश: अमेरिकियों की वापसी के बाद वहां भी इनका प्रभाव अचानक बढ़ने की संभावना प्रबल है। पाकिस्तान की रणनीति हिंसा के इस लावे को अपने यहां बह कर आने से रोकने के लिए इसकी बाढ़ भारत की तरफ मोड़ने की है। जाहिर है, यह जोखिम जम्मू कश्मीर राज्य के लिए ही सबसे अधिक परेशानी पैदा कर सकता है। दुर्भाग्य यह है कि जनतांत्रिक भारत में अगले वर्ष उस राज्य के चुनावों के मद्देनजर केंद्रीय हस्तक्षेप की संभावनाएं बहुत सीमित हैं। जो जनप्रतिनिधि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं, उनके लिए अपने अस्तित्व को बचाए रखना और अपने पारिवारिक न्यस्त स्वार्थो की रक्षा से बढ़ कर कुछ नहीं। यह बात उमर अब्दुल्ला पर भी उतनी ही सटीक बैठती है, जितनी महबूबा मुफ्ती सईद पर। हुर्रियत वालों की तो दुनिया ही निराली है- जब राज्य सर्वनाशक बाढ़ की चपेट में था, यासीन मलिक की प्राथमिकता सरकारी राहत का बहिष्कार करने की थी। अपने पाकिस्तानी आकाओं से मिलने वाली सहायता-संरक्षण की बैसाखियों पर टिके यह खुदगर्ज नेता इस बात का भरपूर फायदा उठाते रह हैं कि अपने को मानवाधिकारों का हिमायती और धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक ‘प्रमाणित’ करने की विवशता में भारत सरकार इनके दमन- शमन-कानूनी उन्मूलन से कतराती रही है। इस बात की अनदेखी करना भी नामुमकिन है कि लंबे अरसे से अस्वस्थ रक्षा मंत्री इस संकट को तवज्जो नहीं दे सके हैं। वैसे भी उनके कंधे पर दोहरा भार है। वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी अहम है। जैसे-जैसे बजट पेश करने की घड़ी निकट आ रही है, अरु ण जेटली की प्राथमिकता सीमा से हटकर मर्मस्थल और महंगाई पर नियंतण्रपाना हो जाएगी। पाकिस्तान ने बड़े कौशल या धूर्तता से भारत की राजनयिक घेराबंदी की है। पाकिस्तान की घुसपैठ- युद्धविराम उल्लंघन तथा प्रायोजित दहशतगर्दी से हमारा ध्यान बंटाने के लिए चीन लद्दाख में दबिश बनाता रहा है। चीन का खतरा कहीं अधिक विकट समझने वाले कम नहीं। जब भारतीय प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलते हैं तो बातचीत पाकिस्तान में पनाह लिए दाऊद की वापसी के लिए मदद तक सीमित रहती है। पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे लगातार हमले उपेक्षित ही रह जाते हैं। एक अन्य परेशानी राज्यों के चुनावों से जुड़ी है। लोकसभा के चुनाव में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त करने के बाद भाजपा का ग्राफ ढलान पर दिखलाई देता रहा है- उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान में विपक्षियों की जीत ने विदेश नीति विषयक विमर्श को फिर से हाशिए पर पहुंचा दिया है। महाराष्ट्र तथा हरियाणा के चुनावी नतीजे आने तक यह उम्मीद व्यर्थ है कि इस स्थिति में कोई बदलाव देखने को मिलेगा। कुछ समय पहले तक इसे सामान्य ज्ञान का हिस्सा समझा जाता था कि जाड़े का बर्फीला मौसम आने के साथ कश्मीर घाटी में शांति लौटने लगती है क्योंकि घुसपैठियों के लिए पाला जमे दर्रे पार करना दुष्कर हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि अब हम इस मौसम में भी निरापद नहीं बैठ सकते। सरहद पार से चिंताजनक रूप से बढ़ी गोलाबारी मात्र घुसपैठियों को रक्षाकवच प्रदान करने के लिए नहीं की जा रही। इसका मकसद मासूम नागरिकों में दहशत फैला सीमावर्ती गांवों को खाली कराना भी जान पड़ता है। निर्जन गांवों की रखवाली के लिए सेना तथा सह-सैनिक दस्तों के जवान भला कब तक तैनात किए जाते रहेंगे? इन संतरियों का मनोबल कमजोर करना भी पाकिस्तानी रणनीति का हिस्सा है। यदि स्थानीय कमांडर मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करते हैं तो पाकिस्तानी प्रचार तंत्र इस भू-भाग को संसार के सबसे विस्फोटक स्थल के रूप में प्रचारित कर इस विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण में जुट जाएगा। अपने जान और माल की हिफाजत के लिए भारतीय सेना तथा सह सैनिक बलों पर निर्भर रहने वाले कश्मीरी हुक्मरान जब सेना के अत्याचारों, मानवाधिकार हनन, ‘आजादी’ और ‘जनमत संग्रह’ की बात उठाते हैं और भारत में विलय के समय संपन्न ‘संधि’ के प्रावधानों की दलील दे राज्य की विशेष स्थिति को रेखांकित करते हैं, तब उनका पाखंड हास्यास्पद ही कहलाता, यदि वह इतना घातक नहीं होता। स्वायत्तता और स्वाधीनता के बहाने अलगाववाद को भड़काने वाले देशद्रोही आचरण को तत्काल बेनकाब करने की जरूरत है। जब तक यह नहीं होता, पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला है। (लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)
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मुंहतोड़ जवाब जरूरी
Thu, 09 Oct 2014
पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा और साथ ही अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जैसे हालात पैदा कर दिए हैं उन्हें देखते हुए उसे सचमुच मुंहतोड़ जवाब देने के अलावा और कोई उपाय नहीं। शैतानी हरकतों के खिलाफ संयम बरतने का मतलब नहीं। पाकिस्तान ने संघर्ष विराम को जिस तरह मजाक बना दिया है उसके मद्देनजर उसे सबक सिखाया ही जाना चाहिए। भारत सरकार ने जिस तरह गोलाबारी थमे बगैर सैन्य अधिकारियों के बीच होने वाली फ्लैग मीटिंग से इन्कार कर दिया उससे पाकिस्तान को यह संदेश मिल जाना चाहिए कि भारत का नया नेतृत्व उससे नए तरह से निपट रहा है। भारतीय जवानों ने किस तरह पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए हैं, इसका पता एक तो उसके संयुक्त राष्ट्र में नए सिरे से रोना रोने से चलता है और दूसरे नवाज शरीफ की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने से। बावजूद इस सबके पाकिस्तान के प्रति तब तक कोई नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए जब तक वह सबक सीखता हुआ नजर नहीं आए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि पाकिस्तान ने संघर्ष विराम के उल्लंघन को अपनी आदत बना लिया है। वह कभी दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए संघर्ष विराम का उल्लंघन करता है तो कभी ऐसे मौकों पर जब भारत के साथ किसी स्तर पर कोई वार्ता होने वाली होती है। माना जा रहा है कि फिलहाल उसकी ओर से इसलिए गोलाबारी की जा रही है, क्योंकि पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रधानमंत्री की ओर से जो कश्मीर राग अलापा गया उसे विश्व समुदाय ने बेसुरा ही पाया। इस पर आश्चर्य नहीं कि पाकिस्तान ने फिर से संयुक्त राष्ट्र में अपना रोना रोया और वहां से उसे यही सुनने को मिला कि वह सीमा के हालात को लेकर भारत से बातचीत करे। पता नहीं पाकिस्तान को कब समझ आएगा कि वह अपनी हरकतों से खुद को अलग-थलग करने का ही काम कर रहा है। इस कोशिश में वह हंसी का पात्र भी बन रहा है। एक गैर जिम्मेदार देश के रूप में पाकिस्तान का उभार वहां के लोगों के लिए चिंता का विषय बनना चाहिए। वह भारतीय सीमा पर जिस तरह की हरकतें आए दिन करता रहता है वह एक किस्म के पागलपन के अलावा और कुछ नहीं। पाकिस्तान को भारत में नई सरकार के तौर-तरीकों और तेवरों के साथ-साथ विश्व समुदाय के रुख-रवैये को भी भांपना चाहिए। चूंकि पाकिस्तान की ओर से सीमा पर इस इरादे से भी गोलाबारी की जाती है ताकि आतंकियों की घुसपैठ कराई जा सके इसलिए भारत को इस मर्ज का भी माकूल इलाज खोजना होगा। पाकिस्तानी सेना ने इस बार नियंत्रण रेखा के स्थान पर जिस तरह अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अधिक उत्पात मचाया उससे यही लगता है कि वह सीमा के उन इलाकों से भारतीय जवानों का ध्यान हटाना चाहता है जहां से आतंकवादियों की घुसपैठ में आसानी होती है। भारत को चाहिए कि वह अपनी सीमाओं को अभेद्य बनाने पर और अधिक ध्यान दे ताकि किसी भी तरह की घुसपैठ की गुंजाइश को ही खत्म किया जा सके। यह सही है कि पाकिस्तान पड़ोसी देश है और उसके साथ विवाद के मसलों का समाधान बातचीत से ही होगा, लेकिन भारत को यह स्पष्ट करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़नी चाहिए उसका असभ्य व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
[मुख्य संपादकीय]
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शांति विराम
जनसत्ता 9 अक्तूबर, 2014: हालांकि भारत और पाकिस्तान की सीमा पर संघर्ष-विराम समझौते के उल्लंघन की घटनाएं पहले भी हुई हैं, पर इस वक्त जैसे हालात दिख रहे हैं उनमें इस समझौते के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। महज एक हफ्ते के भीतर पाकिस्तान की तरफ से सत्रह बार संघर्ष-विराम से उलट घटनाएं हुर्इं। सीमापार से हुई गोलाबारी में जम्मू के सीमावर्ती इलाके में छह व्यक्तियों की जान जा चुकी है। खौफ के मारे काफी तादाद में लोगों को अपने घरबार छोड़ कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पलायन करना पड़ा है। भारत ने भी जवाबी कार्रवाई की है। पाकिस्तान का कहना है कि उसके पंद्रह नागरिक मारे गए हैं और इस तथ्य का हवाला देते हुए उसने भारत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र से शिकायत भी की है। इन दुखद घटनाओं की कड़ी में एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि संघर्ष-विराम समझौते के लिए जो व्यवस्था बनाई गई थी, वह नाकाम रही। दोनों तरफ के सैन्य अधिकारियों की फ्लैग मीटिंग और सैन्य अभियान निदेशकों की बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल सका। ऐसी स्थिति संघर्ष-विराम समझौते का मखौल है। विडंबना यह है कि ऐसे संकट के समय भी देश के पास कोई पूर्णकालिक रक्षामंत्री नहीं है। संघर्ष-विराम समझौते का आग्रह पहले पाकिस्तान की तरफ से ही आया था, जिसे भारत ने मान लिया और नवंबर 2003 में समझौते की औपचारिक घोषणा की गई। जब-तब हुई झड़पों के बावजूद इस समझौते की उपलब्धियों को खारिज नहीं किया जा सकता। अस्सी के दशक से समझौते के पहले तक नियंत्रण रेखा पर टकराव की घटनाएं आए दिन होती रहती थीं। समझौते के बाद वह सिलसिला थम गया। हर साल दोनों तरफ के रक्षा सचिवों की बैठक होती रही, जिनमें सीमा पर शांति बनाए रखने के तकाजे के साथ-साथ और भी विचारणीय मुद््दे होते थे। समझौते से पहले के दशक और बाद के दशक की तुलना करें तो सरहद पर हिंसा में आई कमी साफ नजर आती है। पर पिछले साल की कुछ घटनाओं और ताजा वाकयों ने इस समझौते को लेकर पाकिस्तान के रवैए पर सवाल उठाए हैं। पाकिस्तान की तरफ से जब भी गोलाबारी होती है, कहा जाता है कि इसके पीछे उसका इरादा आतंकवादियों की घुसपैठ कराना रहा होगा। कश्मीर को विश्व-पटल पर चर्चा का विषय बनाने में नाकामी से उपजी उसकी निराशा भी एक बड़ी वजह हो सकती है। पर यह बार-बार साबित हुआ है कि ऐसी रणनीति से उसे कुछ हासिल नहीं होगा। पाकिस्तानी सेना की तरफ से उकसावे की कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब कुछ दिन पहले भारत यह संकेत दे चुका था कि वह कश्मीर समेत सभी द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत के लिए तैयार है। पाकिस्तान के राज्यतंत्र और वहां के मीडिया में भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई थी। पाकिस्तान के विदेश मामलों के सलाहकार ने तब यह तक कहा कि दोनों तरफ के विदेश सचिवों की बैठक से पहले उनके उच्चायुक्त का हुर्रियत नेताओं से मुलाकात करना अनावश्यक था।
पर समस्या यह है कि पाकिस्तानी फौज कई बार वहां की सरकार की परवाह नहीं करती, नवाज शरीफ से उसकी अनबन की खबरें भी आती रही हैं। तो पाकिस्तानी सेना ने बातचीत की संभावना को पलीता लगाने के मकसद से उकसाने की कार्रवाई की? नवाज शरीफ शुरू से भारत से बातचीत की वकालत करते रहे हैं। पर कुछ समय से वे राजनीतिक मुश्किलों से घिरे हुए हैं। क्या पाकिस्तानी फौज के कट्टरपंथी तत्त्व उनकी इस स्थिति का बेजा लाभ उठाना चाहते हैं? जो हो, स्थगित वार्ता प्रक्रिया की बहाली का तरीका हिंसा के साए में नहीं निकाला जा सकता। यह तभी संभव है जब संघर्ष-विराम समझौते का पालन किया जाए।
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युद्ध की कगार पर भारत-पाक
10, OCT, 2014, FRIDAY
भारत और पाकिस्तान के संबंध ऐसे तनावपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए हैं, जहां जरा सी चिंगारी युद्ध की आग में तब्दील हो सकती है। जम्मू-कश्मीर की कठुआ, जम्मू और सांबा सेक्टर की 60 चौकियोंंपर पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी की गई, जिसमें आठ लोगों की मौत हो चुकी है और लगभग 80-85 लोग घायल हुए हैं। मृतकों में सामान्य नागरिक भी शामिल हैं, जो न हमले के लिए, न जवाबी कार्रवाई के लिए जिम्मेदार हैं, जिन्हें युद्ध नहींशांति चाहिए, क्योंकि युद्ध में सिवाए बरबादी के कुछ हाथ नहींलगता और शांति से जीना जिनका अधिकार है। अफसोस है कि जम्मू-कश्मीर के नागरिक बारंबार अपने इस अधिकार से वंचित हो रहे हैं। हाल ही में बाढ़ और बारिश की भयंकर प्राकृतिक आपदा से नागरिकों को जूझना पड़ा। भारत और पाकिस्तान दोनों ही ओर की जनता पर प्रकृति की कुपित दृष्टि पड़ी। तब भारत ने अपने नागरिकों के साथ-साथ पाकिस्तान की जनता की मदद की पेशकश भी की। पड़ोसी होने के नाते यह स्वाभाविक पहल थी। लेकिन पाकिस्तान न जाने क्यों पड़ोसी होने का धर्म नहींनिभा पा रहा है। संरा के न्यूयार्क में संपन्न अधिवेशन में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कश्मीर का मुद्दा उठाया। अब पाकिस्तान की ओर से युद्ध विराम का उल्लंघन हो रहा है और लगातार घुसपैठ व गोलीबारी की घटनाएं हो रही हैं। जाहिर है इस सब के पीछे कोई सोची-समझी साजिश है। अभी कुछ समय पहले पाकिस्तान में मौलाना कादरी व इमरान खान के नेतृत्व में प्रधानमंत्री के खिलाफ आंदोलन चलाया गया, जिसे किसी तरह सरकार ने खत्म करवाया। उसके ठीक बाद नवाज शरीफ ने भारत विरोधी बयान संरा में दिए और अब यह अकारण युद्ध का माहौल बन गया है। संभव है कि पाकिस्तान की सरकार एक बार फिर कठपुतली की तरह नचायी जा रही हो, और डोर आईएसआई व सेना के हाथों में हो। अगर पाकिस्तान के भारत के साथ मिठास भरे, मैत्रीपूर्ण संबंध हो जाएंगे, तो आतंकवाद के खात्मे में देर नहींलगेगी, जिसका नुकसान हथियारों के व्यापारियों को भुगतना पड़ेगा। अमरीका अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं हटा रहा है, और चाहता है कि भारत वहां अधिक सक्रिय भूमिका में दिखे, इसी तरह ईरान में आईएस के खिलाफ लड़ाई में भी वह भारत का साथ चाहता है। मुमकिन है इन बातों का कोई संबंध इस हमले से हो। भारत की पारंपरिक विदेश नीति में युद्ध के लिए कोई स्थान नहींहै और वह अपने पड़ोसियों के साथ-साथ पूरे विश्व में शांति स्थापित करना चाहता है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन की बुनियाद में यही उद्देश्य निहित था। लेकिन अब गुटनिरपेक्ष आंदोलन को जानबूझकर अप्रासंगिक बना दिया गया है और केवल व्यापार को ही प्रासंगिक बताया जाता है। व्यापारिक हित साधने के लिए सरकारों को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। फिर इसके लिए युद्ध की विभीषिका की क्यों न फैलानी पड़े। पाकिस्तान की सरकार फिलहाल उसी मोहरे की भांति इस्तेमाल हो रही है। जहां तक भारत का प्रश्न है, अपनी जनता और सीमाओं की रक्षा के लिए वह जवाबी कार्रवाई कर रहा है। पाकिस्तान की सीमाओं से लगभग 20 हजार लोगों को हटना पड़ा है और 12-15 लोगों के मारे जाने की खबर वहां के अखबारों में है। भारत की कड़ाई से घबराए नवाज शरीफ ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई है और संरा सैन्य निगरानी समूह के पास शिकायत भी दर्ज कराई है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सैन्य निगरानी समूह को कश्मीर आने की इजाजत नहींदेगा। हमला पाकिस्तान की ओर से प्रारंभ किया गया है, इसलिए उसे रोकना भी उसकी ही जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को आश्वस्त किया है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। भारत की जनता अपने सैनिकों की क्षमता और देशप्रेम के जज्बे से वाकिफ है। किंतु बेहतर होता प्रधानमंत्री इस मुश्किल घड़ी में चुनावी रैलियों और निवेशकों को संबोधित करने के साथ-साथ देश के राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं के साथ बैठक करते, उन्हें पाकिस्तान के संबंध में सरकार की सोच से अवगत कराते और थोड़ा लोकतांत्रिक तरीके से इस मसले का हल निकालने की पहल करते। पाकिस्तान को कड़ा जवाब देने में भारत सक्षम है, लेकिन युद्ध के हालात खत्म हों, ऐसी कूटनीतिक सक्षमता भी भारत को दिखाना चाहिए।
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दंड और भेद का प्रयोग ही कारगर
Sun, 12 Oct 2014
पाकिस्तान के बारे में यह बात याद रखने की जरूरत है कि भारत के साथ दुश्मनी ही उसके अस्तित्व को सार्थक और तर्कसंगत बनाती है। अगर हमारे साथ रिश्ते सामान्य और दोस्ताना होने की जरा सी भी संभावना पैदा होती है तो वहां के शासक वर्ग को भयंकर असुरक्षा का भाव सताने लगता है। पाकिस्तान की फौज की इस देश के राजनीतिक जीवन में अहमियत इसी कारण समझी जाती रही है कि सरहद पार के शत्रु से मुल्क की रक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ वही निभा सकती है। 1965 और 1971 में जिद और हार के बावजूद अभी हाल तक पाकिस्तानी हुक्मरान अपनी फौज की असलियत से मुंह चुराते रहे हैं। कारगिल की दास्तान का पाकिस्तानी 'संस्करण' भारतीय बखान को शीर्षासन करता दिखलाई देता है। ओसामा बिन लादेन के खात्मे वाले अमेरिकी अभियान के बाद यह लीपापोती असंभव हो गई कि पाकिस्तानी फौज उस 'असफल' राज्य की संप्रभुता-अखंडता की रक्षा कर सकती है पर इसके साथ ही उस पर यह दबाब कई गुना बढ़ गया है कि न सही अमेरिका लेकिन भारत को लहूलुहान करने की क्षमता आज भी उसमें है और उसकी आलोचना करने वाले देशद्रोही ही करार दिए जाने चाहिए! यहां यह भी रेखांकित करना परमावश्यक है कि पाकिस्तानी फौज का कट्टरपंथी इस्लामीकरण जनरल जिया के कार्यकाल से आरंभ हो हाल के बरसों में पूरी तरह संपन्न हो चुका है। इसलिए फौज और कट्टरपंथी जिहादी तत्वों के बीच कोई बुनियादी मतभेद नहीं हैं। दशकों के भ्रष्टाचारी जीवनयापन के बाद नरम पड़ चुके आला अफसर नौजवान वंचित वर्ग से भरती सिपाहियों और अफसरों का प्रतिरोध करने की हालत में या मानसिकता वाले नहीं। अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सामरिक जरूरतों के दबाब में जिस रणनीति का अनुसरण किया है उसकी वजह से भी अब यह लगभग असंभव है कि पाकिस्तान के सामाजिक-आर्थिक जीवन में फौज के एकाधिकार को कोई जनतांत्रिक तबका चुनौती दे सके। दुर्भाग्य से मध्यपूर्व में हिंसक अराजकता और दहशतगर्दी के च्वार ने भारत के लिए इस गुत्थी को और भी उलझा दिया है। वहाबी हमलावर असहिष्णु इस्लाम का निर्यात हो अथवा ईराक-सीरिया में नई 'खिलाफत' की स्थापना पाकिस्तान को लगता है भारत को अस्थिर और अशांत रखने के लिए वातावरण उसके अनुकूल है। अमेरिकियों ने इस दुस्साहसिक सोच को हमेशा बढ़ावा दिया है, कभी यह कह कर कि भारत और पाकिस्तान दोनों एटमी हथियारों से लैस हैं। अत: दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे खतरनाक विस्फोटक संकट स्थलों में एक है यहां कोई विवाद भड़कना नहीं चाहिए तो कभी वह बड़ी कुटिलता से अच्छे और बुरे तालिबानों में फर्क करने लगते हैं। पाकिस्तान के अघोषित युद्ध का जवाब मुलायम राजनय कभी भी नहीं हो सकता। न ही जल्दबाजी में जंग का ऐलान। पर पाकिस्तान के अवाम के साथ हमदर्दी का मतलब वहां की जमीनी हकीकत की अनदेखी कतई नहीं हो सकता। पाकिस्तान की समस्या को जम्मू-कश्मीर राच्य या भारतीय मुसलमानों के असंतोष के साथ जोड़ने की मूर्खता से तत्काल निजात पाने की जरूरत है। पाकिस्तान की दुस्साहसिकता को 'दंडित' करने की सामर्थ्य भारत की है। हां, इस काम को कैसे अंजाम दिया जाए इसकी चर्चा सार्वजनिक बहस का विषय नहीं हो सकती। 'साम-दाम' नहीं 'दंड' और 'भेद' के प्रयोग दरकार है!
-प्रो पुष्पेश पंत [स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जेएनयू]।
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बीएसएफ का पराक्रम
Sun, 12 Oct 2014
भारत-पाकिस्तान की तीन हजार किमी से अधिक लंबी सीमा गुजरात, राजस्थान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर को छूती हुई जाती है। ज्यादातर सीमा निर्धारित है। दोनों सरकारें उसको मानती हैं परंतु जम्मू-कश्मीर का 772 किमी का हिस्सा ऐसा है जिसे नियंत्रण रेखा कहा जाता है। यह सीमा रेखा विवादास्पद है? कश्मीर में सीमाओं की सुरक्षा की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि नियंत्रण रेखा की जिम्मेदारी तो फौज के पास है यद्यपि इस नियंत्रण रेखा का करीब 288.95 किमी हिस्सा ऐसा है जो सीमा सुरक्षा बल को दिया गया है। बीएसएफ इस क्षेत्र में सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल में काम करती है। इंटरनेशनल बार्डर यानी अंतरराष्ट्रीय सीमा के बारे में कोई विवाद नहीं है। उस पर सीमा सुरक्षा बल पेट्रोलिंग करती है। इसमें भी जम्मू क्षेत्र में बीएसएफ सेना के ऑपरेशनल कंट्रोल में अपना दायित्व निभाती है। सामान्यत: जो संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं होती है वह नियंत्रण रेखा पर होती है। परंतु पिछले कुछ महीनों से देखा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी पाकिस्तान संघर्ष विराम का उल्लंघन कर रहा है। अर्थात सीमाओं की पवित्रता नहीं रह गई है। नियंत्रण रेखा हो या अंतरराष्ट्रीय सीमा हो, गोलाबारी हो सकती है। इधर विगत वर्षो में देखा गया है कि पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम की घटनाओं में बराबर वृद्धि हो रही है। अक्टूबर माह में अकेले उल्लंघन की 63 घटनाएं हो चुकी है। घटनाएं क्यों हो रही हैं इसके कई कारण हो सकते हैं। एक तो यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा उठाने की कोशिश की थी परंतु उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली। इससे अपनी खीझ निकालने के लिए पाकिस्तान कश्मीर की सीमा पर संघर्ष विराम का बराबर उल्लंघन कर रहा है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इन उल्लंघनों में पाकिस्तानी फौज का ज्यादा हाथ है, चुनी गई सरकार का कम। ऐसे भी नवाज शरीफ सरकार की हालत खस्ता है। इस्लामाबाद में इमरान खान की तहरीक ए इंसाफ और ताहिर उल कादरी के सम्मिलित प्रदर्शनों से सरकार की काफी किरकिरी हुई है। वास्तविक कारण जो भी हों संघर्ष विराम के उल्लंघन के मामले गंभीर होते जा रहे हैं और उसका सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि इसका खामियाजा सीमावर्ती गांव वालों को भुगतना पड़ रहा है। जहां तक सीमा सुरक्षा बल का सवाल है, वर्तमान सरकार ने उसे जवाबी कार्रवाई की पूरी छूट दे रखी है। प्राप्त समाचारों के अनुसार बीएसएफ ने भी भारी जवाबी गोलाबारी की है। एक-एक दिन में करीब हजार से डेढ़ हजार के बीच में गोले दागे गए हैं। कहा जाता है कि इससे पाकिस्तान की चौकियों और घुसपैठियों के बने कैपों को काफी नुकसान हुआ है। बीएसएफ के महानिदेशक ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान से बात करने का कोई फायदा नहीं है पिछली बार उनसे 29 अगस्त को जो वार्ता हुई थी उसमें उन्होंने संघर्ष विराम के पालन का आश्वासन दिया था परंतु इससे मुकर गए। बीएसएफ की जवाबी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय सीमा पर करीब 150 किमी के क्षेत्र में हुई। इसका पाकिस्तानियों पर अवांछित असर पड़ा है। वह जान गए हैं कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में उन्हें ईट का जवाब पत्थर से मिलेगा। इस वर्ष अभी तक जो भी संघर्ष विराम की घटनाएं हुई हैं उसमें 13 भारतीय मारे जा चुके है, इनमें केवल एक जवान था। पाकिस्तान की तरफ प्राप्त सूचनाओं के अनुसार 25 व्यक्तियों की मृत्यु हुई है जिसमें तीन सिपाही थे, दो लश्कर-ए-तैयबा के लड़ाके और शेष गांव वाले थे। स्पष्ट है कि भारत की तरफ से सीमा सुरक्षा बल और फौज ने प्रभावी ढंग से जवाबी कार्रवाई की। भारत ने इस बार काफी सख्त रुख अपनाया है। सरकारी तौर पर कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी नहीं रुकेगी। तब तक न तो कोई फ्लैग मीटिंग होगी और न ही कोई शांति वार्ता। दुर्भाग्य से पाकिस्तान एक ही भाषा समझता है और वह भाषा है सैन्य बल की। भारत से अब उन्हें इसी भाषा में उत्तर मिल रहा है,यह देश की जनता के लिए संतोष का विषय है।
-प्रकाश सिंह [पूर्व महानिदेशक- भारतीय, सीमा सुरक्षा बल]।
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जंग का नहीं माद्दा, छद्म रूप पर आमादा
Sun, 12 Oct 2014
एक अक्टूबर से जम्मू में 200 किमी लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तानी रेंजरों की शुरू हुई अकारण गोलाबारी का भारतीय सुरक्षा बलों ने मुंह तोड़ जवाब दिया है। भारत और पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर औपचारिक सीमारेखा है। सात सौ किमी से अधिक लंबी लाइन ऑफ कंट्रोल (एलओसी) का सीमांकन 1972 में हुआ। नौ अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ तीखा हमला करते हुए कहा, 'दुश्मन को अहसास हो गया है कि समय बदल गया है और उनकी पुरानी आदतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।' रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने पाकिस्तान को 'आक्रामक' करार देते हुए चेतावनी दी कि पाकिस्तान को उनके दुस्साहस की कीमत बहुत महंगी पड़ेगी।
भारत-पाकिस्तान बॉर्डर की स्थितियों की निगरानी कर रहे शीर्ष सुरक्षा विश्लेषकों का आकलन है कि पाकिस्तान की तरफ से हो रही भारी गोलीबारी केवल वहां के रेंजरों का काम नहीं है। उनको वहां की सेना का भी हर तरीके का साथ मिल रहा है। तमाम राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान के घरेलू संकटों से ध्यान भटकाने के लिए सीमा पर हमला और आतंकियों की घुसपैठ कराना उसकी आजमाई हुई रणनीति है। इस आक्रामकता के पीछे उसकी मंशा क्या है? संघर्ष विराम के लगातार उल्लंघन ने साबित कर दिया है कि अपनी आंतरिक एकता को बरकरार रखने के लिए पाकिस्तान को भारतीय खतरे की दरकार है। इसमें आंशिक सच्चाई भी है। प्रभावशाली प्रांत पंजाब और छोटे प्रांतों बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनखवा के आपसी विवादों के बीच भारत के खिलाफ अविश्वास और कश्मीर मुद्दा उसके लिए राष्ट्रीय भावनात्मक अपील का काम करते हैं। यह एक ऐसा जतन है जिसके जरिये आपसी विवाद खत्म हो जाते हैं। भारत की दुश्मन छवि पाकिस्तानी अवाम का ध्यान सामाजिक असमानता, जातीय संघर्ष और विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक प्रगति की कमी से ध्यान भटकाने में भी उपयोगी है। लेकिन इन सबके बावजूद पाकिस्तान में कश्मीर को लेकर खास किस्म का जुनून है। कश्मीर उनकी राष्ट्रीय चरित्र का प्रतीक बन गया है। कश्मीर दोनों देशों के बीच सभी ऐतिहासिक झगड़ों की जड़ में रहा है और इसकी वजह से ही समाधान निकालने के सभी प्रयास विफल हुए हैं। बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों का मानना है कि भारत की कश्मीर को कब्जे में रखने की जिद इस बात का सुबूत है कि वह पाकिस्तान को संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करता। उनकी नजर में वह पाकिस्तान का हिस्सा है। वे 'भारतीय कब्जे वाले कश्मीर' में मुस्लिमों की रक्षा को नैतिक जिम्मेदारी समझते हैं। पाकिस्तान को यह ध्यान रखना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां पर किसी एक समुदाय की बहुलता है। तीन धर्मो का यहां प्रतिनिधित्व है। कश्मीर घाटी और गिलगित में मुस्लिम बहुलता है तो जम्मू क्षेत्र में हिंदुओं की बहुलता है। इसी तरह लद्दाख और बाल्टिस्तान में बौद्धों का प्रभुत्व है। कश्मीर घाटी के केवल कुछ मुस्लिम समूह मांग कर रहे हैं कि उनको आजादी के संबंध में निर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए। कश्मीर मसले की जड़ में महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 1947 से पहले पाकिस्तान के लिए आल इंडिया मुस्लिम लीग के राजनीतिक एजेंडे में कश्मीर कभी शामिल नहीं था। यह भी एक तथ्य है कि 1947 तक मुस्लिम लीग एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने कश्मीर मसले पर दखलंदाजी नहीं की थी। यहां तक कि मुहम्मद अली जिन्ना ने वहां जाने के बाद भी मुस्लिम बहुसंख्यक होने के बावजूद उसकी भारत और पाकिस्तान से स्वतंत्रता की पैरोकारी की थी। अब भारत के ऊपर इस मुद्दे के समाधान के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं होने से वह बढ़त की स्थिति में है। कश्मीर पर वह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की अनुमति नहीं देगा। ऐसे में कश्मीर के प्रति पाकिस्तान का क्या रवैया है? हर अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इस मुद्दे को उठाने के साथ जिहाद के नाम पर आंतकियों को सैन्य मदद उपलब्ध कराना और उनको स्वतंत्रता सेनानी कहना कोई बहुत प्रभावी रुख नहीं है। कश्मीर को भारत से ताकत के दम पर नहीं हथिया पाने के कारण वह आतंकवाद और संघर्ष विराम उल्लंघन को बढ़ावा दे रहा है। अन्य विकल्पों और रणनीतियों पर गंभीर बहस के अभाव में कश्मीर पर इसी दुस्साहसिक विदेश नीति को पाकिस्तान ने अपनी रणनीति बना रखा है। सेना के सर्वाधिक ताकतवर होने के चलते इसने लोकतंत्र को विफल कर दिया है। सरकारें और सेना राष्ट्रीय एकता और पहचान को बनाए रखने के लिए सीमा को ओर देखती हैं। भारत को एक खतरे के रूप में देखा जाना यहां की राष्ट्रीय एकता के साथ जुड़ा हुआ है।
-प्रो. उमा सिंह [पाकिस्तान विशेषज्ञ]।
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करारा जवाब
Sun, 12 Oct 2014
पाकिस्तान के साथ भारत 3323 किमी सीमा साझा करता है। इसमें 772 किमी लंबी नियंत्रण रेखा (एलओसी) भी शामिल है। पाकिस्तान द्वारा आए दिन सीमा पर घुसपैठ वाली देश विरोधी गतिविधियों या संघर्ष विराम उल्लंघन के तहत गोलाबारी के चलते दोनों देशों के बीच खटास चरम पर पहुंच जाती है। इस बार पाकिस्तान ने एलओसी के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर भी लगातार गोलाबारी की। भारत के कड़े जवाब के चलते भले ही उनकी बंदूकें शांत हो गई हैं लेकिन ऐसा मानना गलत ही होगा कि वे अपनी इस हरकत से बाज आ गए हैं। लिहाज भारत के इसके स्थायी हल के लिए दंड और भेद के साथ साम, दाम को भी इस्तेमाल करना होगा।
संघर्ष विराम उल्लंघन के मामले
2011 -- 62
2012 -- 114
2013 -- 347
2014 -- 364 (अक्टूबर तक)
नियंत्रण रेखा
दोनों देशों को अलग करने वाली नियंत्रण रेखा को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कई मतभेद उभरते रहे हैं। अमन और जंग के बीच मौजूद इस बारीक रेखा पर पेश है एक नजर:
विवादों की रेखा
772 किमी लंबी नियंत्रण रेखा (एलओसी) एक ऐसी रेखा है जो वर्तमान में भारत और पाकिस्तान के बीच वस्तुत: सीमा रेखा की तरह जानी जाती है।
नियंत्रण
भारतीय नियंत्रण के तहत आने वाला क्षेत्र जम्मू-कश्मीर है, जबकि पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इलाकों में गिलगित, बाल्टिस्तान और गुलाम कश्मीर शामिल हैं।
शिमला समझौता
संयुक्त राष्ट्र द्वारा मूलरूप से परिभाषित संघर्ष विराम रेखा को 1972 में दोनों देशों के बीच हुए शिमला समझौते में नियंत्रण रेखा नाम दिया गया।
घुसपैठ की रोकथाम
पाकिस्तान की तरफ से आतंकियों की घुसपैठ पर रोक लगाने के लिए भारत ने 550 किमी इस रेखा पर कंटीले तारों की बाड़ लगा रखी है।
गश्त की दिक्कत
पूरी नियंत्रण रेखा पर कई गहरी घाटियां और नदी की धाराओं के चलते यह बहुत दुर्गम है। लिहाजा चौकसी के लिए गश्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। रात और दिन में नियंत्रण रेखा की 40 हजार जवान चौकसी करते हैं। पूरी नियंत्रण रेखा पर हर 500 मीटर पर एक पर्यवेक्षण पोस्ट तैयार किया गया है, हालांकि यह दूरी वहां के भूभाग के आधार पर भी निर्भर करती है।
विरोध दर्ज करने का तरीका
इस तरह की घटनाओं के बाद विरोध दर्ज कराने के लिए दोनों देशों ने पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की है। हॉटलाइन, फ्लैग मीटिंग, डॉयरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) की मीटिंग और दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के डायरेक्टर जनरल मुलाकातों के जरिए इस मुद्दे को उठाते हैं।
* पंजाब, राजस्थान और गुजरात व जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्सों में जमीनी सीमा रेखा स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में चिह्नित है।
* गुजरात के सरक्रीक में सीमा को लेकर विवाद है। जम्मू कश्मीर में 772 किमी लंबी नियंत्रण रेखा दोनों देशों को बांटती है। सियाचिन ग्लेशियर भी विवादित है।
* नियंत्रण रेखा के सबसे उत्तरी केंद्र से सियाचिन में इंदिरा कोल तक मौजूद 'एक्चुअल ग्राउंड पोजीशन लाइन' वर्तमान में दोनों देशों को अलग करती है। इस पूरे ग्लेशियर की कमांडिंग पोजीशन पर भारतीय सेना का कब्जा है।
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पड़ोसी की बौखलाहट
Sun, 12 Oct 2014
भारत से पाकिस्तान की खटास जगजाहिर है। भारत बार-बार अपने बड़े भाई के फर्ज के तहत उसे गले लगाने को आगे बढ़ता है लेकिन हर बार पड़ोसी से उसे घाव खाना पड़ता है। वैश्विक पटल पर भारत के बढ़ते रुतबे और अपनी अंदरुनी दिक्कतों को छिपाने जैसे तमाम मसलों पर पर्दा डालने के लिए पाकिस्तान कश्मीर राग अलापने लगता है। संघर्ष विराम का उल्लंघन कर गोलाबारी इसकी इसी नीति का परिणाम है। विशेषज्ञों की मानें तो संघर्ष विराम की ताजा घटनाओं के गर्भ में कई बातें निहित हैं।
कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण
कश्मीर पर भारत संयुक्त राष्ट्र सहित किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को सिरे से खारिज करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र भी इसे दोनों के बीच आपसी बातचीत से हल करने की सलाह देता रहा है। हाल में संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मसले को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा उठाए जाने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने इस मसले में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज कर दिया था। लिहाजा नवाज के बयान को खास तवज्जो नहीं मिली थी।
अंदरूनी हालात
पाकिस्तान जैसे ही आंतरिक मोर्चे पर घिरता है, विश्व का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी उकसावे वाली हरकतें करने लगता है। राजनीतिक कलह के साथ तमाम आर्थिक-सामाजिक मोर्चो पर देश की हालत खस्ता है।
घुसपैठ
पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकी ऊंची चोटियों पर बर्फ जमने से पहले घुसपैठ से कश्मीर आने के मंसूबे रखते हैं। उनके इस मंसूबे को सेना का समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान सीमा पर गोलाबारी करके भारतीय सेना का ध्यान बंटाने की रणनीति के साथ काम करता है।
ध्यान खींचने की हसरत
अपने मित्र देशों से कम तवज्जो मिलते ही पाकिस्तान अति सुरक्षित महसूस करने लगता है। पाकिस्तान में लादेन के मिलने के बाद एक तरह से वह अमेरिका का भरोसा खो चुका है। अफगानिस्तान में भी उसे अब पाकिस्तान की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं रह गई है। दूसरी तरफ पाकिस्तान के स्वाभाविक मित्र माने जाने वाला चीन भी उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहा है। चीन में बढ़ते इस्लामिक आतंकवाद की जड़ें पाकिस्तान में मिलने से वह भी इसके प्रति सशंकित है। हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के भारत दौरे के बाद उनका पाकिस्तान जाना भी तय था, लेकिन यह रद हो गया।
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जिद्दी और अड़ियल रवैया
Sun, 12 Oct 2014
युद्ध किसी समस्या का हल नहीं होता लेकिन इसके अंतिम विकल्प बनने की बात को खारिज भी नहीं किया जा सकता है। कई बार किसी एक पक्ष का जिद्दी और अड़ियल रवैया इस विनाशकारी कृत्य को अपरिहार्य बना देता है। सत्य और अहिंसा में विश्वास करने वाले हमारे देश के पौराणिक संदर्भ ऐसे वाकयों से भरे हैं। पांच गांव न देने की कौरवों की जिद ने महाभारत की पटकथा लिख दी थी।
जिद
वर्तमान में ऐसे ही एक विनाशकारी जंग की पटकथा लिखने को पड़ोसी देश पाकिस्तान आतुर दिख रहा है। संबंधों की बेहतरी के लिए बढ़ाए गए हमारे प्रस्तावों को ठुकराकर वह सीमा पर गोलाबारी करने में लगा है। ऐसा करके भले ही वह अपने निजी स्वार्थो को सिद्ध करने का मंसूबा रखता हो, लेकिन हमारे जवाबी हमले ने उसके हौसले पस्त कर दिए हैं। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम का यह पहला वाकया हो, लेकिन इस बार लगातार गोलाबारी में कई लोग हताहत हुए। हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा। लिहाजा भारत को भी मुंहतोड़ जवाब देना लाजिमी हो गया।
जीत
पूर्व के संघर्ष विराम उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को कमजोर भारतीय राजनीतिक इच्छाशक्ति की ढाल मिल जाया करती थी। इस बार ऐसा नहीं है। भारत ने अपनी रणनीति में प्रभावी बदलाव किया है, तभी तो हमारे प्रधानमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री और गृह मंत्री पाकिस्तान को करारा जवाब देने की बात डंके की चोट पर कह रहे हैं। हमारे सुरक्षा बल पाकिस्तान को उसकी उदंडता का सबक सिखा रहे हैं। बेकसूरों की जानें सीमापार भी जा रही हैं, लेकिन शायद पड़ोसी को इसकी परवाह नहीं। ऐसे में संवादहीनता की स्थिति में पड़ोसी से पार पाने वाले कदमों की पड़ताल बड़ा मुद्दा है।
जनमत
क्या सीमा पर हो रही गोलाबारी के बीच पाकिस्तान से संवाद के रिश्ते जायज हैं?
हां 10 फीसद
नहीं 90 फीसद
क्या आप इससे सहमत हैं कि सीमा पर भारतीय सुरक्षा बल पाक गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं?
हां 83 फीसद
नहीं 17 फीसद
आपकी आवाज
पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने का नतीजा है कि वो बौखला गया है। संवाद के इतने मौके देने के बाद भी उसमें कोई सुधार नहीं। उससे उम्मीद करना बेकार है।-स्मिता श्री
हमें अपनी सेना पर पूरा विश्वास है कि वह दुश्मनों को अपने आखिरी सांस तक डटकर सामना करेगी और पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देगी। -सुमन
पाकिस्तान सिर्फ गोलियों की भाषा समझता है। -रुपेश100862@जीमेल.काम
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मुंहतोड़ भारतीय जवाब
Sun, 12 Oct 2014
नई सरकार के आते ही मानो देश के विदेश और खासकर पाकिस्तान नीति में न्यूटन के नियम का समावेश हो गया हो। हर क्रिया के बराबर तथा विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है, इस नियम के तहत अधिक तीव्रता के साथ भारत पाकिस्तान के हर कदम का जवाब देने लगा। भारत-पाकिस्तान नीति को जानने वाले इस बदलाव को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की ताकत मान रहे हैं। अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी नेकनीयती का इजहार किया था। लेकिन सचिव स्तरीय वार्ता से ठीक पहले अलगाववादियों से पाकिस्तानी राजदूत की बातचीत सरकार को नागवार गुजरी। लिहाजा शांति वार्ता खटाई में पड़ी। अब सीमा पर गोलाबारी की मुंहतोड़ जवाब भी भारतीय नीति नियंताओं की दृढ़ इच्छाशक्ति के बूते ही संभव हो रहा है। इस साल जून के बाद सीमा पर पाकिस्तान की किसी भी हरकत का जवाब भारत ने दोगुनी तीव्रता से दिया है।
2014
पाकिस्तान द्वारा संघर्ष विराम उल्लंघन के तहत की गई गोलाबारी में 13 भारतीय मारे गए। इनमें एक जवान भी शामिल है। भारत द्वारा जवाबी फायरिंग में पाकिस्तान से 25 मौतों की खबर है। इनमें तीन सेना के जवान और दो लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी भी शामिल हैं।
2013
सीमा पर हुई गोलाबारी में 12 भारतीय जवान शहीद हुए जबकि एक नागरिक की मौत हुई। दूसरी तरफ पाकिस्तानी मीडिया स्रोतों के अनुसार वहां नौ सैनिक मारे गए और छह नागरिकों की जानें गई।
क्षमता
सीमा पर पाकिस्तानी रेंजर्स की तुलना में भारतीय सीमा सुरक्षा बल की संख्या तीन गुना है। लिहाजा पाकिस्तानी सेना का साथ मिलने के बाद भी रेंजर्स भारतीय जवाबी कार्रवाई के सामने टिक नहीं पाते हैं। और ऐसे में अगर भारतीय सैन्य बलों को खुली छूट मिल जाती है तो मुंहतोड़ जवाब तब तक दिया जाता है जब तक कि पाकिस्तान की तरफ से फायरिंग बंद नहीं हो जाती है।
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सौ फीसद सुरक्षित हैं हमारी सीमाएं
Mon, 13 Oct 2014
कई सालों के बाद सीमा पार से फायरिंग का भारत ने करारा जवाब दिया है। सीमा की सुरक्षा के लिए तैनात देश के बड़े अर्द्धसैनिक बल बीएसएफ के जवान पाक फौजों को उन्हीं की भाषा में जवाब देने में सफल रही हैं। बीएसएफ के महानिदेशक देवेंद्र कुमार पाठक स्वीकार करते हैं कि उन्हें मोदी सरकार ने जमीनी हालत के अनुसार फैसले लेने की खुली छूट दी थी। यह पहला मौका था जब किसी केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल के प्रमुख से सीधे प्रधानमंत्री ने बात की हो। हौसले से लबरेज बीएसएफ प्रमुख ने पाकिस्तान की ओर से हुई फायरिंग, उसके खिलाफ की गई जवाबी कार्रवाई और सीमाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता नीलू रंजन से खुलकर बात की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश:
सीमा पार से फायरिंग के पीछे पाकिस्तान की क्या मंशा हो सकती है?
हम भी नहीं समझ पा रहे हैं कि इस तरह से वे फायरिंग क्यों कर रहे हैं? हम इतना जानते हैं कि हमारी तरफ से इसकी शुरुआत नहीं हुई है। दोनों ओर से 29 अगस्त को फ्लैग मीटिंग में इस तरह की फायरिंग नहीं करने पर स्पष्ट सहमति बनी थी, लेकिन इसके 40 दिन भी नहीं हुए और दो अक्टूबर को फिर फायरिंग शुरू कर दी। सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह रही कि सीमा पार से दशहरे के त्यौहार के दौरान फायरिंग की। वे ईद पर भी फायरिंग करने से नहीं चूके।
कहा जा रहा है कि घुसपैठियों को कवर देने के लिए यह फायरिंग की जा रही है।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। उनमें घुसपैठ भी एक कारण हो सकती है, लेकिन सिर्फ घुसपैठ कराने के लिए ही इतनी फायरिंग हो रही है, यह कहना भी सही नहीं है। इसके पीछे उनके कुछ बड़े कूटनीतिक उद्देश्य भी हो सकते हैं।
सीमा पर फायरिंग तो पहले भी होती रही है, लेकिन केंद्र में नई सरकार बनने के बाद इसका जवाब देने की नीति में कोई अहम बदलाव आया है कि नहीं?
सरकार की सोच क्या है, यह तो प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और गृहमंत्री के बयानों से स्पष्ट हो जाता है। इससे ज्यादा और कहने की मुझे क्या जरूरत है।
आपको इस बार कोई विशेष निर्देश मिला हो सरकार की ओर से?
प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और गृहमंत्री के बयान के बाद कुछ कहने की जरूरत नहीं है। सरकार की ओर से कोई नहीं कहेगा कि 20 गोली चलाओ या 50 गोली चलाओ। सीमा पर हम लोग तैनात हैं। वहां जो निर्णय लेना है, हमें ही लेना होता है।
बीच में दो दिन के लिए फायरिंग बंद हुई फिर शुरू हो गई, क्या कारण है?
फायरिंग क्यों शुरू की, क्यों बंद की और फिर क्यों शुरू कर दी इस पर कुछ नहीं कह सकते हैं।
पहले ज्यादातर फायरिंग नियंत्रण रेखा पर होती थी, लेकिन इस बार अंतरराष्ट्रीय रेखा को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?
ऐसा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय रेखा पर पहले भी फायरिंग होती रही है। इस साल जुलाई-अगस्त में करीब 40-45 दिन यहां फायरिंग चली थी।
भारत की ओर कुल कितने राउंड की फायरिंग की गई है, कोई अनुमान?
अभी तक हमने कोई गिनती तो नहीं की है, लेकिन फायरिंग काफी हुई है।
ज्यादा किस तरफ से हुई है?
हमारी तरफ से फायरिंग ज्यादा हुई हैं। हमने उनकी तुलना में कई गुना ज्यादा फायरिंग की है।
क्या इसे फायरिंग के खिलाफ नीति में बदलाव का संकेत मान सकते हैं?
मैंने तो आपको पहले ही बताया कि सरकार की नीति और सोच प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और गृहमंत्री के बयान से साफ हो जाती है।
बीएसएफ प्रमुख के नाते आप क्या गारंटी देंगे। देश की सीमाएं कितनी सुरक्षित हैं?
बिल्कुल सुरक्षित हैं। सौ फीसद सुरक्षित हैं। बीएसएफ का नारा है-जीवनपर्यंत कर्तव्य। हमारा हर सिपाही कहता है-आखिरी गोली और आखिरी दम तक मैं टिका रहूंगा, डटा रहूंगा।
बीएसएफ का ढांचा काफी पुराना हो गया है। इसके आधुनिकीकरण की जरूरत बताई जा रही है। क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
आधुनिकीकरण एक सतत प्रक्रिया है, यह चलता रहता है। पहले केंद्र सरकार ने आधुनिकीकरण फेज-एक के नाम से एक योजना बनाई थी। यह लगभग 10 साल तक चली। इस दौरान काफी चीजें बदलीं। अभी आधुनिकीकरण योजना का फेज-दो चल रहा है। इसमें भी कई चीजें बदली जा रही हैं। हमें आज भी कोई समस्या नहीं हैं। हम उनके साथ निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।
इसी हफ्ते बीएसएफ के हवाई दस्ते यानी एयर विंग को मजबूत करने के लिए गृह मंत्रालय के साथ वरिष्ठ अधिकारियों के साथ आपकी बैठक थी। क्या फैसला हुआ?
एयर विंग के आधुनिकीकरण की जरूरत लंबे अर्से से महसूस की जा रही थी। हमारे कुछ विमान पुराने हो गए हैं, उन्हें बदलने की जरूरत है। साथ ही कुछ नए विमान खरीदने की जरूरत है। हमारे सैनिकों की संख्या बढ़ गई है। हमारे काम करने का क्षेत्र भी बढ़ गया है। इसी कारण कुछ और विमानों की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी संबंध में बातचीत चल रही है।
बर्द्धमान विस्फोट से आतंकियों के बांग्लादेश और भारत की सीमा के आर-पार सक्रिय होने के सुबूत मिल रहे हैं?
इसकी जांच होने दीजिए। जांच हो रही है और जांच एजेंसी कोई और है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती है, टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।
आपको नहीं लगता कि बांग्लादेश से लगी सीमा पूरी तरह सील नहीं है और निगरानी में कुछ कमी है?
ऐसा नहीं है कि हम ठीक से नहीं देख पा रहे हैं। दोनों जगह की स्थितियों में अंतर है। एक ओर जहां कंटीली बाड़ लगी हुई है, लाइटें लगी हुई हैं, जाहिर है उसकी निगरानी ज्यादा आसान है। उसकी तुलना में दूसरी जगह जहां जंगल है या नदी नाले हैं वहां निगरानी कठिन है। बांग्लादेश से सटी सीमा पर बहुत बड़ा इलाका ऐसा है जहां बाड़ नहीं है। इसकी निगरानी में हमें थोड़ी मुश्किल जरूर आती है, लेकिन ऐसा नहीं है कि हम वहां सजग नहीं हैं या मुस्तैदी में कोई कमी है।
ताजा फायरिंग में दोनों तरफ कितने लोग मारे गए होंगे?
यह कहना मुश्किल है कि कितने लोग मारे गए होंगे। अपनी तरफ के मृतकों की संख्या तो हम बता सकते हैं। जैसे मैं कह सकता हूं कि हमारी तरफ सात नागरिक मारे गए हैं। उस तरफ उनकी सरकार कितना बता रही है, उन्हें कितना बताने का निर्देश दिया गया है, यह जानने के लिए हमारे पास कोई जरिया नहीं है, लेकिन लोग मारे गए हैं। यह उनकी सरकार खुद कह रही है। उनके प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख और पाक रेंजर्स के डीजी के भी बयान आए हैं कि लोग मारे गए हैं।
अभी हाल फिलहाल में फ्लैग मीटिंग की कोई तैयारी है?
अभी ऐसा तो कुछ नहीं है। फ्लैग मीटिंग कोई जरूरी तो नहीं है। फ्लैग मीटिंग शांति बहाली की एक प्रक्रिया है। यदि गोली नहीं चलती है तो ऐसे ही शांति है। हम झंडा लाल दिखाएं, हरा दिखाएं या पीला इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। फ्लैग मीटिंग अपने-आप में कोई बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती है।
सरकार बार-बार अर्द्धसैनिक बलों और सेना को खुली छूट देने की बात कह रही है। क्या सचमुच में आपको खुली मिली थी?
जिस तरह से हमें जवाब देना चाहिए था उस तरह से जवाब देने में हमें कभी कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। जैसी जरूरत पड़ रही है, वैसा हम जवाब दे रहे हैं।
[दैनिक जागरण के साथ रूबरू हुए देवेंद्र कुमार पाठक, बीएसएफ के महानिदेशक हैं]
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दुनिया ने दिखाया ठेंगा
संयुक्त राष्ट्र ने भी कश्मीर पर पाकिस्तान को ठेंगा दिखा दिया है और कह दिया है कि ऐसे मसले खुद आपस में शांति से सुलटा लो। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी पिछले दिनों दुनियाभर के देशों की मौजूदगी में कश्मीर की दुहाई दे चुके हैं। यहां तक कि अमीर देशों के क्लब जी-5 के दरवाजे तक भी नाक रगड़ आए हैं- लेकिन कहीं कोई घास डालता नहीं दिख रहा है। भारतीय सीमा पर गोलीबारी और मोर्टार बम विस्फोटों से निदरेष गांव वालों के घर उजाड़ने के पीछे अगर दुनिया को कश्मीर के कथित घाव दिखाने की शैतानी कोशिश थी तो पाकिस्तान इसमें भी बुरी तरह मुंह की खाता दिख रहा है। जम्मू कश्मीर में पल्रयंकारी बाढ़ के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी पीड़ितों के लिए मरहम की बात कर रहे थे और जवाब में उधर से आतंकियों की घुसपैठ कराई जा रही थी। बाढ़ के दिनों से अब तक वहां अट्ठारह दुर्दात घुसपैठिए मार गिराए जा चुके हैं। सवाल है कि पाकिस्तान अब किस हथियार से हमें नया घाव देने की कोशिश करेगा! जम्मू कश्मीर के चुनाव दिसम्बर के तय समय पर होते दिख रहे हैं और पाकिस्तान तथा उसके आतंकी गुग्रे लोकतंत्र के इस पर्व के रंग में भंग डालने की किसी भी कोशिश से शायद ही बाज आएं। भारत और पाकिस्तान के बीच नोबल शांति पुरस्कार बांटने वालों ने अगर इसे दोनों देशों के बीच मैत्री-पुल बनाने का साधन माना होगा तो वे पाकिस्तान की बुनियादी सोच ही नहीं समझ पाए हैं, जो संदेह, नफरत और कट्टर अहंकार के जहर में डूबी है। अपनी सत्रह वर्ष की मासूम मलाला को पाकिस्तान बर्दाश्त नहीं कर पाया। सबसे कम उम्र की इस नोबल पुरस्कार विजेता को दुनिया भले ही सिर आंखों पर ले रही हो, पर अपने देश के लिए वह ऐसी ‘दुश्मन’ है जिसे जान बचाने के लिए ब्रिटेन की शरण लेनी पड़ी। पाकि स्तानी तालिबान को आज वही दुर्दात आतंकी हुक्म दे रहा है जिसके ऑर्डर पर मलाला के सिर में गोलियां दागी गई थीं। मलाला की गलती बस इतनी थी कि उसने लड़की होने के बावजूद शिक्षा हासिल करने का सपना देखा था और जिसके लिए वह बेखौफ तालिबानियों से जूझ गई थी। अपनी ऐसी ही जहरीली सोच का खमियाजा पाकिस्तान ने अपने पहले नोबल पुरस्कार विजेता अब्दुस सलाम को खोकर भरा था। भौतिकी वैज्ञानिक सलाम ने ‘गॉड्स पार्टिकल’ या हिग्स बोसोन की खोज की दिशा में उत्कृष्ट कार्य किया था जिसके लिए उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया था, लेकिन वह अहमदिया संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे जिसे पाकिस्तान में गैर मुस्लिम करार दिया गया है और तमाम अल्पसंख्यकों की तरह उसे भी नरक की जिंदगी से गुजरना पड़ता है। सलाम को जान बचाने के लिए पाकिस्तान से भागना पड़ा और मृत्यु के बाद जब उनका शव स्वदेश लौटा तो उनकी कब्र में लिखे गए मुस्लिम शब्द तक को खोद कर हटा दिया गया। इसलिए चारों ओर से चोट खाने के बावजूद पाकिस्तान की आंखें खुलेंगी, इसकी आशा नहीं के बराबर रखनी चाहिए। वह यकीनन अपने आतंकी गिरोहों के जरिए हमले की नई साजिशें रचेगा और चीन की तर्ज पर सीमा को अस्थिर बनाए रखने की किसी भी हरकत से बाज नहीं आएगा। हमें पूर्ण सतर्कता और दृढ़ता के साथ सुरक्षा पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
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अपनी ही भद पिटवा ली
जनसत्ता 16 अक्तूबर, 2014: कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का रुख छिपा नहीं है। वह बार-बार इस समस्या का समाधान आपसी बातचीत के बजाय तीसरे पक्ष की उपस्थिति में निकालने की मांग करता रहा है। मगर इस बार जिस तरह उसने पहले खुद सीमा पर संघर्ष विराम समझौते का लगातार उल्लंघन कर भारतीय सेना को उकसाने का काम किया और फिर संयुक्त राष्ट्र के सामने भारत के खिलाफ शिकायत लेकर पहुंच गया उससे उसने विश्व बिरादरी के सामने अपनी ही भद पिटवा ली। संयुक्त राष्ट्र ने दो टूक जवाब दिया कि भारत और पाकिस्तान आपसी बातचीत के जरिए अपने मतभेदों को दूर करने की कोशिश करें। यह पहली बार नहीं है जब उसे अंतरराष्ट्रीय संगठन ने यह नसीहत दी है। मगर पाकिस्तान खुद कभी कश्मीर मसले को लेकर किसी सही नतीजे पर पहुंचने के लिए गंभीर नहीं रहा। जब भी भारत की ओर से बातचीत की पहल होती है, वह जानबूझ कर कोई न कोई ऐसा कदम उठा देता है, जिससे शांति प्रयासों में बाधा पहुंचती है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही संकेत दे दिया था कि वे पाकिस्तान के साथ अपने मतभेदों को दूर करने के सारे प्रयास करेंगे। मगर जब दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत का समय नजदीक आया तो पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं की बैठक बुला कर भारत को अंगूठा दिखाने की कोशिश की। फिर जिस समय जम्मू-कश्मीर के लोग प्राकृतिक आपदा से जूझ रहे थे पाकिस्तानी सैनिकों ने एक महीने के भीतर सत्रह बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया, जिसकी वजह से सीमा के आसपास के लोगों को नाहक दर-बदर होना पड़ा और कई लोग इस गोलीबारी में मारे गए।
दरअसल, पाकिस्तान खुद अपने अंतर्विरोधों से बाहर नहीं निकल पाया है। वहां के राजनीतिक नेतृत्व की गर्दन पर सेना और कट्टरपंथी ताकतों की पकड़ इतनी मजबूत है कि वह राजनीतिक तरीके से कश्मीर समस्या का हल निकालने की पहल कर ही नहीं पाता। वहां की सेना और कट्टरपंथी ताकतें भारत के प्रति नफरत का माहौल बना कर ही अपने अस्तित्व को बचाए रख सकती हैं। इसलिए वे नहीं चाहतीं कि किसी भी तरह दोनों देशों के बीच राजनीतिक तालमेल ठीक हो। इस बार सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन के पीछे माना जा रहा था कि चूंकि जम्मू-कश्मीर में चुनाव नजदीक हैं, इसलिए सेना की मदद से कट्टरपंथी ताकतें अपने लोगों को इस पार भेजने के प्रयास में जुटी थीं। मगर जिस समय कश्मीर में तबाही का मंजर था, ऐसी हरकत करके उसने कश्मीरी लोगों के प्रति कौन-सी हमदर्दी दिखाई। फिर संयुक्त राष्ट्र के सामने किस मुंह से उसने भारत के खिलाफ आरोप लगाया कि सीमा पर अशांति के लिए जिम्मेदार वही है। संयुक्त राष्ट्र उसकी हरकतों से बखूबी वाकिफ है कि पहले वह खुद भारत को ललकारता है और फिर इस तरह विश्व पटल पर चर्चा का माहौल बनाने का प्रयास करता है। भारत की शांति बहाली की कोशिशें भी उससे छिपी नहीं हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र से एक बार फिर मुंह की खाकर पाकिस्तान को क्या हासिल हुआ। दरअसल, वह खुद इतनी समस्याओं से घिरा हुआ है कि उसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। जिन आतंकवादी संगठनों को वह भारत के खिलाफ पोसता रहा, वही अब उसके लिए परेशानी पैदा करने लगे हैं। इसलिए जब तक पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व अपनी असल समस्याओं से पार नहीं पा लेता, कश्मीर मसले को सुलझाने की दिशा में उसका कोई भी कदम सकारात्मक नहीं हो सकता।
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